Thursday, September 12, 2019

आग के अक्षर ( हरकीरत हीर) पुस्तक समीक्षा (क्षणिका संग्रह)

मुझे आज ही हीर जी किताब "आग के अक्षर " मिली । मैंने उनको मेसज किया कि ,किताब तो मुझे मिल गयी है , पर कुछ अस्वस्थ और कुछ निजी व्यवस्ता के कारण मैं इसको बाद में पढूंगी और इस पर  भी आपके भेजे "हर संग्रह "की तरह इस पर लिखूंगी भी जरूर । फिर मैंने यूँ  ही पन्ने पलटते हुए जो सबसे पहले क्षणिका पढ़ी वह थी "उडारी " पढ़ कर मेरी आँखें नम हो गयी । फिर तो पन्ना दर पन्ना पढ़ती गयी और आंखे कभी भीगी कभी कुछ पढ़ कर दिल को सकून मिला ।
       कई सारे अक्षर
    रखे हुए थे धूनी के आगे
    मैंने आग के अक्षर
     चुन लिए ...!!

     जो दिल से किताबें पढ़ते है वो जानते है कि किताबें उनसे उनकी रूह से बातें करती हैं। मेरे लिए "हरकीरत हीर "जी की हर किताब ऐसी ही महसूस होती है । उनमें लिखे हर शब्द में जैसे लगता है कि मैं और उनकी किताब "दो सहेली" की तरह आपस मे दुख सुख बांट रही हैं । मैं ही क्यों जिन लोगों ने भी ज़िन्दगी को हर रंग में करीब से महसूस किया है वह उनकी लिखो नज्मों ,क्षणिकाओं को पढ़ कर जैसे और भी ज़िन्दगी के उन एहसासों को जी लेता है ,जैसे यह उसके मन की बात हो । 
  मुझे उनकी किताब जो इस बार क्षणिकाओं पर है ,"आग की बात " वह एक बेमिसाल किताब लगी । वैसे तो उनके लिखे सभी संग्रह संजों कर रखने लायक हैं । जो कभी भी पढ़ो हर बार नए अर्थ दे जाते हैं। पर आग के यह अक्षर उन तमाम स्त्री जाति की कलम के नाम है जो अपनी कलम से ज़िन्दगी के उन पहलुओं से लड़ने का हौंसला रखती है । इस संग्रह में स्त्री के दिल की सभी भावनाएं लिखीं है उनकी कलम ने ,चाहे वह दर्द हो ,चाहे प्रेम के रूप ,या वो घुटन जो एक औरत के अंदर घुटती हुई दम तोड़ती रहती है । 
  हीर जी के लिखे में अमृता प्रीतम की छवि अक्सर नज़र आ जाती है । जैसे उनके बाद लिखने की कड़ी को वह आगे बढ़ा कर लिख रही हों । इस संग्रह में सभी क्षणिकाएं बेमिसाल है। पर कुछ क्षणिकाओं के पढ़ते ही आंखे नम हो गयी । जैसा कि मैंने लिखा कि किताब पढ़ना वही सार्थक है जिस से आप जुड़ जाओ या आपको लगे कि यह बात तो मैं भी कहना चाहती हूं पर मेरे पास उन भवानाओं को व्यक्त करने के लिए उचित शब्द नहीं है । जैसे कि यह 
गूंगे नहीं है 
शब्द मेरे 
बस इसलिए मौन रहे ताउम्र
क्योंकि विदा करते वक़्त 
माँ ने 
सिल दिए थे होंठ मेरे ....

वक़्त आज भी उसी तरह से कई  औरतों की ज़िंदगी मे खड़ा है जैसे कई सदी पहले था। चाहे आज हम चाँद पर पहुंचने का दावा कर लें । माँ से होंठ सिले जाने की दुहाई है तो दूसरी एक क्षणिका उडारी में बाबुल से कितनी सच्चाई से उन उस दर्द को व्यक्त कर दिया है जहां एक लड़की अक्सर बेबस हो जाती है । 
तेरे घर से 
विदा होते वक़्त 
छोड़े जा रही हूं मैं अपने पंख 
बाबुला.... 
जो कभी बुलाओ तो याद रखना 
अब नहीं होगी मेरे पास 
पंखों की उडारी.....
कैसे इस को पढ़ कर आंखे नम न होंगी। चाहे आज नारी आज़ाद होने के दावे करे पर फिर भी अधिकांश इन्ही दो हालातों से अभी भी गुजर रहीं हैं। एक स्त्री अपना पूरा जीवन घर ,और उनके सदस्यों को संवारने में लगा देती है । और बदले में वह सिर्फ प्रेम और सम्मान चाहती है । पर इस समाज की ईगो इतनी बड़ी होती है कि वह भी उसको देने में कंजूसी कर देता है । 
कुछ न चाहा था 
बस चाही थी ज़रा सी मुहब्बत
इक ज़रा सा सम्मान
जरा सी छत...
बदले में मंजूर था 
ताउम्र तुम्हारी हुकूमत
की कैद ...

पर अफसोस वही सम्मान और प्रेम उसको या तो मिलता ही नहीं या एहसान के साथ मिलता है। 
    हीर जी के लेखन में एक बहुत खास बात है कि उनके लिखे शब्द जब भी अपनी बात कहते हैं वह उस लिखे के प्रयोजन को स्पष्ट कर देते हैं । फिर चाहे वह आक्रोश हो चाहे प्रेम या नारी  के अस्तित्व की बात । बहुत ही गहरे अर्थ में वह चुपके से अपनी बात कहती आपके दिल मे घर कर जाती हैं। 
उसने कहा
चुप रहो तुम
मैंने सी लिए अपने होंठ
अब तुम ही कहो
इन सुलगते अक्षरों को
कागज़ पर न रखूँ
तो कहाँ रखूँ...??

गहरे असर के साथ लिखी इन पक्तियों में आक्रोश भी है और अपने दिल की बात भी । इस संग्रह में जो उन्होंने प्रेम पर लिखा है वह सीधे दिल में उतर जाने वाला है । 
ये कौन
दे गया दस्तक
बरसों से बन्द दरवाज़े पे
कि ज़िन्दगी...
मुहब्बत के पैरहन 
सीने लगी है....
प्रेम ,  नारी अस्तित्व ,  सामाजिक विषय , आज कल के धर्म के हालात , और हमारे आसपास घटने वाली सभी घटनाएं उनके इस संग्रह में बखूबी से लिखी गयी है। छोटी छोटी यह क्षणिकाएं ज़िन्दगी के हर पहलू से रूबरू करवा देती हैं । 
मेरे अपने ख्याल से हर उस इंसान को जो किताबों से खासकर इस क्षणिका विधा से प्रेम करता है इस संग्रह को जरूर पढ़ें । 
अयन प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह संग्रह आप जरूर पढ़ें 
क्योंकि 
ये नज्में...
उम्मीद हैं....
दास्तां है....
दर्द हैं....
हंसीं है....
सजदा हैं....
दीन हैं....
मज़हब है....
ईमान हैं...
खुदा....
और 
मोहब्बत का जाम भी हैं!!
 
क्षणिका संग्रह
लेखिका  - हरकीरत हीर
आग के अक्षर 
अयन प्रकाशन
मूल्य 400 rs 

Monday, September 09, 2019

एक अनूठे तोहफे की बात ,स्त्री मन की चाह के साथ ( भाग 6)

स्त्री मन की यह बातें दिल मे ही एक कहानी बुनते रहते हैं । 
यह शब्द दर्द में भीगे हुए बरसते रहते हैं ,ज़िन्दगी अपनी रफ़्तार पकडती रहती है ,जब जब पुरुष प्रेम उमड़ता है तो वह तोहफे देने का भी मौका नहीं छोड़ना चाहता पर स्त्री जो अब तक अपनी घर गृहस्थी में डूबी हुई खुद को ही भूल चुकी है वह अचानक से जैसे जाग जाती है और कह देती है एक मासूम सी फरमाइश जो उसके अस्तित्व से जुडी हुई है 

यह शब्द दर्द में भीगे हुए बरसते रहते हैं ,ज़िन्दगी अपनी रफ़्तार पकडती रहती है ,जब जब पुरुष प्रेम उमड़ता है तो वह तोहफे देने का भी मौका नहीं छोड़ना चाहता पर स्त्री जो अब तक अपनी घर गृहस्थी में डूबी हुई खुद को ही भूल चुकी है वह अचानक से जैसे जाग जाती है और कह देती है एक मासूम सी फरमाइश जो उसके अस्तित्व से जुडी हुई है 

शादी की सालगिरह,
और उनका यह मुस्करा कर पूछना
आज तुमको किन गहनों से सज़ा दूं
"ला दूँ  साड़ी" या फिर बोलो तो डियर
किसी "'नई मूवी "'की टिकट बुक करवा दूं?

मैने कुछ मुस्करा के
अपनी नज़रें रसोईघर में उलझा ली
यादों की खुली जैसे कोई पिटारी
और एक बार फ़िर से  
दिल ने बीती बातें दोहरा ली,
याद आई
वो शादी की घड़ी सुहानी
जब छोड़ बाबुल के नाम की पहचान
बनी मैं तेरे नाम की कहानी।

बसा के तन मन में तुझको
हर पल इस घर को संवारा 
महका के फूलो से इसकोअपना अस्तित्व इसमें ही बिसारा,

बस यूं ही बीतती रही
वक्त की  धारा
कभी किसी ने बुलाया
कह के "गुडिया की मम्मी "
तो कभी किसी ने
तुम्हारे नाम से पुकारा।
पर...
कल अचानक यूँ ही
एक मोड़ पर एक नाम से
मुझे  किसी ने आवाज़ लगाई
तब झनझना के जाग उठा दिल
और
अपने अस्तित्व की याद आई
दिखायी दिए कितने रंग
अपने भूले व्यक्तित्व के
जब उस नाम के साथ उसने
कई बीती बातें याद कराई

जाग उठा तब दिल का वह कोना
जो ख़ुद से ख़ुद की पहचान चाहता है
कैसे जीं लिया बिन अपने नाम के मैंने
आज इस अजब से सवाल का
मेरा दिल जवाब मांगता है,
सुनो,
आज एक गुज़ारिश है तुमसे
मुझे आज कोई गहना ना कपडा दो
"बस दे दो वापस मेरा नाम मुझको
और  मेरा परिचय मुझसे ही करवा दो"!

Tuesday, September 03, 2019

मुक्ति की भाषा ,स्त्री मन की बात ( भाग 5)

आज स्त्री मन की बात करते हुए ,एक कहानी जो अभी कहीं पढ़ी । स्त्री मन प्रेम की भाषा जानता है तो विद्रोह करना भी जानता है। बस उसको समझने की जरूरत है । कहानी इस प्रकार है ।

मैंने एक दिन अपनी पत्नी से पूछा क्या तुम्हे बुरा नहीं लगता मैं बार बार तुमको बोल देता हूँ डाँट देता हूँ फिर भी तुम पति भक्ति में लगी रहती हो जबकि मैं कभी पत्नी भक्त बनने का प्रयास नहीं करता?

मैं ""वेद"" का विद्यार्थी हूँ और मेरी पत्नी ""विज्ञान"" की परन्तु उसकी आध्यात्मिक शक्तियाँ मुझसे कई गुना ज्यादा हैं क्योकि मैं केवल पढता हूँ और ओ जीवन में उसका पालन करती है।

मेरे प्रश्न पर जरा ओ हँसी और बोली की ये बताइए एक पुत्र यदि माता की भक्ति करता है तो उसे मातृ भक्त कहा जाता है परन्तु माता यदि पुत्र की कितनी भी सेवा करे उसे पुत्र भक्त तो नहीं कहा जा सकता न।

मैं सोच रहा था आज पुनः ये मुझे निरुत्तर करेगी मैंने प्रश्न किया ये बताओ जब जीवन का प्रारम्भ हुआ तो पुरुष और स्त्री समान थे फिर पुरुष बड़ा कैसे हो गया जबकि स्त्री तो शक्ति का स्वरूप होती है?

मुस्काते हुए उसने कहा आपको थोड़ी विज्ञान भी पढ़नी चाहिए थी...मैं झेंप गया उसने कहना प्रारम्भ किया....दुनिया मात्र दो वस्तु से निर्मित है ""ऊर्जा""और ""पदार्थ""पुरुष ऊर्जा का प्रतीक है और स्त्री पदार्थ की। पदार्थ को यदि विकशित होना हो तो वह ऊर्जा का आधान करता है ना की ऊर्जा पदार्थ का ठीक इसी प्रकार जब एक स्त्री एक पुरुष का आधान करती है तो शक्ति स्वरूप हो जाती है और आने वाले पीढ़ियों अर्थात अपने संतानों केलिए प्रथम पूज्या हो जाती है क्योकि वह पदार्थ और ऊर्जा दोनों की स्वामिनी होती है जबकि पुरुष मात्र ऊर्जा का ही अंश रह जाता है। 

मैंने पुनः कहा तब तो तुम मेरी भी पूज्य हो गई न क्योकि तुम तो ऊर्जा और पदार्थ दोनों की स्वामिनी हो?

अब उसने झेंपते हुए कहा आप भी पढ़े लिखे मूर्खो जैसे बात करते हैं आपकी ऊर्जा का अंश मैंने ग्रहण किया और शक्तिशाली हो गई तो क्या उस शक्ति का प्रयोग आप पर ही करूँ ये तो कृतघ्नता हो जाएगी।

मैंने कहा मैं तो तुमपर शक्ति का प्रयोग करता हूँ फिर तुम क्यों नहीं?

उसका उत्तर सुन मेरे आँखों में आंसू आ गए............

उसने कहा.....जिसके संसर्ग मात्र से मुझमे जीवन उत्पन्न करने की क्षमता आ गई ईश्वर से भी ऊँचा जो पद आपने मुझे प्रदान किया जिसे ""माता"" कहते हैं उसके साथ मैं विद्रोह नहीं कर सकती, फिर मुझे चिढ़ाते हुए उसने कहा कि यदि शक्ति प्रयोग करना भी होगा तो मुझे क्या आवश्यकता मैं तो माता सीता की भांति ""लव कुश""तैयार कर दूंगी जो आपसे मेरा हिसाब किताब कर लेंगे।

नमन है सभी मातृ शक्तियों को जिन्होंने अपने प्रेम और मर्यादा में समस्त सृष्टि को बांध रखा है।



अब वही बात आज के इस लेख में 

एक औरत अन्दर से जानती है कि बच्चे और परिवार उसकी पहली जिम्मेदारी है और यह  उसको विरासत और परम्पराओं में मिला हुआ है । 

और फ़िर वह काम पूरे न होने पर ख़ुद में ही कहीं कमी महसूस करती है जबकि असल में शक्ति का सही रूप है वह ...वक्त अब बदल रहा है और उसकी इस शक्ति से अब कोई इनकार हो भी नही रहा है आज हर जगह वह आगे हैं पर कहीं कहीं  यह कुछ पीछे रह जाता है  जैसे लड़की को आज भी घर के काम की शिक्षा भी साथ साथ दी जाती है पर घर के बेटे को वही "इगो" से जीना ही सिखाया जाता है उसके लिए आज़ादी की बात सिर्फ वही है जो वह चाहता है



मुक्ति की भाषा


"सुनो .."
तुम लिखती हो न कविता?"
"हाँ " लिखती तो हूँ
चलो आज बहुत मदमाती हवा है
रिमझिम सी बरसती घटा है
लिखो एक गीत प्रेम का
प्यार और चाँदनी जिसका राग हो
मदमाते हुए मौसम में यही दिली सौगात हो
गीत वही उसके दिल का मैंने जब उसको सुनाया
खुश हुआ नज़रों में एक गरूर भर आया,

फ़िर कहा -लिखो अब एक तराना
जिसमें इन खिलते फूलों का हो फ़साना
खुशबु की तरह यह फिजा में फ़ैल जाए
इन में मेरे ही प्यार की बात आए
जिसे सुन के तन मन का
रोआं रोआं महक जाए
बस जाए प्रीत का गीत दिल में
और चहकने यह मन लग जाए
सुन के फूलों के गीत सुरीला
खिल गया उसका दिल भी जैसे रंगीला

वाह !!....
अब सुनाओ मुझे जो तुम्हारे दिल को भाये
कुछ अब तुम्हारे दिल की बात भी हो जाए
सुन के मेरा दिल न जाने क्यों मुस्कराया
झुकी नज़रों को उसकी नज़रों से मिलाया
फ़िर दिल में बरसों से जमा गीत गुनगुनाया
चाहिए मुझे एक टुकडा आसमान
जहाँ हो सिर्फ़ मेरे दिल की उड़ान
गूंजे फिजा में मेरे भावों के बोल सुरीले
और खिले रंग मेरे ही दिल के चटकीले
कह सकूं मैं मुक्त हो कर अपनी भाषा
इतनी सी है इस दिल की अभिलाषा..


सुन के उसका चेहरा तमतमाया
न जाने क्यों यह सुन के घबराया
चीख के बोला क्या है यह तमाशा
कहीं दफन करो यह मुक्ति की भाषा
वही लिखो जो मैं सुनना चाहूँ
तेरे गीतों में बस मैं ही मैं नज़र आऊं...

तब से लिखा मेरा हर गीत अधूरा है
इन आंखो में बसा हुआ
वह एक टुकडा आसमान का
दर्द में डूबा हुआ पनीला है.....

शेष अगले अंक में 

Saturday, August 31, 2019

सौ साल की हुई अमृता प्रीतम




आज गूगल भी अमृता प्रीतम के जन्मदिन को मना रहा है । अमृता प्रीतम एक ऐसी लेखिका जिनके लिखे का असर मन को अपने मे ही समेट लेता है। मैं उनके लिखे से बहुत प्रभावित रही । इतनी कि कहीं अपने लिखे में भी उनकी छाया दिखी । उनके लेखन ने ही नहीं उनके बिंदास जीने के अंदाज़ ने भी बहुत प्रभावित किया है । बेशक आज लोग उन्हें उनके जीने के अंदाज़ से " बदचलन "नाम दें पर उन्होंने कभी इसकी परवाह नहीं की। उन्होंने अपनी किसी भी बात को कभी छिपाया नहीं। साहिर उनकी अंतिम साँसों तक उनकी यादों में रहे । मुझे लगता है कि पहले प्यार का अधूरापन अंतिम सांस तक उसी याद और उसी पल में अटका रहता है । और यही अधूरा प्रेम फिर आपसे क्या क्या नहीं लिखवा लेता । साहिर अमृता मिल गए होते तो हमे इतना अच्छा लिखा हुआ न अमृता का मिलता , न साहिर के गीतों में वह बात दिखती जो आज भी सुन कर दिल खींच जाता है । इमरोज़ ने अमृता को उसके सब सच के साथ स्वीकार किया । इमरोज़ का प्रेम अमृता के लिए इबादत बन गया । आज भी इमरोज़ के आलोचकों की कमी नहीं है। पर प्रेम तो प्रेम है और जब वह प्रेम से ऊपर उठ कर इबादत का रूप ले ले तो फिर उसके बारे में कोई कुछ भी लिखे वो उस लिखने वाली की अज्ञानता है । 

@#विदेह निर्मोही की लिखी यह कविता इस सच को बयां करती है।
सुनो अमृता!

सुनो अमृता!
अच्छा हुआ
जो तुम लेखिका थी
क्योंकि अगर तुम लेखिका न होती
तो निश्चित तौर 
तुम्हें "चरित्रहीन "और
"बदलचलन "की श्रेणी में रखा जाता।

अच्छा हुआ तुम ,असाधारण थी
क्योंकि साधारण स्त्रियों की ज़िंदगी में
"तीन-तीन पुरुषों "का होना
"वैश्यावृत्ति" माना जाता है

अच्छा हुआ ,अमृता
तुम बोल्ड थी
इसीलिए तुम्हारे मुंह पर
किसी ने कुछ न कहा
किन्तु यह भी सत्य है
आज इमरोज की कामना करने वाली 
कोई भी स्त्री अमृता बनना नहीं चाहेगी
क्योंकि दहलीज़ों को लांघना
कोई मज़ाक नहीं है।

#विदेह निर्मोही द्वारा लिखित 

मेरे लिए वो हमेशा इसलिए आईडल रही कि वो एक सच्ची इंसान थी । ज़िन्दगी जीने के तरीके को समझती थीं ।कभी भी इसके चलते उन्होंने अपने किसी फ़र्ज़ से मुहं नहीं मोड़ा ।आज उनके 100 वें जन्मशताब्दी पर मेरी यह पोस्ट उन्ही के लिखे को मेरी कलम से कह रही  है ।

वर्ष कोयले की तरह बिखरे हुए
कुछ बुझ गये, कुछ बुझने से रह गये
वक्त का हाथ जब समेटने लगा
पोरों पर छाले पड़ गये….
तेरे इश्क के हाथ से छूट गयी
और जिन्दगी की हन्डिया टूट गयी
           
     तुम मुझे उस जादुओं से भरी वादी में बुला रहे हो जहाँ मेरी उम्र लौटकर नहीं आती। उम्र दिल का साथ नहीं दे रही है। दिल उसी जगह पर ठहर गया है, जहाँ ठहरने का तुमने उसे इशारा किया था। सच, उसके पैर वहाँ रूके हुए हैं। पर आजकल मुझे लगता है, एक-एक दिन में कई-कई बरस बीते जा रहे हैं, और अपनी उम्र के इतने बरसों का बोझ मुझसे सहन नहीं हो रहा है.....अमृता

.......यह मेरा उम्र का ख़त व्यर्थ हो गया। हमारे दिल ने महबूब का जो पता लिखा था, वह हमारी किस्मत से पढ़ा न गया।.......तुम्हारे नये सपनों का महल बनाने के लिए अगर मुझे अपनी जिंदगी खंडहर भी बनानी पड़े तो मुझे एतराज नहीं होगा।......जो चार दिन जिंदगी के दिए हैं, उनमें से दो की जगह तीन आरजू में गुजर गए और बाकी एक दिन सिर्फ इन्तजार में ही न गुजर जाए। अनहोनी को होनी बना लो मिर्जा।..... .अमृता 
कमरे में जाना और यह रिकॉर्ड चलाना और बर्मन की आवाज सुनना- सुन मेरे बंधु रे। सुन मेरे मितवा। सुन मेरे साथी रे। और मुझे बताना, वे लोग कैसे होते हैं, जिन्हें कोई इस तरह आवाज देता है। मैं सारी उम्र कल्पना के गीत लिखती रही, पर यह मैं जानती हूँ - "मैं वह नहीं हूँ जिसे कोई इस तरह आवाज दे। "और मैं यह भी जानती हूँ, मेरी आवाज का कोई जवाब नहीं आएगा। कल एक सपने जैसी तुम्हारी चिट्ठी आई थी। पर मुझे तुम्हारे मन की कॉन्फ्लिक्ट का भी पता है। यूँ तो मैं तुम्हारा अपना चुनाव हूँ, फिर भी मेरी उम्र और मेरे बन्धन तुम्हारा कॉन्फ्लिक्ट हैं। तुम्हारा मुँह देखा, तुम्हारे बोल सुने तो मेरी भटकन खत्म हो गई। पर आज तुम्हारा मुँह इनकारी है, तुम्हारे बोल इनकारी हैं। क्या इस धरती पर मुझे अभी और जीना है जहाँ मेरे लिए तुम्हारे सपनों ने दरवाज़ा भेड़ लिया है। तुम्हारे पैरों की आहट सुनकर मैंने जिंदगी से कहा था- अभी दरवाजा बन्द नहीं करो हयात। रेगिस्तान से किसी के कदमों की आवाज आ रही है। पर आज मुझे तुम्हारे पैरों का आवाज सुनाई नहीं दे रही है। अब जिंदगी को क्या कहूँ? क्या यह कहूँ कि अब सारे दरवाजे बन्द कर ले......। ....अमृता
देख नज़र वाले, तेरे सामने बैठी हूँ
मेरे हाथ से हिज्र का काँटा निकाल दे

जिसने अँधेरे के अलावा कभी कुछ नहीं बुना
वह मुहब्बत आज किरणें बुनकर दे गयी

उठो, अपने घड़े से पानी का एक कटोरा दो
राह के हादसे मैं इस पानी से धो लूंगी... 

रास्ते कठिन हैं। तुम्हें भी जिस रास्ते पर मिला, सारे का सारा कठिन है, पर यही मेरा रास्ता है।.....मुझ पर और भरोसा करो, मेरे अपनत्व पर पूरा एतबार करो। जीने की हद तक तुम्हारा, तुम्हारे जीवन का जामिन, तुम्हारा जीती।....ये अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य का पल्ला तुम्हारे आगे फैलाता हूँ, इसमें अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य को डाल दो।.....इमरोज


आज ३१ अगस्त है ...अमृता जन्मदिन तुम्हे मुबारक ....हर जन्मदिन पर लगता है क्या लिखूं तुम्हारे लिए ...सब कुछ कह के भी अनकहा है वक़्त बीत रहा है ...तलाश जारी है खुद में तुमको पाने की ..तुम जो .मेरे प्रेरणा रही ..मेरी आत्मा में बसी मुझे हमेशा लगा जैसे जो प्यास .जो रोमांस ,जो इश्क की कशिश तुम में थी वह तुमसे  कहीं कहीं बूंद बूंद मुझ में लगातार रिस रही है ...इमरोज़ भी एक ही है और अमृता भी एक थी ..पर ..फिर भी अमृता तुम्हारे लिखे ..को पढ़ के ...अमृता तुम्हारी तरह जीने की आस टूटती नहीं ..जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक  अमृता 

Thursday, August 29, 2019

बिना शीर्षक के ,एक स्त्री के मन की बात ( भाग 4)

जब से या संसार बना नारी की शक्ति से कोई अपरिचित नही रहा है ..उसने जब भी कोई काम किया पूरी लगन के साथ किया और अपने पूरे जोश के साथ किया ...शायद तभी पुरूष समाज में धबराहट शुरू हुई होगी कि यदि यह यूं ही  ही चलता रहा तो हमारा तो पत्ता ही कट जायेगा ..तभी उसने कायदे कानून बनाये अपनी सुविधा के  हिसाब से ..अब नारी भावुक और भोली भी बहुत है ...उसके दिल दिमाग में भर दिया गया कि बाहर तुम जो चाहे काम करो पर घर कि जिम्मेदारी तो पूर्ण रूप से तुम्हारी  है नारी के अन्दर यह गुण प्रकृति ने ही कूट कूट के भर दिया है कि वह एक साथ कई रिश्ते ,कई जिम्मेदारी और कई काम एक साथ संभाल सकती है ...मैं यह नही कहती कि उसको ईश्वर ने सुपर पावर दे के भेजा है बलिक वह कुदरती  ही ऐसी है और कई पुरूष भी इस बात को अब मानने लगे हैं ...पर जो दिल दिमाग में भर दिया गया है कि उसको घर भी देखना है और कुदरती उसको अपने बनाए आशियाने से भी उतना ही लगाव होता है जितना वह अपना काम मतलब अपने प्रोफेशन से करती है और जब वह घर को नही देख  पाती है या उस से जुड़ी कोई जिम्मेदारी पूरी नही कर पाती  है तो एक अपराधबोध  उसके अन्दर जन्म लेने लगता है और इन हालात में वह अपनी मानसिक ,दैहिक सभी इच्छाओं को कहते हुए भी डरने लगती है 

बिना शीर्षक के ..

बदलते हुए
शरीर में
बदलते हुए
एहसासों को
समझने के बाद
जाग उठी है
मेरे अन्दर भी
वह "आदम भूख "
जो सृष्टि के
नियमों को
चलाने के लिए
तय कर दी है
कुदरत ने
कुछ भावनाओं में
कुछ प्रतीकों में
सुनी- देखी बातों ने
पर ....
अपनी ही सीमाओं में
बंधी मैं इसको
क्यूँ ढंग से भोग पायी ?
मैंने भी रचे हैं
इसको ले कर
वही सोच और
कुछ "जंगली सपने "
जिनको तुम खुल कर
अपनी "wild fantasies  "कहते हो
और
मैं उस विशेष एहसास को
ले कर
अपने ही अन्दर
रोज़ जीती हूँ ,मरती हूँ
नापती हूँ सूनी आँखों से
"बीतती रातों को "
अपनी ही कराह से
 बिस्तर की सलवटों
खाली खनकती चूड़ियों में
और देखती हूँ
अपनी टूटी हुई बिखरी  हुई
"fantasies "को दम तोड़ते हुए .

चाह कर भी
कभी तोड़ पायी
उन बन्धनों को ,वर्जनाओं को
जिन में घुट के अपने ही
"नारीत्व "का अपमान सहती हूँ
सच में बहुत मुश्किल है
यूँ ही अपने आप से
यूँ लड़ते हुए जीना
तुम कुछ यूँ
ऐसा कहोगे
करोगे तो
वह "साहस "और पुरुषत्त्व
कहलायेगा
और मैंने जो दर्शाया
अपनी इस "भूख "को
तो "नारी शब्द
अपमानित हो जाएगा

शेष अगले अंक में...