Wednesday, October 28, 2020

एक क़तआ अमृता के नाम ( पुस्तक समीक्षा)

इस क़िताब में जहां क्यों है ,वहां ही मेरा दख्ल है , वरना मैं कहीं हूं ही नहीं ,यह कहानी अमृता की है ।"

  बिल्कुल सच है कि कुछ रूहें हमेशा साथ रहती हैं ,वरना अमृता प्रीतम को सौवीं जन्मशताब्दी पर डॉ उमा त्रिलोक जी द्वारा लिखित " एक क़तआ  ...पढ़ कर आंखे नम नहीं हो जाती और पढ़ कर दिल बेचैन न हो उठता । अमृता जैसी शख्सियत की मौजदूगी जिस्म से जान निकल जाने के बाद भी आबाद रहती हैं और मोहब्बत करने वालों को इसी क्यों में उलझाए रखती है। 

   अमृता,जिन्होंने कच्ची  उम्र 16 साल से ही अपने सपनों की इबारत लिखनी शुरू कर दी थी, जिंदगी के पन्ने  पर रोशनाई कभी जिगर का खून था तो कभी आँसू। अमृता ने जो भी लिखा पूरी तरह डूब कर लिखा था। पर वक़्त से इतना आगे लिखने वाली लेखिका इतनी अकेली क्यों महसूस करती रही , यही सवाल उमा जी की लिखी इस क़िताब का मर्म है ।
    इस क़िताब की शुरुआत में लिखी आस्कर वाईल्ड के शब्दों की पंक्तियाँ "उदासी को लिबास बना कर पहने रखा और जिस दहलीज़ के अंदर पांव रखा,वह घर वैराग्य का स्थान बन गया ।"अमृता ने ख़ुद कहा  हैं-"मेरा सोलहवां वर्ष आज भी मेरे हर वर्ष में शामिल है",शायद इसीलिए उनकी नज़्में और कहानियाँ प्रेम को इतनी पूर्णता से, सच्चाई से परिभाषित कर पाती हैं।

अमृता अपने समय से बहुत आगे की सोच रखने वाली लेखिका थीं। अपनी आत्मकथा में उन्होंने ख़ुद लिखा है कि "मेरी सारी रचनाएं, क्या कविता, क्या कहानी और क्या उपन्यास, मैं जानती हूं, एक नाजायज बच्चे की तरह हैं। जानती हूं, एक नाजायज बच्चे की किस्मत इसकी किस्मत है और इसे सारी उम्र अपने साहित्यिक समाज के माथे के बल भुगतने हैं।

अमृता के मुक्त व्यक्तित्व को उस वक्त का न समाज पचा पाया था न साहित्य जगत। लेकिन अमृता ने न कभी अपने आप को बदला न अपनी कलम को रोकने की कोशिश की। शायद इसलिए वो अमृता कहलाईं। माँ की मौत के बाद पिता को फिर वैराग्य अपनी ओर खींचने लगा मगर अमृता का मोह उन्हें संसार से जोड़े रखता।अमृता कभी-कभी रो पड़ती थीं कि वे पिता को स्वीकार थीं या नहीं...अपना अस्तित्व एक ही समय में उन्हें चाहा और अनचाहा लगता था।एक काल्पनिक प्रेमी "राजन" से शुरू हुई कहानी उनकी साहिर और आगे के सफर को तय करती रही । अमृता का मन एक पंछी की तरह था जो उड़ना चाहता था खुले आसमान में,एकदम स्वच्छंद,मगर एक तीखा दर्द लिए...ये दर्द उनकी कविताओं में खुल के नज़र आता है।

    उमा जी ने इन्हीं हालात को बखूबी लिखा है कि "अमृता एक टूटे हुए गीत की तरह हालात की आग में भस्म हो गयी फिर उसी भस्म से उभर कर अमर पक्षी फीनिक्स की तरह उगी,उड़ी और लम्बी दूरियां तय करती हुई वहां पहुंची जहां औरत की मर्ज़ी नहीं पूछी जाती,बस अनचाहे रिश्ते में उसको यूँ ही धकेल दिया जाता है। "
   कई बार यह प्रश्न दिल में आया कि साहिर न होते तो अमृता भी न होती और अमृता न होती तो साहिर पर इन दोनों के बीच जो इमरोज़ आज बन कर चलते रहे वह  उमा जी की लेखनी ने बखूबी इस में लिखा है साहिर से वो इश्क, वो दीवानगी जो एक साए से शुरू हुई, उनके साथ ताउम्र रही मगर सिर्फ एक साया बनकर। इमरोज़ कहते हैं कि इतने लम्बे सफ़र के दौरान साहिर नज़्म से बेहतरीन नज़्म तक पहुंचे,अमृता कविता से बेहतरीन कविता तक पहुँचीं,मगर ये जिंदगी तक नहीं पहुंचे।अमृता ने इसे ख़ामोशी के  हसीन रिश्ते का नाम दिया।
   उमा जी की लिखी इस क़िताब के एक पन्ने पर अमृता के जीवन के सफ़र में अपनी मानसिक हालात के अनुसार चार पड़ावों का जिक्र किया है ,पहला पड़ाव --- अचेतनता ,बाल बुद्धि जैसा , जिज्ञासापूर्ण दूसरा पड़ाव है --चेतनता ,जिसमे होता है रोष... एक दम प्रचण्ड,गलत मूल्यों से लड़ मरने वाला --- तीसरा पड़ाव है -दिलेरी--जो हारता नहीं, जो जीत की आशा बनाए रखता है और चौथा पड़ाव है -- अकेलापन ।यही अकेलेपन का उमा जी की किताब में प्रश्न चिन्ह है । हर इंसान की ज़िंदगी कभी भी मुक्कमल नहीं होती है , एक खालीपन जो कच्ची उम्र से मन पर छा जाए तो वो भरपूर जी लेने पर पर भी अकेला ही रखता है। फिर चाहे वह आसपास कितने ही लोगों से घिरा हुआ क्यों न हो । इस खामोशी को अकेलेपन को समझना वाकई आसान नहीं है।
   अपने वक़्त से आगे लिखने वाली अमृता की कलम जिन जिन विषय पर चली है उमा जी ने उनकी उन सभी खूबियों को इस क़िताब में फिर से याद दिलाया है ,जो अमृता प्रीतम को समझने वाले ,पढ़ने वाले के लिए एक उनकी सौवीं जयंती पर एक यादगार सहेज कर रखने लायक तोहफ़ा है। जैसे जैसे इस को पन्ना दर पन्ना पढ़ते जाएंगे अमृता के करीब खुद को और पाएंगे।
   यह क़िताब मुझे पढ़ते हुए ऐसा लगा जैसे अमृता प्रीतम के जीवन को नज़्म शैली में लिखा गया है ,जो उनके लिखे हुए हर उपन्यास ,कविता कहानी ,ख़त आदि के उन पलों के करीब ले आती है जो हम प्रत्यक्ष रूप में तो शायद इतना ध्यान नहीं रखते पर हमारे अवचेतन मन में उनकी लिखी वह हर सोच मौजूद रहती है ,फिर चाहे वह 36 चक हो ,गुलियाना हो ,साहिर हो ,सज्जाद हो या आज का वर्तमान इमरोज़ हो ।
   इतनी सुंदर क़िताब को लिखने के लिए उमा जी को बधाई ।

एक क़तआ अमृता के नाम
उमा त्रिलोक
सभ्या प्रकाशन
अभिनव इमरोज़
  

रंजू भाटिया



Wednesday, July 29, 2020

शुद्ध खाइये स्वस्थ रहिये

शुद्ध खाइये स्वस्थ रहिये

 पिछले कुछ महीनों से हम सब अपने अपने घरों के अंदर है , कोरोना महामारी के कारण , इस बीमारी जहां सबका आना जाना मिलना जुलना रोक दिया है, वहां एक बहुत जरूरी बात यह सिखाई है कि स्वस्थ शरीर तन ,मन है तो धन की व्यवस्था खुद ही हम आसानी से कर सकेंगे ।
    इस दौरान सब लोगों का बाहर खाना पीना बन्द हुआ ,घर मे ही सब हेल्थी वस्तुएं बनाने लगे  हैं। जिस से कई बीमारियों में लाभ हुआ है । पर घर पर भी खाना अच्छे स्वस्थ ढंग से बने और उनको बनाने  वाली चीजें प्योर ,सही हो तभी हम हेल्थ को अपनी सही रख पाएंगे ।
    इस वक़्त के दौरान  आत्मनिर्भर और "मेड इन इंडिया "का नारा भी हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी द्वारा दिया गया। बहुत से लोग वापस अपने गांव ,धरती ,खेतों की और लौटे हैं । आज ऐसा ही परिचय मैं अपने इस लेख में आपका "नरेंद्र चौधरी जी "से करवाती  हूँ । मैं इनसे लगभग पिछले दो साल से पीली सरसों का तेल और गुड़ और तिल ले रही हूं ,जो इनके अपने खेतों की पीली सरसों और गन्ने से बना हुआ है । बिल्कुल शुद्ध और साफ ,यह इतना है कि इनके इस्तेमाल के बाद मुझे और किसी ब्रांड का तेल ,गुड़ ,आदि इस्तेमाल करने की इच्छा नहीं हुई ।
       मैं इनसे फेसबुक पर इनके द्वारा भेजे किसी को गुड़ की पिक्चर को देख कर ही जुड़ी । हम शहरों में रहने वालों को अब तक हर चीज मिलावटी ही मिलती और लगती है , सो बहुत सोच विचार के बाद इनको 5 लीटर पीली सरसों के तेल और गुड़ का ऑर्डर दिया । पर मंगवा कर दिल खुश हो गया ,लगा कि वाकई कोई शुद्ध बिना मिलावट के चीज खाई है।
   नरेंद्र जी भवालपुर बासली के रहने वाले हैं । यही पर इनके खुद के खेत हैं ,वैसे यह नोएडा में रह कर जॉब भी करते हैं । यह काम इन्होंने साइड बिजनेस के रूप में शुरू किया है । पर मेरे अपने ख्याल से इन्हें अब अपने इन्हीं खेतों की और लौट जाना चाहिए ताकि लोगों को शुद्ध तेल ,सिरका ,गुड़ ,तिल घी व अन्य चीजें विश्वसनीय तरीके से मिल सकें । इनके द्वारा दिया गया पीली  सरसों का तेल को दिल्ली से बड़े बड़े हॉस्पिटल के डॉक्टर अपने खाने मे इस्तेमाल करते हैं ।जैसे डॉक्टर सुभाष शल्य जी अपोलो हॉस्पिटल,
डॉक्टर विवेक पाठक जी बत्रा हॉस्पिटल
डॉक्टर नैगी जी बत्रा हॉस्पिटल
डॉक्टर दीपक जी मैक्स हॉस्पिटल आदि और भी बहुत से जाने माने लोग इसी तेल को भरोसे और तस्सली के साथ इस्तेमाल  कर रहे हैं । शुद्ध पीली  सरसों के तेल की पहचान इसकी खुशबू से और चिकनाई से की जा सकती है ,यदि उसको हाथ मे मलने से कोई रंग आ जाता है तो वो नकली है । इस तेल की महक और शुध्दता खाना बनाने में भरपूर स्वाद देती है । गुड़ भी पूरी तरह से ऑर्गेनिक है , इसकी शुध्दता का पता आप इसको खाते ही बता सकते  हैं ,इसमे किसी तरह के केमिकल का इस्तेमाल नहीं किया गया है ।
   आज का वक़्त बहुत सारी चुनोतियों को ले कर आया है और इस वक़्त जो ईमानदारी और अपनी मिट्टी से जुड़ कर काम करेगा वह जीत जाएगा ।
    नरेंद्र जी एक ईमानदार सरल इंसान के साथ बहुत मेहनती   किसान है जो लोगों को शुद्ध सामान पहुँचाने का एक प्रयास कर रहे हैं वो भी सिर्फ अपनी बाईक से । वह अपने गाँव में शुद्ध सामान बनाते हैं और दिल्ली,  एन सी आर,आगरा,मध्य प्रदेश,मुम्बई, हरिद्वार, ऋषिकेश मे डिलीवरी करते हैं ।उनका खूबसूरत कथन है कि "आप भी मेहनत तो करके देखें , बेरोज़गारी की आवाज उठाने से पहले । लोगों को रोजगार की कमी है लेकिन मैं कहता हूँ लोगों को काम नही करना है कामचोरी करनी  है इसी लिये वो बेरोजगार है । मेहनत करो रोजगार के दरवाजे खुले हैं । "
    कितनी अच्छी और सच्ची बात है । जब ऐसी सोच रखने वाले युवा किसान हो तो इनको आगे बढ़ने से पहले कोई नहीं रोक सकता है । सरल व्यक्तित्व वाले नरेंद्र चौधरी के साथ उनका पूरा परिवार भी  सहयोग करता है। उनकी पत्नी पूनम और माता जी साथ मिल कर इस व्यवसाय को आगे बढाने में लगे हैं। हमारे "आत्मनिर्भर भारत " का सपना आखिर इन्ही तरह के लोगों के साथ ही सच हो सकता है । आप  नरेन्द्र चौधरी जी से जो खुद को "पीली सरसों के तेल वाले " के नाम से पहचान देतें हैं ,उनसे आप यह समान पूरे विश्वास और शुध्दता के साथ ले सकते हैं। इस "कोरोना काल "में वह पूरी सावधानी के साथ आपके घर तक समान पहुंचाने के लिए प्रयासरत हैं। इस वक़्त जो भी सुरक्षा के नियम है वह उसको पूरी तरह से अपना कर आपके घर के दरवाजे तक मास्क और ग्लव्ज का उपयोग कर रहे हैं ।

1 पीली सरसों का शुद्ध तेल
2 आर्गेनिक गुड़
3 ओग्रेनिक शक्कर
4 ओग्रेनिक सिरका
5 भैस का शुद्ध  घी
6 गाय का शुद्ध घी

  सम्पर्क नरेन्द्र चौधरी
7503209313
7011269552
शुद्ध खाओ ,स्वास्थ रहो जीवन अनमोल हैं।

 
   

Tuesday, July 28, 2020

अमृता प्रीतम की बेस्ट 10 कहानी ,उपन्यास ( जरूर पढ़ें)

अमृता जी का लिखा अक्सर भटकते दिल का सहारा बन जाता है ..इन पंक्तियों में ज़िन्दगी को दर्शन दे सकने का होंसला है और दर्द से पीड़ित मानव दिल की व्यथा भी है .एक पाठक ने तो यहाँ तक कहा कि अमृता के लिखे में कहावतें बन सकने का जज्बा है ।आज उन्हीं के लिखे दस उपन्यासों ,कहानियों और नज्मों की वह पंक्तियाँ जो ..दिल में कभी सकून कभी दर्द की लहर पैदा कर देती हैं ।औऱ उन्हें पढ़ने का दिल हो आता है । वैसे तो उनका लिखा हुआ सब बार बार पढ़ने को दिल होता है , उन्होंने सौ से ऊपर किताबें लिखी और अनुवादित की। यह हमारे साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं।
 

1)"हमारी मंडियों में गेहूं भी बिकता है ,ज्वार भी बिकती है ,और औरत भी बिकती है .....आर्थिक गुलामी जब औरत को दास बनाती है ,वही दासता फिर मानसिक गुलामी बन जाती ..मानसिक गुलामी जब नासूर बनती है तब लोग नासूर के बदन पर पवित्रता कि रंगीन पोशाक पहना देते हैं ,और यह पवित्रता जो खुद मुख्तारी में से नहीं ,मज़बूरी में से जन्म लेती है .समाजी खजाने का सिक्का बन जाती है ,और समाज हर औरत को इस सिक्के से तोलता हैं .."
कहानी ( *आखिरी ख़त से )

२)"औरत का पाप फूल के समान होता है ,पानी में डूबता नहीं ,तैर कर मुहं से बोलता है ..मर्दों का क्या है ,उनके पाप तो पत्थरों के समान पानी में डूब जाते हैं ..."

कहानी ( *न जाने कौन रंग रे से )

3)"मर्द मर जाए तो भले ही औरत के सभी अंग जीवित रहते हैं ,पर उनकी कोख अवश्य मर जाती है .."

कहानी (* तीसरी औरत से )

4)"इस दुनिया के सुनार सोने में खोट मिलातें हैं ,दुनिया उनसे कुछ नहीं कहती है पर जब इस दुनिया के प्रेमी सोने में सोना मिलाते हैं ,तो दुनिया उनके पीछे पड़ जाती है .."

कहानी (*मिटटी की जात से )

5)"मिटटी की जात किसी ने न पूछी ..एक कल्लर घोडी पर चढ़ कर एक चिकनी मिटटी को ब्याहाने आ गया"

कहानी (* मिटटी की जात से )

6)"ब्याह के पेशे में किसी की तरक्की नहीं होती ....बीबियाँ सारी उम्र बीबियाँ ही रहती है ..खाविंद सारी उम्र खाविंद ही बने रहते हैं ..तरक्की हो सकती है ,पर होते कभी देखा नहीं ..यही कि आज जो खाविंद लगा हुआ है ,कल महबूब बन जाए .कल जो महबूब बने ,परसों वह खुदा बन जाए .रिश्ता जो सिर्फ रस्म के सहारे खडा रहता है ,चलते चलते दिल के सहारे खडा हो जाए ...आत्मा के सहारे ......"

कहानी (* मलिका से )

7)कुछ उदासियों की कब्रें होतीं हैं ,जिनमे मरे हुए नहीं जीवित लोग रहते हैं ..अर्थों का कोई खड्का नहीं होता है .वे पेडों के पत्तों की तरह चुपचाप उगते हैं .और चुपचाप झड़ जाते हैं ...

कहानी (* दो खिड़कियाँ से )

8)औरत जात का सफरनामा : कोख के अँधेरे से लेकर कब्र के अँधेरे तक होता है ?

उपन्यास (* दिल्ली की गलियाँ से )

9)औरत की कोख कभी बाँझ नहीं होगी ॥अगर औरत कि कोख बाँझ हो गयी तो ज़िन्दगी के हादसे किसके साथ खेलेंगे ?

उपन्यास (* बंद दरवाजा से )

है न इन पंक्तियों में कुछ कहने का वह अंदाज़, जो अपनी ही ज़िन्दगी के करीब महसूस होता है .....उनका कहना था कि आज का चेतन मनुष्य उस पाले में ठिठुर रहा है ,जिस में सपनों की धूप नहीं पहुंचती ..समाजिक और राजनीतिक सच्चाई के हाथों मनुष्य रोज़ कांपता है टूटता है ...सोचती हूँ कोई भी रचना ,कोई भी कृति ,धूप की एक कटोरी के पीने के समान है या धूप का एक टुकडा कोख में डालने की तरह है और कुछ नहीं ,सिर्फ़ ज़िन्दगी का जाडा काटने का एक साधन ...

10)उन्ही लिखी एक किताब से यह नज्म है ,जो उनकी यह पंक्तियाँ पढ़ कर याद आई ...

बदन का मांस
जब गीली मिटटी की तरह होता
तो सारे लफ्ज़ ----
मेरे सूखे होंठों से झरते
और मिटटी में
बीजों की तरह गिरते ....
मैं थकी हुई धरती की तरह
खामोश होती
तो निगोड़े
मेरे अंगों में से उग पड़ते
निर्लज्ज
फूलों की तरह हँसते
और मैं ..........
एक काले कोस जैसी
महक महक जाती ...

अगर प्यार कोई शब्द है तो अमृता ने उसे अपनी कलम की स्याही में बसा लिया था. अगर वह कोई स्वर है तो वह अमृता के जीवन का स्थाई सुर रहा. जिस तरह अमृता ने इमरोज के लिए यह कहा कि अगर स्वाधीनता दिवस किसी इंसान की शक्ल ले सकता है, तो वह तुम हो. ठीक उसी तरह प्रेम अगर किसी इंसान की शक्ल में आए तो उसकी शक्ल अमृता जैसी होगी.


Saturday, July 25, 2020

बेस्ट दस किताबें "मेरी शीशे की अलमारी से "


बड़ी बेचैन रहती हैं क़िताबें
उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है
जो कदरें वो सुनाती थी कि जिनके
जो रिश्ते वो सुनाती थी वो सारे उधरे-उधरे हैं
किताबें और उनको पढ़ना अब ज़िन्दगी से कम होता जा रहा है,उसकी जगह किताबें झाँकती हैं बंद आलमारी के शीशों से
(गुलज़ार)

पर मेरे लिए यह किताबों की दुनिया कभी अजनबी नहीं रही , किस्से ,कहानियां ,और उनको पढ़ने का रोमांच मुझे बहुत छोटी उम्र से आकर्षित करता था । याद आता है बचपन में चंपक, नंदन , लोटपोट ,चंदामामा , दीवाना आदि खूब पढ़ते थे। मेरी बड़ी मासी कर घर में एक स्टोर रूम में यह किताबें भरी रहती थी और हम भाई बहनों में इन्हें सबसे पहले और सब पढ़ने की होड़ होती थी।
फिर कॉलेज टाइम में धर्मयुग, कादम्बनी आदि पढ़नी शुरू की उसके साथ ही "अमृता प्रीतम और शिवानी" को पढ़ने का चस्का लग गया । फिर यह पढ़ने की यात्रा रुकी नहीं है अब तक ।

 हर किताब ज़िन्दगी के किसी न किसी बात को बताती है ,और हम उस किताब से कुछ न कुछ सीखते जरूर हैं ,ऐसा मेरा मानना है । पर कौन सी ऐसी खास किताबें हैं जिन्होंने मुझे बहुत प्रभावित किया तो काम कुछ मुश्किल जरूर है ,पर आज के इस लेख में जो पूर्वा भाटिया के लिखे  blueskydreamers(https://www.blueskydreamers.com/)
 में लिखे से प्रभावित है ,(जिसमे उन्होंने अपनी पढ़ी बीस बुक्स का जिक्र किया ,बहुत पसंद आया यह लेख ) कुछ अपनी पसंद की किताबें तो मैंने 2 से अधिक बार भी पढ़ी है ,जैसे,रसीदी टिकट ,बुखारी, परिणीता, मुझे चांद चाहिए आदि । पर ज़िक्र अभी सिर्फ 10 किताबों का

1 रसीदी टिकट ( अमृता प्रीतम)
अमृता प्रीतम की यह आत्मकथा बेबाकी से अपनी ज़िंदगी की सच्चाई बताती है । मैंने इसको कई बार पढ़ा पर पहली बार पढ़ कर यह जाना कि सच हमेशा सच ही होता है ,उसको कहने से डरना ,झिझकना क्या , रसीदी टिकट का हर पन्ना बयां करता है कि कैसे अमृता ने एक स्त्री होते हुए, बन्धनों के बीच, बन्धनों का सशक्त विरोध किया। अन्याय और असमानताओं के खिलाफ लिखती – बोलती रहीं।एक स्त्री, एक मां, एक प्रेमिका और एक लेखिका होने के बीच उलझतीं रही और निकलने को राह भी बनाती रहीं। उनके लिए, जीवन यथार्थ से यथार्थ तक पहुंचने का सफर रहा। यथार्थ को पाने का हासिल, आखिर कितनों का मकसद होता है और कितने उसे छू भर भी पाते हैं? अमृता जैसी साहसी लेखिका कागज पर काले अक्षरों से सुनहरा इतिहास लिख जाती हैं और हम पन्ने पलट – पलट कर उनकी छाया का महज अनुमान लगा सकते हैं

2 ) 36 चक (अमृता प्रीतम)

रूहानी प्रेम क्या होता है ,यह इस किताब को पढ़ कर जाना ,इसमे लिखे कई पन्ने मुझे हमेशा इस किताब के बारे में सोचते ही याद आ जाते हैं, अलका , कुमार और कॉफी की खुशबू ,पहाड़ी घर में लगे उन फूलों सी महकने लगती है । एक चित्रकार कुमार और  अलका के बीच बनते बिगड़ते रिश्ते की, एक औरत के विश्वास की, स्वतंत्र और स्वछंद मर्द की मानसिक वेदना और स्त्री - पुरुष संबंधों की अंतर्वेदना की यह एक अत्यंत मर्मस्पर्शी कहानी है जो हर किसी के दिल को छू लेती है|

3) बुखारी (श्यामल चटर्जी )

प्राकृतिक आपदाओं के कारण ही हर रोज दुनिया के सबसे ऊँचे युद्धक्षेत्र में माइनस चालीस- पचास डिग्री ...पर रहना और थोड़ी सी गर्मी पाना ,उस वक़्त की सबसे बड़ी जरूरत लगती है ,विपरीत हालात में ज़िन्दगी को जीने का तरीका बताती यह भारतीय सैनिकों के झेले हालात हमेशा सकरात्मक सोच से भर देते हैं मुझे । यह किताब भी मैंने जब जब खुद को जब भी अधिक नेगिटिव पाती हूँ तो इसको पढ़ते ही हालात से लड़ने की ताकत आ जाती है।

4) खानाबदोश (अजीत कौर)

अजीत कौर पंजाबी की उन लेखिकाओं में हैं जिनका नाम बहुत ही सम्मान के साथ लिया जाता है। इन्होंने कई किताबें लिखी है जो मुख्य रूप से स्त्री वादी कही जाती है ,खानाबदोश और कूड़ा कबाड़ा इनकी आत्मकथा हैं जिनके ऊपर tv सीरयल भी बनें ।

5)आपका बंटी (मन्नू भंडारी)

 आपका बंटी मन्नू भंडारी के बेहतरीन उपन्यासों में  एक है।  (1970 में) लिखा गया यह उपन्यास आज भी नया लगता है ,बंटी और शकुन की कहानी आज भी नई लगती है ।बच्चों के मनोविज्ञान को समझने के लिए यह उपन्यास बहुत बढ़िया है।

6) क्या भूलूँ क्या याद रखूं (हरिवंशराय बच्चन)

बच्चन जी की आत्मकथा सीरीज में यह चार भाग है । चारों ही एक से बढ़ कर एक । आत्मकथा लिखना कोई आसान काम नहीं है ,सच्चाई से सब बातें दुनिया को बताना कोई कोई ही कर पाता है । पहली पत्नी श्यामा और फिर तेजी बच्चन के बारे में पूरी रोचक जानकारी इन्हीं से मिली । जब इसका पहला भाग यह पढ़ते हैं तो बाकी 3 भाग पढ़ने को उत्सुक हो जाते हैं। नीड़ का निर्माण फिर', 'बसेरे से दूर' और 'दशद्वार से सोपान तक' । इनको पढ़ने से न केवल उनके जीवन के बारे में बल्की पूरे उस वक़्त के समय ,जीवन के बारे में समझा जा सकता है।

7 ) चीड़ों पर चाँदनी (निर्मल वर्मा)

यह एक यात्रा वृतांत है जो लेखक निर्मल वर्मा ने यूरोप के दौरे पर लिखा है।  निर्मल वर्मा ने जो 60 के दशक में यूरोप की यात्रा पर थे उस वक़्त की अपनी यात्रा संस्मरण लिखा पढ़ने पर ऐसा  लगता है कि एक के बाद एक शहर कर बारे में पढते जाओ, और यूँ लगेगा  कि आप उसे अपनी आंखों से देख रहे हो। यह ट्रेवेल करने वालों के लिए एक रोचक किताब है ।

8) पचपन खम्बे लाल दीवारें ( ऊषा प्रियम्वदा)

यह उपन्यास मैंने दो बार पढ़ा । पहली बार कॉलेज टाइम में ,फिर दूरदर्शन पर यह दिखाया गया ,उसमे मीता की एक्टिंग देखने लायक थी । उसको देखने के बाद फिर दुबारा इसको पढ़ा ,एक भारतीय औरत की  सामाजिक ,और आर्थिक विवशता की घुटन इस को पढ़ कर ही समझी जा सकती है ।इसके बारे में एक पंक्ति अक्सर कही जाती है कि 'आधुनिक जीवन की यह एक बड़ी विडंबना है कि जो हम नहीं चाहते वही करने को विवश हैं। इन्हीं हालात को बहुत ही सुंदर ढंग से इस उपन्यास में बताया गया है।

9) मुझे चाँद चाहिए( सुरेंद्र वर्मा)

चाँद ,यह एक ऐसा नाम है जो मेरे ख्याल से एक बार सबको ज़िन्दगी में चाहिए ।यह उपन्यास भी निराशा में आशा का संचार करता है । इसमे आयी कुछ पंच पंक्तियों से इसको बखूबी समझा जा सकता है  जैसे "ख़ुशी का कोई स्विच नहीं होता वह अपने आप पनपती है। उसके लिए अवसर तो देना होगा न।"और ज़िन्दगी में जब हार लगने लगे तो अपने विश्वास के चाँद को तलाशना ही पड़ेगा।

10) लेडीज कूपे --(अनिता नायर )

अनिता नायर का यह उपन्यास ,उस
अखिला की कहानी है जो पैंतालीस साल की, अकेली, इन्कम टैक्स क्लर्क, और एक औरत जिसे कभी अपनी ज़िंदगी जीने की इजाज़त नहीं मिली– हमेशा किसी की बेटी, बहन, मौसी, रही। फिर एक दिन वह समुंदर  किनारे बसे शहर कन्याकुमारी के लिए निकल लेती है । ज़िंदगी में पहली बार शानदार ढंग से अकेली रहती है और निश्चय करती है कि वह खुद को हर उस बंधन से आज़ाद कर लेगी जिससे रूढ़िवादी तमिल ब्राह्मण ज़िंदगी ने उसे बांध रखा है। ट्रैन के कूपे में अलग अलग 5 औरतों की कहानी अंत तक इस उपन्यास से बांधे रखता है ।

आप भी इस लिस्ट में अपनी पसंद की किताबें बताएं । क्योंकि पढ़ी हुई किताबों की खुशबू ही अलग होती है । नेक्स्ट  भाग में ट्रेवल की दस बेस्ट किताबों की बात करेंगे ,मेरी शीशे की अलमारी से झांकती किताबों से
 







Wednesday, May 27, 2020

Zindagi in 2020 ( कैसे बचें इस महामारी से )

कोरोनावायरस महामारी से सुरक्षित रहने के सरल तरीके
 
साल 2020 शुरू हुआ तो किसी ने सोचा नहीं था कि यह साल इस तरह से पूरी दुनिया पर आफत बन कर लोगों को एक डर के साये में धकेल देगा । यह साल पूरी दुनिया के लिए" कोरोना साल" बन गया है । कोरोना महामारी ,जिसका अभी तक कोई इलाज़ नहीं है। वही धीरे धीरे पूरे विश्व को अपनी गिरफ्त में लेता जा रहा है।
   चीन से शुरू हुई यह बीमारी जो बताया जा रहा चमगादड़ के सेवन से शुरू हुई ।और फिर एक इंसान से दूसरे इंसान तक फैलती चली गयी । यदि शुरू में ही इस बीमारी की गम्भीरता को समझ लिया जाता तो इतना दुनिया को नुकसान नहीं होता। पर पहले चीन के वुहान शहर जहां से यह महामारी शुरू हुई ,उन्होंने ही समझने में देर कर दी । जब तक यह समझ आती तब तक यह वहाँ तो इंसान की जान का काफी नुकसान कर ही चुकी थी । उस के बाद यह बाकी दुनिया को अपने चपेट में लेने लगी । अब तक कभी न देखे गए विश्व के इतिहास में यह वक़्त सबसे बड़ा लॉकडाउन  साबित हो रहा है ।
    पूरे विश्व की नेशनल ,इंटरनेशनल फ्लाइट कैंसिल कर दी गयी हैं । ताकि पूरी दुनिया के लोग सुरक्षित रह सकें । मानव इतिहास में पहली बार एक साथ ,एक ही तरह की ज़िंदगी पूरी दुनिया का एक ही चक्र चल रहा है । सब अपने अपने घरों में कैद है । से
ल्फ आसिलोएशन ,"सेल्फ अलगाव व्यवस्था ,"सब देश की सरकारों ने एक साथ कर दी है ।
    आइए पहले समझते हैं कि किस तरह से यह बीमारी फैलती है। यह बीमारी सर्दी खांसी और बुखार से शुरू होती है ,और फिर हमारे सांस लेने की प्रक्रिया को प्रभावित करने लगती है । फेफड़े जो हमें सांस ले के जीवन दान देते हैं वह तेजी से इसकी गिरफ्त में आ जाते हैं और वही सबसे अधिक खतरे की घन्टी है। फेफड़ों में तेजी से रेशा जमा होने लगता है और यह सांस लेने में दिक्कत करने लगता है।  फिर सांस के लिए वेंटीलेटर का सहारा जरूरी ही हो जाता है।
     इस बीमारी से बचाव के तरीक़े में जो किया जा सकता है वह है सेल्फ ,सम्पूर्ण "लॉकडाउन ", जो हर देश मे अब तक लागू हो चुका है । इसके प्रमुख लक्षणों में तेज सूखी खांसी ,बुखार और फिर सांस लेने की तकलीफ होने लगती है। यह लक्षण मुख्यता 14 दिन में एक इंसान में दिखाई देते हैं । और जब कोई व्यक्ति इस से संक्रमित होता है तो ,दूसरे व्यक्ति में यह छींक ,या खांसी से दूसरे व्यक्ति को दे देता है ।  इसलिए इस वक़्त समाजिक अलगाव यानी सोशल डिस्टेंस रखना बहुत जरूरी है । तभी हम इस वायरस की संक्रमण को रोक सकते हैं ।
   यह वायरस अलग अलग सतह पर अलग टाइम तक जीवित रहता है। इसलिए इस से बचने के लिए घर मे लायी गयी वस्तुओं का भी सेनिटाइज़ करना भी जरूरी है ।
   अब जानते हैं इस महामारी से बचने के वो सरल उपाय क्या है ,जिन्हें हम इस वक़्त अपना कर बच सकते हैं ।
 नम्बर एक सबसे पहले यह कि अपने अपने घरों में रहे । सरकार जो इस वक़्त आदेश दे रही है इसका सख्ती से पालन करें। यह वायरस ,घर मे बुजुर्ग सदस्यों को आसानी से चपेट में ले लेता है । रोज़ देखने वाली खबरों में हम ,इटली,स्पेन , ब्रिटेन ,और अमेरिका का हाल देख रहे हैं । वहां लॉक डाउन को बहुत अधिक गम्भीरता से शुरू में नहीं लिया गया ।जिस से वहां के हालात बहुत डरावने बन चुके हैं । यह वायरस इमन्युटी कम वाले व्यक्तियों पर आसानी से हमला करता है और साठ साल से ऊपर वालों में यह इमन्युटी कम होती है । इसलिए घर में ही रहे और अपने घर मे रहने वाले बुजुर्ग और बच्चों का ध्यान रखें ।
   घर में रहते हुए इस वायरस से बचने के लिए सफाई का ध्यान रखना वहुत जरूरी है । घर के दरवाजे के हेंडिल ,कॉल बेल साफ ,साबुन के पानी से करते रहें । घर में फिनायल के पानी से फर्श साफ करना वहुत जरूरी है । और उसके बाद अपने हाथों को 20 सेकेंड तक धोना बहुत जरूरी है। हाथ हर वक़्त डिटोल से धोएं या साधरण साबुन से पर बिना हाथों को धोएं न खाना बनाये न खाएं ।
    वैसे तो घर से बाहर न ही जाएं तो बेहतर है पर यदि जरूरी जाना ही है तो मास्क लगाएं ,यह मास्क बाजारी भी हो सकते हैं और यदि नहीं मिल रहे है तो घर में बने मास्क को लगाए बिना न निकलें । हाथ मे हो सके तो ग्लव्स जरूर पहनें , ताकि जो समान आप ले कर आ रहे है उस मे कोई वायरस या सक्रमण है तो बचा जा सके । इसके साथ ही जो सबसे जरूरी बात है कि अपने चेहरे ,आंख , नाक मुहं को हाथ मत लगाएं। घर आ कर सबसे पहले ग्लव्स कूड़ेदान में फेंके और साबुन से हाथ साफ करें । यदि घरेलू मास्क है तो वह धो कर दुबारा इस्तेमाल किया जा सकता है परंतु सर्जिकल मास्क का बार बार उपयोग न करें । यह आपको बीमार कर सकता है ।
   घर जो भी समान लाये जैसे सब्ज़ी,दूध के पैकेट इनको पहले चलते पानी मे धोए और कुछ घण्टे यूँ ही रहने दे फिर इस्तेमाल करें । दूध के पैकेट को धो कर खोल कर उबाल सकते हैं , पर सब्ज़ी को आप नमक हल्दी के पानी मे रख कर फिर सूखा कर ही फ्रिज में रखे ।
    इस महामारी से बचने के लिए इमन्युटी का स्ट्रांग होना बहुत जरूरी है । इस के लिए पौष्टिक घर का बना ही खाना खाएं और गर्म पानी का सेवन करें । हमारे देश मे हल्दी ,अदरक लौंग,काली मिर्च सदियों से सर्दी भगाने के लिए इस्तेमाल होती आ रहीं है इनको लेने की आदत डालें । ठंडे पानी ,ठंडी चीजों और बासी खाने से बचे । कोई ऐसी वस्तु इस वक़्त न खाएं जो गले मे खराश या बुखार का कारण बने ।
    यह कुछ छोटे पर महत्वपुर्ण उपाय हम खुद से करके इस वक़्त खुद को जब तक बचा सकते हैं बचाये । जब तक इस महामारी की कोई दवा या वैक्सीन नहीं आ जाती है तब तक इस वायरस से सावधान रहना जरूरी है । इन्हें अपना कर अपना ध्यान रखें और अपने घर के बुजर्गों और छोटे बच्चों का ध्यान रखें।