Saturday, July 01, 2017

बोल तुम्हारे ज़िन्दगी






सुनो ज़िन्दगी ... 
तुम जो कहना चाहती हो
बिना कहे ही सुन लिया है मैंने
तुम बोल रही थी ,बोल तुम्हारे चांद की ताशें काट रहे थे
तुम कह रही थीं मन की गांठें खोलते हुए
अपने अबूझ अथाह मन की हरकतों की सुगबुगाहट
पंछियों सी उडती हुई अपनी सांसों को तुमने खोल दिया था
मेरे हिस्से की नमी को अपनी आंखों में लेकर
तुमने पी लिया सारा दुख
अपनी ही हाथों सजाए थे तुमने जो सपने
मेरे जेहन में उनकी खुशबू
दिन के वक्त रात सी महक उठी थी
अपनी खामोश सरसराहट से
 तुमने घेरकर बाहों में समेट लिया सारा जहां 
जिसके एक हिस्से में खड़ी  में
निहारती रही तुमको

तुम बोलती रही
बोल तुम्हारे ,चांद की ताशें काटते रहे
अब मैं हतप्रभ  खड़ी  सोचती हूं
जो बातें की हैं मैंने तुमसे
खामोशी के साथ
उन्हें कहां रखूं
क्या करूं
इन शब्दों का
जो तुमने कहे हृदय गुहा से निकालकर.....................



रंजू भाटिया 

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