Thursday, June 25, 2026

Voicemails for Isabelle ..


 Voicemails for Isabelle ..


बहनों का प्यार सचमुच अनूठा होता है। 


उनकी आपस की बातें, जुड़ाव, हंसी-मज़ाक... वे बहनें ही नहीं, सहेलियां भी होती हैं और हमराज़ भी। हम तीनों बहनें भी जब तक दिन में  एक-दूसरे से बात न कर लें, दिन पूरा सा नहीं लगता। कोई हमारी बातें सुने तो कहे कि इसमें क्या बात है, न सिर है न पैर, लेकिन फोन रखते-रखते पता चलता है कि एक घंटा कब निकल गया।


Netflix की Voicemails for Isabelle देखते हुए मुझे बार-बार यही बात याद आती रही। शायद इसी वजह से यह फिल्म मेरे दिल को इतनी गहराई से छू गई, क्योंकि इसमें सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं, बल्कि बहनों के बीच का वह रिश्ता भी है जो समय और दूरी से परे होता है।


कहानी यूं तो बहुत सिंपल सी है, लेकिन मुझे बेहद खूबसूरत लगी। कहानी में एक बहन Jill के वो वॉयसमेल हैं जो वह अपनी बहन Isabelle के लिए छोड़ती है, जो अब इस दुनिया में नहीं है। लेकिन कभी-कभी एक छोटी सी गलती, एक गलत नंबर, किसी की पूरी जिंदगी की दिशा बदल देती है। Isabelle के लिए छोड़े गए ये वॉयसमेल एक अनजान आदमी तक पहुंचते हैं और वहीं से शुरू होती है एक ऐसी कहानी जो सिर्फ रोमांस नहीं, बल्कि यादों, दुख, उम्मीद और हीलिंग की कहानी है।


मुझे सबसे खूबसूरत यह लगा कि फिल्म दिखाती है कि जिन लोगों को हम खो देते हैं, वे हमेशा हमारे साथ नहीं रहते, लेकिन उनकी यादें हमें नए लोगों और नए रिश्तों तक पहुंचा सकती हैं। Jill की जिंदगी में उस अनजान शख्स का आना किसी चमत्कार जैसा नहीं, बल्कि जिंदगी का वह कोमल मोड़ लगता है जो धीरे-धीरे टूटे हुए दिल को फिर से जीना सिखाता है।


मुझे सबसे ज्यादा यह बात पसंद आई कि फिल्म सिर्फ रोमांस पर नहीं टिकी है। बहन को खोने का दर्द, उससे जुड़ी यादें और उन यादों को संभालकर आगे बढ़ने की कोशिश को बहुत खूबसूरती से दिखाया गया है। कई बार लगा जैसे हम कोई फिल्म नहीं, बल्कि किसी की निजी डायरी के पन्ने पढ़ रहे हों।


हमारी जिंदगी में भी कुछ गाने और कुछ पल ऐसे होते हैं जो हमेशा के लिए साझा हो जाते हैं। उनसे इतनी यादें जुड़ जाती हैं कि उन्हें सुनते ही पूरा अतीत आंखों के सामने आ जाता है। फिल्म का सबसे भावुक हिस्सा मेरे लिए वह था जब एक बहन दूसरी बहन से कहती है, "रेडी हो जाओ, हमारा गाना बजने वाला है।" और फिर दोनों अपनी-अपनी जगह पर एक ही गाने पर डांस करती हैं। यह दृश्य इतना सहज, इतना सच्चा लगा कि दिल को छू गया।


अंत में जब Robyn का Dancing On My Own बजता है तो वह सिर्फ एक गाना नहीं रह जाता, बल्कि पूरी कहानी का हिस्सा बन जाता है। उसमें प्यार भी है, इंतजार भी, खोने का दर्द भी और आगे बढ़ने की उम्मीद भी। फिल्म खत्म हो जाती है, लेकिन उसका एहसास और वह गाना काफी देर तक मन में बना रहता है। मैं तो कल से वही गाना बार-बार सुन रही हूं।


बीच-बीच में कुछ कॉमेडी सीन भी हैं जो चेहरे पर मुस्कान ले आते हैं, खासकर Jill और उसके शेफ के साथ वाले दृश्य।


मुझे यह फिल्म अच्छी लगी 

अगर मेरी लिखी यह पोस्ट आपको अच्छी लगे, तो इस फिल्म को जरूर देखिए। आखिर बहनों का प्यार और जिंदगी में अचानक मिलने वाली खूबसूरत चीजें ही तो जिंदगी को इतना खुशनुमा बनाती हैं। ❤️



दुनिया दो पल की

 


दुनिया दो पल की ....


वेनेजुएला के भूकंप में दस हजार से अधिक लोगों के मरने को खबर आ रही है ,बहुत हो भयानक दृश्य हैं कोई भी जगह सुरक्षित नहीं है ,पल भर की खबर नहीं। हैं ,कहीं भूकंप, कहीं आग, कहीं युद्ध, कहीं हत्याएँ...


पिछले कुछ समय की खबरें मन को बहुत विचलित कर रही हैं। ऐसा लगता है जैसे दुनिया पहले ही दुख और संकटों से जूझ रही है।


ऐसे समय में इंसानियत की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, न कि नफ़रत, हिंसा और छल की। जब प्रकृति अपने कठोर रूप से लोगों की परीक्षाएँ ले रही हो, तब हमें एक-दूसरे के जीवन की रक्षा करनी चाहिए, उसे और कठिन नहीं बनाना चाहिए।

हर व्यक्ति अपनी-अपनी लड़ाई लड़ रहा है।

आइए, किसी की साँसें छीनने का नहीं, किसी की उम्मीद बनने का प्रयास करें।सोनम,सिया, मुस्कान जैसी लड़कियों को क्या चाहिए जिंदगी से समझ नहीं आता ..

दुनिया को आज और दुख नहीं, थोड़ी करुणा, संवेदना और प्रेम की ज़रूरत है।


Wednesday, June 24, 2026

हनीमून या डेथ मून ?

 हनीमून या 'डेथ-मून'? ट्रैकिंग के बहाने मौत का नया ट्रेंड! 

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आजकल की हत्याओं में एक नया और बेहद खौफनाक 'ट्रेंड' देखने को मिल रहा है—"घुमा-घुमा के मारना!"


वाह रे आधुनिकता! पहले लोग प्यार जताने, यादें संजोने और जिंदगी की नई शुरुआत करने के लिए हिल स्टेशन या ट्रैकिंग पर जाते थे। आज का ट्रेंड देखो तो पार्टी करो, घूमने जाओ, शादी से पहले या शादी के बाद हसीन वादियों का लुत्फ उठाओ... पर वापस 'सकुशल' आओगे या नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं!


 अब पहाड़ सिर्फ खूबसूरत नज़ारे नहीं देते, बल्कि कुछ शातिर दिमागों के लिए 'परफेक्ट मर्डर स्पॉट' बन चुके हैं। सोचिए, कितना खौफनाक दौर है यह! जो हाथ थामकर जीवन भर साथ चलने की कसमें खा रहा है, वही पीछे से खाई में धक्का देने के लिए सही एंगल ढूंढ रहा है।


लड़कियों का बिना किसी खौफ, बिना किसी हिचकिचाहट के ट्रैकिंग और घूमने के बहाने ऐसे फुल-प्रूफ मर्डर प्लान बनाना हैरान भी करता है और रीढ़ में एक सिहरन भी पैदा करता है। दिल बहलाने के लिए सांप का बहाना बना दिया जाता है, और जब पहली बार में मौत चूकी, तो दोबारा बड़ी तसल्ली से प्लान तैयार किया जाता है। 


कानून का डर? वो तो जैसे म्यूजियम की चीज हो चुका है। यह कैसी 'आर्थिक और मानसिक आज़ादी' है, जहां पार्टनर को छोड़ना हो तो कानूनी रास्ते के बजाय खाई का रास्ता चुना जा रहा है? 


समाज की हालत इस कदर बिगड़ चुकी है कि अब किसी के साथ ट्रिप पर जाने से पहले इंसान को लाइफ इंश्योरेंस के साथ-साथ अपनी जान की सलामती की दुआ मांगनी पड़ रही है।


अर्थव्यवस्था की ग्रोथ रेट तो आसमान छू रही है, लेकिन रिश्तों की 'मोरालिटी रेट' पाताल में धंस चुकी है। अगर अपनों के साथ घूमने जाने में भी 'सर्वाइवल किट' और शक का चश्मा लगाकर जाना पड़े, तो समझ लीजिए कि एक समाज के रूप में हम पूरी तरह वेंटिलेटर पर आ चुके हैं!




राख (रंगा बिल्ला)


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रात Prime Video की नई सीरीज़ "राख"देख कर खत्म की ,देखते हुए बचपन की कुछ यादें याद आई ।

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जब रंगा-बिल्ला कांड हुआ था, तब हम बहुत छोटे थे। घटना की पूरी समझ नहीं थी, लेकिन "रंगा-बिल्ला" नाम याद है ।तब हम लोग देर रात तक घर के सामने पार्क में खेलते रहते थे। उछलते-कूदते अंधेरा होने पर भी पास की मार्किट तक भी  चले जाते थे। 


 कुछ धुंधला सा याद आता है कि  इस घटना का कुछ तो असर हुआ था । मुझे आज भी याद है, जब एक शाम मैं घर से थोड़ी दूर मार्केट में सिर्फ ब्रेड लेने चली गई थी, तो लौटकर पापा से बहुत डांट  पड़ी थी। उस वक्त समझ नहीं आया था कि पापा इतने गुस्से में क्यों थे, लेकिन आज 'राख' देखते हुए समझ आया कि वह गुस्सा नहीं, बल्कि एक  पिता का वो डर था जो इस खौफनाक हादसे से देश के हर पेरेंट्स के दिल में भर आया था। 'राख' देखते हुए बचपन का वो डर और पापा की वो डांट आंखों के सामने तैर गई।


राख सिर्फ एक क्राइम थ्रिलर नहीं है। यह दिखाती है कि किसी अपराध का दर्द सिर्फ पीड़ित तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरा परिवार, उनका भरोसा और समाज भी उसके साथ टूटता है। पुरानी रीयल घटना को फिर से इस तरह देखना वाकई दर्दनाक है ।


 उस वक्त को आज के कलाकारों ने बहुत ही खूबी से किया है। अली फज़ल इनकी एक्टिंग इस में  भूली नहीं जा सकती उनके चेहरे पर दिखने वाला गुस्सा, बेबसी और इंसाफ की तलाश दर्शक को कहानी के भीतर खींच लेती है। 

सोनाली बेंद्रे को जितना मौका मिला एक मां  के दर्द को इन्होंने बहुत अच्छे से दर्शाया ।

रंगा और बिल्ला के किरदार,उफ्फ! भाई  इन कलाकारों की एक्टिंग तो भूली नहीं जा सकती  ,दोनों ने इन पात्रों की क्रूरता, विकृत मानसिकता और भयावैहता को इतने वास्तविक ढंग से पर्दे पर उतारा है कि कई बार उन्हें देखते हुए मन में  नफरत पैदा होने लगती है। कई दृश्यों में उनकी केवल मौजूदगी ही बेचैनी और डर पैदा कर देती है।


 कुछ दृश्य और भाषा  गालियां अच्छी  नहीं लगी लेकिन शायद उस दौर के भय और क्रूर सच को दिखाने के लिए यह शायद जरूरी हों। कुछ डायलॉग बहुत ही बेहतरीन  लगे याद रहेंगे यह जैसे अपराध की सबसे बड़ी सज़ा जेल नहीं, किसी परिवार की हमेशा के लिए उजड़ गई दुनिया होती है।

 न्याय मिलने और दर्द खत्म होने में बहुत फर्क होता है।

 कुछ हादसे फाइलों में बंद हो जाते हैं, लेकिन लोगों के दिलों में हमेशा खुले रहते हैं।और सबसे बढ़िया तो यह कि जो आज के वक्त में अहम है 

 एक शहर की पहचान उसकी इमारतों से नहीं, उसके बच्चों की सुरक्षा से होती है।


    वाकई यह सीरीज उस वक्त की हर बात को याद दिला गई ।यह सिर्फ एक सीरीज़ नहीं, बल्कि उस दर्द, डर और सामाजिक स्मृति की कहानी है जिसे समय भी पूरी तरह मिटा नहीं पाया।


#Raakh #PrimeVideo #AliFazal #SonaliBendre #WebSeriesReview  #RangaBilla #CinemaUncut #SuspenseThriller #MustWatch

चढ़ावे का महान आध्यात्मिक बिजनेस

 चढ़ावे का महान आध्यात्मिक बिज़नेस मॉडल


 ईश्वर भी ऊपर बैठकर हमारी धार्मिक व्यवस्थाओं को देखकर मुस्कुराते होंगे और कहते होंगे—"वाह रे मेरे भक्तों, कमाल कर दिया

भक्त सोचता है कि उसका पैसा सीधे भगवान के खाते में जमा हो रहा है। लेकिन रास्ते में कुछ ऐसे दिव्य प्राणी मिल जाते हैं जिन पर भगवान की कृपा इतनी अधिक होती है कि देखते ही देखते उनकी पीढ़ियाँ तर जाती हैं। कोई नई गाड़ी ले लेता है, कोई होटल खोल लेता है, कोई आलीशान मकान बना लेता है। राम जी का नाम चलता रहता है और कुछ लोगों का काम चलता रहता है।


अब बेचारे भगवान भी क्या करें? वे तो मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, शिकायत भी नहीं कर सकते।

मुझे तो लगता है कि अगर भगवान को सचमुच कोई विकल्प दिया जाए तो वे शायद कहें—

"भाई, मेरे लिए सोने का छत्र मत बनाओ। उसकी जगह किसी गरीब बच्चे की फीस भर दो। मुझे 56 भोग मत लगाओ, किसी भूखे को दो वक्त की रोटी खिला दो। मेरी मूर्ति पर लाखों की सजावट मत करो, किसी बीमार की दवा का इंतज़ाम कर दो।"


लेकिन नहीं, हम इंसान हैं। हमें सीधी बात कहाँ समझ आती है! भूखे को खाना खिलाने में फोटो कम आती है, जबकि मंदिर में बड़ा सा चढ़ावा चढ़ाने पर समाज में प्रतिष्ठा भी मिलती है और सेल्फी भी।


कबीर दास जी सदियों पहले समझा गए थे


"साईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाय, मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाय।"


लेकिन हमने इसका नया संस्करण बना लिया


"साईं इतना दीजिए, बंगला मोटरकार, 

दानपेटी से हो सके तो खुल जाए व्यापार।"


धर्म का उद्देश्य इंसान को बेहतर बनाना था, लेकिन हमने  तो उसको प्रदर्शन  बना दिया है। जबकि सच्चाई इतनी सी है कि ईश्वर को सिर्फ हमारे सच्चे भाव पसंद है ,हमारी दयालुता पसंद है ।


किसी रोते हुए चेहरे पर मुस्कान लाना, किसी भूखे को भोजन देना, किसी प्यासे को पानी देना, किसी बच्चे को शिक्षा देना शायद यही वो चढ़ावा है जो सीधे भगवान तक पहुँचता है, बीच में किसी दानपेटी की ज़रूरत भी नहीं पड़ती।


बाकी सोने के छत्र, चाँदी के मुकुट और करोड़ों के चढ़ावे देखकर ऊपर वाला भी कभी-कभी सोचता होगा—

"मेरे नाम पर कारोबार तो खूब चल रहा है, बस इंसानियत खत्म हो रही है"


 Please यह एक व्यंग्य है। इसमें व्यवस्था और दिखावे पर कहा है सिर्फ किसी व्यक्ति, समुदाय या आस्था का अपमान करना उद्देश्य नहीं है।



हमेशा मुस्कराना जरूरी नहीं

 हमेशा मुस्कुराना ज़रूरी नहीं होता...


कुछ दर्द ऐसे होते हैं जो समय के साथ खत्म नहीं होते, बस भीतर कहीं शांत बैठ जाते हैं। फिर अचानक किसी याद, किसी शब्द या किसी खामोशी से जाग उठते हैं।


ऐसे में हमें उपदेश नहीं चाहिए— "सब ठीक हो जाएगा..." "पॉजिटिव सोचो..." "मजबूत बनो..."

क्योंकि हर घाव पर सकारात्मकता का मरहम नहीं लगाया जा सकता।

कभी-कभी इंसान को सहानुभूति भी नहीं चाहिए होती, उसे सिर्फ एक सच्चा वाक्य चाहिए होता है—

"मैं हूँ न... कहो, क्या तकलीफ़ है?"


किसी टूटे हुए व्यक्ति के लिए यह वाक्य हजार सलाहों से ज्यादा कीमती होता है। क्योंकि दर्द का इलाज हमेशा जवाब नहीं होते, कई बार सिर्फ किसी का साथ होता है।


याद रखिए, हर वक्त मजबूत दिखना ज़रूरी नहीं, कभी-कभी बिखर जाना भी इंसान होने का सबूत है।और रिश्तों की असली खूबसूरती वहीं शुरू होती है, जहाँ लोग आपकी मुस्कान नहीं, आपकी खामोशी भी समझने लगते हैं।


#सुप्रभात

#किताबसे

#RishtonKiAhmiyat 

#fellings 

#बुक्स

क्या पढ़ाई बच्चों की जान से कीमती है

 क्या पढ़ाई बच्चों की जान से ज़्यादा कीमती हो गई है?


लखनऊ की दर्दनाक घटना ने एक बार फिर दिल को झकझोर दिया। हर बार यही सवाल मन में उठता हैक्या शिक्षा के नाम पर हम अपने बच्चों की सुरक्षा को भूलते जा रहे हैं? क्या पढ़ाई बच्चों की जान से भी ज़्यादा कीमती हो गई है?


मुझे यह जानने की उत्सुकता हुई कि क्या विदेशों में भी कोचिंग सेंटर है और उनके क्या रूल और क्या कानून है तो गूगल के सौजन्य से यह जानकारी मिली


सच यह है कि कोचिंग सेंटर केवल भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया के लगभग हर देश में हैं। दक्षिण कोरिया में इन्हें हागवॉन, जापान में जुकू और अमेरिका, कनाडा तथा ब्रिटेन में लर्निंग सेंटर या टेस्ट प्रेप इंस्टीट्यूट कहा जाता है। वहाँ भी बच्चे अतिरिक्त पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए इन संस्थानों में जाते हैं।


लेकिन असली फर्क कोचिंग के होने या न होने में नहीं, बल्कि बच्चों की सुरक्षा को लेकर अपनाए जाने वाले नियमों में है।


विदेशों में कोई भी व्यक्ति अपनी मर्जी से किसी बेसमेंट, तंग गली या रिहायशी मकान में कोचिंग सेंटर नहीं खोल सकता। वहाँ के कानून इतने सख्त होते हैं कि केवल उन्हीं इमारतों में शैक्षणिक संस्थान चल सकते हैं जिन्हें सरकार और स्थानीय प्रशासन से विशेष अनुमति मिली हो।


किसी भी कोचिंग सेंटर को शुरू करने से पहले फायर सेफ्टी, इमरजेंसी एग्जिट, वेंटिलेशन, भवन की क्षमता और सुरक्षा मानकों की विस्तृत जांच होती है। हर कमरे में कितने बच्चे बैठ सकते हैं, इसकी सीमा तय होती है और उसका सख्ती से पालन कराया जाता है। नियम तोड़ने पर भारी जुर्माना, लाइसेंस रद्द होने और यहां तक कि जेल की सजा तक का प्रावधान होता है।


हमारे देश में भी नियमों की कमी नहीं है। कागज़ों पर सब कुछ मौजूद है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल नियम बनाने का नहीं, उन्हें लागू करने का है। अक्सर कार्रवाई किसी हादसे के बाद शुरू होती है। कुछ दिन सख्ती दिखती है, फिर सब पहले जैसा हो जाता है। और अगली किसी हादसे का इंतज़ार शुरू हो जाता है।


हर हादसे के बाद शोक संदेश लिखे जाते हैं, जांच समितियाँ बनती हैं, लेकिन उन मासूम बच्चों की जिंदगी वापस नहीं आती जो अपने सपनों के साथ घर से निकले थे।


शिक्षा का उद्देश्य बच्चों का भविष्य बनाना है, उन्हें खतरे में डालना नहीं। कोई भी डिग्री, कोई भी परीक्षा और कोई भी करियर किसी बच्चे की जिंदगी से बड़ा नहीं हो सकता।


आज जरूरत सिर्फ नए नियमों की नहीं, बल्कि ऐसे सिस्टम की है जहाँ बच्चों की सुरक्षा को सबसे पहली प्राथमिकता माना जाए। कही भी कोचिंग सेंटर बिना सुरक्षा नियमों के न खोले जाएं 


आखिरकार, पढ़ाई जरूरी है, लेकिन बच्चों की जान उससे कहीं ज्यादा जरूरी है। भविष्य बचेगा तो कुछ आगे होगा । कल से लखनऊ का यह अग्निकांड देख कर बहुत ही मन खराब हो रहा है । पिछले दिनों में इतने हादसे सुने है इस तरह के कि लगता है देश में कोई कानून नियम नहीं हैं।

#LucknowFire 

#EducationSystem #SafetyFirst #CoachingCentres #IndiaVsWest

लखनऊ फायर

 पिछले कुछ महीनों से देश के अलग-अलग हिस्सों से आग की भयावह घटनाओं की खबरें लगातार आ रही हैं। अब लखनऊ की इस दर्दनाक घटना ने मन को भीतर तक हिला दिया है, जहाँ मासूम बच्चों और युवाओं ने अपनी जान गंवा दी।

क्या हम सचमुच सुरक्षित हैं? घर, स्कूल, कोचिंग सेंटर, अस्पताल, बाजार... आखिर कौन सी जगह है जहाँ लोग खुद को पूरी तरह सुरक्षित महसूस कर सकें?

सुरक्षा मानकों की अनदेखी कब तक होती रहेगी? हर ऐसी त्रासदी के बाद जांच और वादे होते हैं, लेकिन यदि उनसे सीख नहीं ली गई तो ऐसी घटनाएँ फिर दोहराई जाएँगी।

 #LucknowFire #SafetyFirst

Sunday, March 12, 2023

रंग चैत्र महीने के

 रंग चैत्र के ...


  चैत्र का महीना बदलाव का महीना है , नए रंग में कुदरत जैसे खुद से मिला कर सम्मोहित करती है। 

  अमृता ने इसी महीने से जुड़ा बहुत कुछ लिखा जो अद्भुत है। मुझे भी यह महीना बहुत ही आकर्षित करता है ।


चैत्र...

अमृता प्रीतम की रचनाओं में चैत्र बहुत खूबसूरती से रचा बसा है। इस चैत्र का महत्व उनकी कविता में क्यों और कैसे है। इस संबंध में अमृता ने लिखा है__

"साहिर को मिलने से पहले मेरे जीवन में सिर्फ रिक्तता थी।रिक्तता को किसी तिथि या ऋतु से नहीं जोड़ा जा सकता,पर साहिर से जब मुलाकात हुई वह चैत्र का महीना था। पहली बार भी और आगे एक चमत्कार की तरह ,कई बार ।"


  जब वह पहली बार मिला मेरी उम्र बीस या इक्कीस वर्ष की थी। दीवानगी का आलम तब भी देखा था, पर जब मेरी मोहब्बत ने दीवानगी के शिखर को छू लिया,वह 1953 के चैत्र में घटित हुआ।उसका मिलन था।इस मिलन में से मैने " सुनहेडे" संग्रह की सभी कविताएं लिखी। केवल एक कविता को छोड़ कर । जबकि यह पुस्तक 1955 में प्रकाशित  हुई पर उसके आरंभिक पेज पर 1953 के नाम पर " लिखा है।


कई चैत्र ऐसे भी आए,जब उससे मिलन नहीं हुआ,पर ऐसे जैसे चैत्र के महीने में चैत्र न आया हो। कविताएं हर चैत्र में लिखीं और फिर लिखने का प्रत्येक समय मेरे लिए चैत्र हो गया। इसी कारण आज उन सभी कविताओं को जिनमें मेरी मोहब्बत की दीवानगी है, चैत्र नामा भी कह सकती हूं।( मैं जमा तू)


  इस तरह अमृता की कविता में चैत्र एक प्रतीक की तरह फैलता है और उसकी सम्पूर्ण कविता की प्रतीकात्मक योजना में विशेष महत्व का बन जाता है।

जैसे ....

चैत्र ने पासा मोड़िआ

रंग दे मेले वास्ते फुल्ला ने रेशम जोड़ियां

तू नहीं आइया...


हिंदी अनुवाद 


चैत्र ने करवट बदली

रंगों के मेले के लिए 

फूलों ने रेशम जोड़ा

तू नहीं आया।


2) चैत्र दा वंजारा आइआ

बुचकी मोढ़े चाई वे।

असी विहाझी पिआर कथुरी

वेहंदी रही _ लुकाई वे।


हिंदी अनुवाद


चैत्र का बंजारा आया

गठरी कंधे पर उठाए

हमने खरीदी प्यार कस्तूरी

देखता रहा ,पूरा लोक।


3/

पंजा उत्ते है वीह सौ पंज समंत

चढ़िआ चैत्र महीने ते होई नावी

 हत्थी आपणी लिखे सुनेहडे मैं _

हत्थी आपणी आप वसूल पावीं।


हिंदी अनुवाद 

पांच ऊपर है बीस सौ पांच सम्वत

चढ़ा चैत्र का महीना हुई नौवीं

अपने हाथ से लिखे संदेश मैने

अपने ही हाथों से उन्हें वसूल पाना।


4)

चैत्र ने बूहा खड़काइआ

अज्ज दा गीत इस तरा बणिआ।


चैत्र ने द्वार खटखटाया

आज का गीत इस तरह बना।


5)

वहीआं लै के चैत्र आइआ

सज्जी अक्ख जिमी दी फरकी।


बही खाते को लेकर चैत्र आया 

दाईं आंख जमीं की फड़की।


6

एक चैत्र दी पुनिआं सी

कि चिट्टा दुध मेरे इश्क दा घोड़ा

देशा ते बदेशां नू गाहण तुरिया ( चैत्र नामा)


एक चैत्र की पूर्णिमा थी 

कि सफेद दूध सा मेरे इश्क का घोड़ा

देश विदेश को नापने चला।


अमृता ने प्रेम से जुड़ी अपनी सभी कविताओं को " चेतरनामा"कहा।इसी कारण चैत्र का प्रतीक इन कविताओं का स्थाई हिस्सा बना।


  यह प्रतीक कविता में फैलते हैं और अर्थ की बहु दिशाओं की ओर संकेत करतें हैं।अमृता का काव्य शिल्प इन प्रतीकों के सामर्थ्य और उसके विश्वास के साथ जुड़ा हुआ है। यह प्रतीक विधान उसका संदेश बनता है।वह कहती है__ 

नवीं रूत्त दा कोई संदेश देवां

ऐस कानी दी लाज नूं पालणा वे। ( सुनेहड़े)

( नई ऋतु का कोई संदेश दूं/ इस कलम की लाज को पालना है।)


तो इस संदेश में प्रतिकात्मक दृष्टि से रात से लेकर प्रभात के सूर्य तक सपनों से निकलते हुए एक यात्रा है। इसलिए कई बार वह इस प्रतीक विधान के उस संदेश से जुड़ते हुए कहती है__

 रात है काली बड़ी 

 उम्रां किसे ने बालीआं

चन सूरज कहे दीवे 

अजे वी बलदे नहीं।


रात है काली बड़ी

उम्र किसी ने जलाई

चांद सूरज कैसे हैं दीपक

अभी भी जलते नहीं।

    इसी के साथ अमृता के लिए सशक्त कविता की शक्ति आज़ादी का एहसास देने में है।उन्होंने रसीदी टिकट में लिखा

आग की बात है, तूने ही यही बात कही थी। लिख कर ऐसा लगा जैसे चौदह वर्ष का वनवास भोग कर स्वतंत्र हूं।

Tuesday, February 14, 2023

अमृत उद्यान

 फिर छिड़ी बात फूलों की ...


इस वक्त दिल्ली का हर कोना रंग बिरंगे फूलों से गुलजार है। मुगल गार्डन जिसका नाम अभी अभी बदल कर अमृत उद्यान किया गया ,खूबसूरत रंगबिरंगे फूलों से महक रहा है। हर तरह के फूल ,सौ से ज्यादा गुलाब की किस्में , ट्यूलिप के कई रंग के फूल ,औषधीय पौधे ,जिसमें पुदीना, लेमन ग्रास , अजवाइन, और भी कई किस्में ,बोनसाई उद्यान, और संगीत पर झूमते फाउंटेन , एक जादुई सा वातावरण जैसा दिखता है । 


लगभग पंद्रह सौ एकड़ में फैले इस उद्यान में खुशबू है ,पक्षियों की चहचहाट है, बंदरों की उछल कूद और मोर भी है।इन सब के साथ  स्कूल के आए बच्चों की हंसी वाकई अमृत उद्यान के इस उत्सव के नाम को सार्थक कर देती है। 


 यह अभी 26 मार्च तक है । ऑनलाइन बुकिंग फ्री है। आपको अपने हिसाब से टाइम स्लाट स्लेक्ट करने हैं। कुदरत के इस सुंदर नजारे को जी भर कर देख आइए।


इस लिंक पर आप इस सुंदर जगह को देख सकते हैं

अमृत उद्यान









Tuesday, February 07, 2023

जॉय गांव पिकनिक

 ज़िंदगी में आगे बढ़ने के लिए,

मौसम नहीं मन चाहिए,

हर राह आसान हो जाएगी,

बस उसे करने का संकल्प चाहिए..














उम्र के साथ सीनियर सिटीजन जुड़ा हो और मन में घूमने की ललक हो तो फिर बात ही क्या है। इस बीते संडे को सीनियर सिटीजन ग्रुप के साथ "जॉय गांव पिकनिक स्पॉट" पर जाने का प्रोग्राम बना। जिसमे सब उमंग से भरे हुए थे ।

दस लोगों के ग्रुप में मेरी कॉलेज की फ्रेंड Kavita Nagi और उसके पतिदेव भी साथ थे। हम लोग पांच साल बाद मिल रहे थे तो वो खुशी बहुत ज्यादा थी। खूब एंजॉय किया। खूब बड़ा बना हुआ झज्जर रोड पर  यह गांव बहुत ही अच्छा लगा। बच्चों की तरह खूब झूले झूले । 7 डी मूवी देखी। बहुत टाइम से इच्छा थी "जिपलाइन "करने की वो की। मतलब एक बार फिर से हम सब ने बचपन को  जी लिया।कठपुतली तमाशा ,जादू के खेल ,मेंहदी ,गांव का खाना माहौल पानी भरना ,जो भी था सब खूब एंजॉय किया। सब लोगों का साथ बहुत ही प्यारा था। बाकी सब सदस्य पहली बार मिल रहे थे पर लगा ही नहीं कि अजनबी हैं। 


कल के बीते दिन की खूबसूरत झलक नीचे दिए लिंक में देख सकते हैं।

   जॉय गांव की वीडियो


 घूमते हुए यही पंक्तियां घूम रही थी 


उड़ने दो परिंदों को अभी शोख़ हवा में

फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते

- बशीर बद्र

Thursday, January 26, 2023

खालीपन

 


खालीपन

जब भी खाना बनाती हूं

तो सामने वाले घर में भी वो भी खाना बना रही होती है

आमने सामने की खिड़की से अक्सर एक दूसरे को देखते हैं हम

जानती नहीं मैं उसे

पर जैसे हमारी आंखें बात कर रही होती हैं

क्या बनाया आज? क्या उन्हें पसंद आएगा? क्या बच्चे खाएंगे?

फिर एक खामोशी ,फिर नजरों का मिलना और पूछना

क्यों परिवार होते हुए भी अकेले हैं हम?

आंखों में खालीपन  क्यों है, इधर भी उधर भी?

आखिर किसको ढूंढा रहे हैं इस खिड़की से बाहर झंकते हुए हम?

इन्हीं सवालों के साथ खिड़की यहां भी बंद और वहां भी बंद


नीचे लिंक पर आप सुन भी सकते हैं 

Written by my daughter megha sahgal



बदला रंग मौसम का

 बदला रंग मौसम का



ली अंगडाई

सर्दी ने ....

मौसम की

बुदबुदाहट में ...

हवा के

खिलते झोंकों से ..

बहती मीठी बयार से

फ़िर पूछा है ..

प्रेम राही का पता


खिलते

पीले सरसों के फूल सा

आँखों में ...

हंसने लगा बसंत

होंठो पर

थरथराने लगा

गीत फ़िर से

मधुमास का ..

अंगों में चटक उठा

फ्लाश का चटक रंग

रोम रोम में

पुलकित हो उठा

अमलतास ...

कचनार सा दिल

फ़िर से जैसे बचपन हो गया


कैसा यह बदला

रंग मौसम का

अल्हड सा

हर पल हो गया......


बसंत पंचमी की आप सभी को बहुत बहुत बधाई 


 Ranju Bhatia...

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जश्न जारी है

 इमरोज़ होना आसान नहीं ...



इमरोज़ का जन्मदिन


Amrita Pritam ke saath चालीस साल जी कर लिखी 

इमरोज़ की कविताएं


"जश्न जारी है" जी की किताब से कुछ सुंदर रचनाएं


तेरे साथ जिए

वे सब खूबसूरत

दिन रात

अब अपने आप

मेरी कविताएं

बनते जा रहे हैं....


कब  और किस दिशा में कुछ सामने आएगा ,कोई सवाल पूछेगा ,यह रहस्य पकड़ में नही आता ..एक बार मोहब्बत और दर्द के सारे एहसास ,सघन हो कर आग की तरह लपट से पास आए और इश्क का एक आकार ले लिया ..


उसने पूछा ..कैसी हो ? ज़िन्दगी के दिन कैसे गुजरते रहे ?


जवाब दिया ..तेरे कुछ सपने थे .मैं उनके हाथों पर मेहन्दी रचाती रही .

उसने पूछा ..लेकिन यह आँखों में पानी  क्यों है ?


कहा ..यह आंसू नही सितारे हैं ...इनसे तेरी जुल्फे सजाती रही ..


उसने पूछा ...इस आग को कैसे संभाल कर रखा ?


जवाब दिया ...काया की डलिया में छिपाती रही


उसने पूछा -बरस कैसे गुजारे ?


कहा ....तेरे शौक की खातिर काँटों का वेश पहनती रही..


उसने पूछा ...काँटों के जख्म किस तरह से झेले?


कहा... दिल के खून में शगुन के सालू रंगती रही..


उसने कहा और क्या करती रही?


कहा -कुछ नही तेरे शौक की सुराही से दुखों की शराब पीती रही


उसने पूछा .इस उम्र का क्या किया


कहा कुछ नही तेरे नाम पर कुर्बान कर दी .[यह एक अमृता का साक्षात्कार है जो एक नज्म की सूरत में है ..]


अमृता ने एक जगह लिखा है कि वह इतिहास पढ़ती नही .इतिहास रचती है ..और यह भी अमृता जी का कहना है वह एक अनसुलगाई सिगरेट हैं ..जिसे साहिर के प्यार ने सुलगाया और इमरोज़ के प्यार ने इसको सुलगाये रखा ..कभी बुझने नही दिया ..अमृता का साहिर से मिलन कविता और गीत का मिलना था तो अमृता का इमरोज़ से मिलना शब्दों और रंगों का सुंदर संगम ....हसरत के धागे जोड़ कर वह एक ओढ़नी बुनती रहीं और विरह की हिचकी में भी शहनाई को सुनती रहीं ..


  प्रेम में डूबी हर स्त्री अमृता होती है या फिर होना चाहती है. पर सबके हिस्से कोई इमरोज नहीं होता, शायद इसलिए भी कि इमरोज होना आसान नहीं. ... किसी ऐसी स्त्री से से प्रेम करना और उस प्रेम में बंधकर जिन्दगी गुजार देना, जिसके लिए यह पता हो कि वह आपकी नहीं है।


जन्मदिन मुबारक इमरोज़


इस लिंक पर सुने इमरोज़ की कविताएं






Thursday, December 29, 2022

दुनिया के सात अजूबे दिल्ली में

 सात अजूबे


यह दिल्ली है,बस इश्क मोहब्बत प्यार .... सर्दी में दिल्ली की कुछ जगह बहुत ही सकून और गर्माहट से भर देती है। दिल्ली के पार्क और नई बनी यह कुछ जगह बढ़िया है देखने लायक ।


 #WasteToWonder एक ऐसी ही जगह है । यह निजामुद्दीन मेट्रो स्टेशन के पास है। यहां पुराने स्क्रैप से दुनिया के सात अजूबे बना रखें हैं। यह जगह inderprasthapark के बिल्कुल करीब है। और बहुत अच्छे से मेंटेन है। (near Hazrat Nizamuddin Metro Station, Block A, Ganga Vihar, Sarai Kale Khan, New Delhi, Delhi 110013)


  इसमें जाने का टाइम सुबह 11 से शाम 11 बजे तक है। टिकट सीनियर सिटीजन 65 से ऊपर की फ्री एंट्री है। 13 से 64 उम्र तक फिफ्टी रूपीज और बच्चों की 25 rs है। रात को साउंड एंड लाइट शो भी है। और यह स्क्रैप से बने सात अजूबे खूब सुंदर रोशनी से भर जाते हैं। अभी ठंड के कारण हमने रात वाले नजारे देखे नहीं, पर वाकई यह बहुत सुंदर दिखेंगे।


खाने की कोई वस्तु अंदर नहीं ले  जा सकते, किंतु अंदर बहुत सारे फूड स्टॉल है। जहां आप वेज नॉन वेज सब ले सकते हैं। रेट वाजिब है । कुछ महंगे कुछ ठीक ठाक।


   अंदर फूल ,पौधे और झरना भी है जिसकी कल कल पानी की आवाज़ मन मोह लेती है ,मेडिटेशन सा माहौल बना देती है। हर जगह सफाई और सुंदर फूलों से सजा हुआ है।  दिल्ली की सर्दी में इस सुंदर जगह में घूम आइए जब भी मौका लगे।



Sunday, December 25, 2022

हैप्पी क्रिसमिस

 

 हैप्पी क्रिसमिस


 क्रिसमस का त्योहार आते ही बच्चो की खुशी का ठिकाना नही रहता . सांता क्लाज  आयेंगे ढेर से तोहफे लायेंगे , यही उम्मीद लिए सारी दुनिया के बच्चे इनका इंतज़ार करते हैं । शायद ही दुनिया का कोई बच्चा ऐसा होगा जिसे इनका इंतज़ार न होगा।

   

 दुनिया भर का प्यार समेटे अपनी झोली में यह आते हैं और बच्चो को इंतज़ार होता है अपने तोहफों का जो वो चिठ्ठी [पाती] लिख के अपनी मांग उनको लिख के भेजते हैं . क्या आप जानते हैं कि " सांता क्लाज" को हर साल कितनी पाती मिलती है? आपको यकीन नही होगा लेकिन यह सच है कि हर साल उन्हें ६० लाख से भी ज्यादा पाती मिलती है और सांता उनका जवाब देते हैं .


 सयुंक्त राष्ट्रीय की  यूनीवर्सल   पोस्ट यूनियन के अनुसार "सांता क्लाज़ को ढेरों नन्हें मुन्ने बच्चों की  पाती मिलती हैं "सांता कितने लोकप्रिय हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगया जा सकता है कि कम से कम २० देशों के डाक विभाग सांता के नाम से आने वाली चिट्ठियों  को अलग करने और फ़िर उनका जवाब देने के लिए अलग से कर्मचारी भरती करते हैं .....कई पाती पर तो सिर्फ़ इतना ही लिखा होता है "सांता क्लाज़ नॉर्थ पोल .."इन चिट्ठियों का  दिसम्बर में तो अम्बार लग जाता है।  कनाडा  डाक विभाग २६ भाषा में इनका जवाब देता है जबकि जर्मनी  की "डयुश    पोस्ट  " १६ भाषा में  इन का जवाब देती है कुछ देशो में तो ई-मेल से भी जवाब दिए जाते हैं पर सांता रहते कहाँ है यह  अभी साफ साफ नही पता चल पाया है :) पर कनाडा और फ्रांस के डाक कर्मी सबसे ज्यादा व्यस्त  रहते हैं क्यूंकि इन दोनों देशों  में १० लाख से भी ज्यादा नन्हें मुन्ने चिट्ठी लिखते हैं।


सर्दियों में मनाया जाने वाला यह त्योहार लगभग सभी देशों में मनाया जाता है लेकिन सांता को कई नामों से जाना जाता है कहीं फादर क्रिसमस ,तो कहीं सेंट निकोलस ,रूस में इन्हे "डेड मोराज़" के नाम से जाना जाता है


1)_यह तो हम सभी जानते हैं कि क्रिसमस पर सबको उपहार देने की परम्परा है लोग तरह तरह के उपहार देते हैं ..पर एक उपहार अब तक का सबसे व्यक्तिगत उपहार माना जाता है...वह था १९६९ की क्रिसमस की पूर्व संध्या पर अरबपति अमेरिकी व्यवसायी रास  पैरेट ने वियतनाम में अमेरिकी युद्धबंदियों के लिए विमान सेवा से २८ टन दवाइयां और उपहार भिजवाये थे |यह अब तक का सबसे बड़ा व्यक्तिगत  उपहार माना जाता है |


2)नेशनल क्रिसमस   ट्री एसोसिएशन के अनुसार अमेरिका में हर साल ३७.१ मिलियन क्रिसमस ट्री खरीदे जाते हैं |अमेरिका का राष्ट्रीय क्रिसमिस वृक्ष कैलोफोर्निया के किंग कैनन नैशनल पार्क में हैं | ३०० फीट ऊँचे इस सिकाओ वृक्ष को यह दर्जा १९२५ में दिया गया |


3) पूरी दुनिया में    क्रिसमस २५ दिसम्बर को मनाया जाता है पर सिर्फ़ यूक्रेन में यह ७ जनवरी को मनाया जाता है इसकी वजह यह है कि यहाँ पर रोमन कैथोलिक गेग्रोरियन कैलेंडर के साथ ही आर्थोडाक्स जुलियन कैलेंडर भी समान रूप से प्रचलित है


यूक्रेन   का क्रिसमस कुछ और कारणों से भी बहुत ख़ास है ..यहाँ क्रिसमस ट्री पर नकली मकडी और उसका जाल सजाया जाता है इस से यह माना जाता है कि घर में गुड़ लक आता है | यहाँ क्रिसमस की रात घरों में दावत की जबरदस्त तैयारी होती है और घर का सबसे छोटा बच्चा इवनिंग स्टार को देखने के बाद पार्टी शुरू करने का संकेत देता है


4)ग्रीस में क्रिसमस ट्री को सजाने और उपहार देने की परम्परा नहीं है | क्रिसमस की सुबह स्थानीय पादरी गांव के तालाब  में एक छोटा सा क्रास इस विश्वास के साथ फेंकता है  कि वह अपने साथ बुरी आत्माओं को भी डुबो देगा | इस के बाद पादरी गांव  के घर घर जा कर पवित्र जल फेंकते हैं ताकि घर से बुरी आत्माएं निकल जाए | इस बुरी आत्माओं को भगाने के प्रयास में ही वहां के लोग पुराना जूता या नमक जलाते हैं |


5)नार्वे में क्रिसमस पर रात्री भोज और उपहार को खोलने के बाद घर के झाडू को छुपा दिया जाता है |इस के पीछे यह मान्यता है कि हर रात बुरी आत्माएं  बाहर निकलती है और वह झाडू को चुरा कर उस पर सैर करती हैं |


6)अमेरिका में बच्चे क्रिसमस की रात सांता क्लाज से उपहार लेने के लिए जुराबे टांग  देते हैं   तो नीदरलैंड में बच्चे नवम्बर से ही अपने जुटे इस विश्वास के साथ टांग देते हैं घर के बाहर की सांता क्लाज उन्हें उपहार दे जायेंगे |


इस तरह क्रिसमस के रंग हर देश में खूब नए तरीके से मनाये जाते हैं ..किसी भी तरह मनाया जाए पर    यह बच्चो को तो बहुत ही प्यारा त्यौहार लगता है क्यों कि बहुत सारे उपहार जो मिलते हैं ..और सब तरफ शान्ति रहे सब को सदबुद्धि    मिले इसी दुआ के साथ आप सबको 

#happychristmas


Wednesday, December 14, 2022

होता है कभी ऐसे भी ...

 होता है कुछ ऐसा भी ......

कवि निराला जी के बारे में एक घटना पढ़ रही थी कि ,वह एक दिन लीडर प्रेस से रोयल्टी के पैसे ले कर लौट रहे थे | उसी राह में महादेवी जी का घर भी पड़ता था |उन्होंने सोचा की चलो मिलते चलते हैं उनसे .|ठण्ड के दिन थे अभी कुछ दूर ही गए होंगे कि सड़क के किनारे एक बुढिया उन्हें दिखायी दी जो ठण्ड से कांप रही थी और याचक भाव से उनकी तरफ़ देख रही थी | उस पर दया आ गई उन्होंने उसको न सिर्फ़ अपनी रोयल्टी के मिले पैसे दे दिए बलिक अपना कोट भी उतार कर दे दिया ..., और महदेवी के घर चल दिए किंतु चार दिन बाद वह यही भूल गए कि कोट क्या हुआ | उस को ढूढते हुए वह महादेवी जी के घर पहुँच गए ,जहाँ जा कर उन्हें याद आया कि वह कोट तो उन्होंने दान कर दिया था |


पढ़ कर लगा कि इस तरह जो डूब कर लिखते हैं या प्रतिभाशाली लोग होते हैं ,वह इस तरह से चीजो को भूल क्यों जाते हैं ? क्या किसी सनक के अंतर्गत यह ऐसा करते हैं ? या इस कद्र डूबे हुए होते हैं अपने विचारों में कि आस पास का कुछ ध्यान ही नही रहता इन को ।विद्वान मन शास्त्री का यह कहना है कि जब व्यक्ति की अपनी सारी मानसिक चेतना एक ही जगह पर केंद्रित होती है वह उस सोच को तो जिस में डूबे होते हैं कामयाब कर लेते हैं पर अपने आस पास की सामान्य कामो में जीवन को अस्तव्यस्त कर लेते हैं जो की दूसरों की नज़र में किसी सुयोग्य व्यक्ति में होना चाहिए |


इसके उदाहरण जब मैंने देखे तो बहुत रोचक नतीजे सामने आए .,.जैसे की वाल्टर स्काट यूरोप के एक प्रसिद्ध कवि हुए हैं ,वह अक्सर अपनी ही लिखी कविताओं को महाकवि बायरन की मान लेते थे और बहुत ही प्यार से भावना से उनको सुनाते थे |उन्हें अपनी भूल का तब पता चलता था ,जब वह किताब में उनके नाम से प्रकशित हुई दिखायी जाती थी |


इसी तरह दार्शनिक कांट अपने ही विचारों में इस तरह से गुम हो जाते थे कि , सामने बैठे अपने मित्रों से और परिचितों से उनका नाम पूछना पड़ता था और जब वह अपने विचारों की लहर से बाहर आते तो उन्हें अपनी भूल का पता चलता और तब वह माफ़ी मांगते |


फ्रांस के साहित्यकार ड्यूमा ने बहुत लिखा है पर उनकी सनक बहुत अजीब थी वह उपन्यास हरे कागज पर ,कविताएं पीले कागज पर ,और नाटक लाल कागज पर लिखते थे | उन्हें नीली स्याही से चिढ थी अत जब भी लिखते किसी दूसरी स्याही से लिखते थे |


कवि शैली को विश्वयुद्ध की योजनायें बनाने और उनको लागू करने वालों से बहुत चिढ थी | वह लोगो को समझाने के लिए लंबे लंबे पत्र लिखते |पर उन्हें डाक में नही डालते, बलिक बोतल में बंद कर के टेम्स नदी में बहा देते और सोचते की जिन लोगो को उन्होंने यह लिखा है उन तक यह पहुँच जायेगा | इस तरह उन्होंने कई पत्र लिखे थे |


जेम्स बेकर एक जर्मन कवि थे वह ठण्ड के दिनों में खिड़की खोल कर लिखते थे कि , इस से उनके दिमाग की खिड़की भी खुली रहेगी और वह अच्छा लिख पायेंगे |


चार्ल्स डिकन्स को लिखते समय मुंह चलाने की और चबाने की आदत थी | पूछने पर कि आप यह अजीब अजीब मुहं क्यों बनाते लिखते वक्त ..,तो उसका जवाब था कि यह अचानक से हो जाता है वह जान बूझ कर ऐसा नही करते हैं |


बर्नाड शा को एक ही अक्षर से कविताएं लिखने की सनक थी |उन्होंने अनेकों कविताएं जो एल अक्षर से शुरू होती है उस से लिखी थी ..,पूछने पर वह बताते कि यह उनका शौक है |


तो आप सब भी प्रतिभशाली हैं ,खूब अच्छे अच्छे लेख कविताएं लिखते हैं .| सोचिये- सोचिये आप किसी आजीबो गरीब सनक के तो शिकार नही :) कुछ तो होगा न जो सब में अजीब होता है .. | जब मिल जुल कर हम एक दूसरे के अनुभव, कविता, लेख पढ़ते हैं तो यह क्यूँ नही ।:) वैसे मेरी सनक है बस जब दिल में आ गया तो लिखना ही है ....और जब दिल नहीं है तो नहीं लिखना ......चाहे कितना भी जरुरी क्यों नहीं हो ...मतलब मूड स्विंग्स :)जल्दी जल्दी लिखे आप सब में क्या अजीब बात है मुझे इन्तजार रहेगा आप सब की सनक को जानने


का ॥:)#रंजू भाटिया

Monday, December 12, 2022

मुस्कान

 


कोई भी" दर्द "

मारता है 'तिल तिल 

फैलता है ,होले से 

और विदा होने से पहले 

वसूलता है ....

अपने रहने "का हर दाम 

कभी लफ़्ज़ों में ,

कभी कहानियों में

कभी किस्सों में 

और कभी "नम आँखों की बारिश में "

हर दाम चुकाने के बाद ही देता है "मुस्कान" किश्तों में धीरे धीरे !

#रंजूभाटिया

Thursday, December 01, 2022

कोलाज

 बने अब

शब्दों के कुछ कोलाज

जो ज़िन्दगी के सब रंग दिखाए

दुःख के भीगे पल

जो थमे हैं कहीं

वो अब ख़ुशी के साए में

लिपटे नजर आये !!!


ज़िन्दगी कभी अपनों की तरह मिल ..क्यों किसी गैर की तरह सताती है मुझे :)


@ra


nju bhatia

Saturday, November 19, 2022

प्रीत की रीत

 प्रीत की रीत 



जब तुम्हारे दिल में मेरे लिए प्यार उमड़ आये,

और वो तुम्हारी आँखो से छलक सा जाए.......

मुझसे अपनी दिल के बातें सुनने को

यह दिल तुम्हारा मचल सा जाए..........

तब एक आवाज़ दे कर मुझको बुलाना

दिया है जो प्यार का वचन सजन,

तुम अपनी इस प्रीत की रीत को निभाना ............


तन्हा रातों में जब सनम

नींद तुम्हारी उड़ सी जाये.......

सुबह की लाली में भी मेरे सजन,

तुमको बस अक़्स मेरा ही नज़र आये......

चलती ठंडी हवा के झोंके ....

जब मेरी ख़ुश्बू तुम तक पहुंचाए .

तब तुम अपना यह रूप सलोना ....

आ के मुझे एक बार दिखा जाना

दिया है जो प्यार का वचन साजन

तुम अपनी इस प्रीत की रीत को निभा जाना


बागों में जब कोयल कुके.....

और सावन की घटा छा जाये.......

उलझे से मेरे बालों की गिरहा में.....

दिल तुम्हारा उलझ सा जाये .....

आ के अपनी उंगलियो से....

उस गिरह को सुलझा जाना

जो हो तुम्हारे दिल में भी कुछ ऐसा.....

तब तुम मेरे पास आ जाना


पहले मिलन की वो मुलाक़ात सुहानी.....

याद है अभी भी मुझको

तुम्हारी वो भोली नादानी.

मेरे हाथो में अपने हाथो को लेकर ........

गया था तुमने जब प्यार का गीत सुहाना

हो जब तुम्हारे दिल में भी ऐसी  यादो का बसेरा....

तब तुम अपनी प्रीत का वचन निभाना


जो हो तुम्हारे दिल में कुछ ऐसा

तब तुम मुझ तक साजन आ जाना ..# रंजू .....