Sunday, April 23, 2017

सितारों की कही सुनी

अमृता की आत्मकथा रसीदी टिकट में एक वाक्या है कि  किसी ने एक एक बार उनका हाथ देख कर कहा कि धन की रेखा बहुत अच्छी है और इमरोज़  का हाथ देख कर कहा की धन की रेखा बहुत मद्धम है .इस पर अमृता हंस दी और उन्होंने कहा की कोई बात नहीं हम दोनों मिल कर  एक ही रेखा से काम चला लेंगे ....

और इस वाकये के बाद उनके पास एक पोस्ट कार्ड आया जिस पर लिखा था  ----

मैं हस्त रेखा का ज्ञान रखती हूँ ..क्या वह हाथ देख सकती हूँ जिसकी एक रेखा से आप और इमरोज़ मिल कर ज़िन्दगी चला लेंगे .?

उस पोस्ट कार्ड पर नाम लिखा हुआ था उर्मिला शर्मा ..
वह पोस्ट कार्ड कुछ दिन तक अमृता जी के पास यूँ ही पड़ा रहा  .फिर उन्होंने उसका एक दिन  साधारण सा जवाब दिया आप जब चाहे आ जाए कोई एतराज़ नहीं है ...
उसी ख़त में उनका फ़ोन नम्बर भी था उन्हें लगा कि जब वह आएँगी तो फ़ोन कर के आएँगी ..पर ऐसा नहीं हुआ ..एक दिन वह अचानक आ गयीं उन्हें मालूम नहीं था    अमृता ऊपर की मंजिल पर रहती हैं ..इस लिए उन्होंने नीचे का दरवाजा खटखटाया  अमृता जी की बहू ने दरवाजा खोला तो उन्होंने अमृता जी का नाम सुन कर उन्हें ऊपर भेज दिया .

अमृता जी ने उन्हें पहचाना नहीं तब उन्होंने खुद ही बताया कि वह हाथ की रेखाए देखने आई है  और तुंरत अमृता से पूछा  नीचे कौन था उन्होंने कहा मेरी बहू ..वह एक मिनट चुप रह कर बोलीं कि उनके यहाँ कोई बच्चा नहीं होगा ..
अमृता ने सुना और कहा  आपको इस तरह से नहीं कहना चाहिए ..न तो आपने उसका हाथ देखा न जन्मपत्री ..फिर कैसे इतनी बड़ी बात कह सकती है ...

बस मैंने कह दिया .उर्मिल जी ने कहा ..अमृता को उनके बोलने का ढंग बहुत रुखा सा लगा ...लेकिन वह मेहमान थी ...बाद में चाय पीते हुए अमृता ने महसूस किया कि भले  ही वह बहुत रुखा बोलतीं है पर इंसान भली हैं ...
उन्होंने अमृता से पूछा  कि आपकी जन्मपत्री है ? नहीं तो  मैं बना देती हूँ ..
अमृता ने हंस कर कहा   मेरी जन्मपत्री तो मेरे पास नहीं हैं खुदा के पास होगी वहां से लेने मुझे जाना होगा ..
उन्होंने अमृता से फिर पूछा  अच्छा तारीख तो आपकी कहीं मैंने देखी है और साल भी  क्या समय  था आपको कुछ याद है ? यह सुन कर अमृता ने सोचा अपनी पूरी ज़िन्दगी के हालात "रसीदी  टिकट" में लिख दिया हैं क्या उनको पढ़ कर इस विद्या से वक़्त का पता  नहीं  चल सकता है ..? पर अमृता ने कुछ कहा नहीं ...और पूछा कि क्या अपने मेरी किताब पढ़ी है .. क्या सोचती है वह उसको पढ़ कर ?
उनका जवाब था  मैंने तो किताब नहीं पढ़ी क्यों कि किताबे पढने की मेरी आदत नहीं हैं ..वह मेरे पति ने पढ़ी है और उन्होंने ही बीच में मुझे यह एक वाक्या सुना दिया था वह बहुत  पढ़ते हैं ..
अमृता को उनकी बातों में बहुत सफाई और सादगी दिखी ..जो उन्हें अच्छी लगी ...इस तरह बात आगे बढ़ी  वह धीरे धीरे अमृता के घर आने लगी ...
  फिर एक दिन कुछ इस तरह से हुआ जब वह आयीं तो आते ही पूछने लगीं कि आपकी बहू यहीं है ?
जी  हाँ अभी तो यहीं है .उसके मायके वाले हिन्दुस्तान में नहीं लन्दन में हैं ...शायद वहां जाए ..
हाँ वह जायेगी पर वापस नहीं आएगी वह  अगस्त में यहाँ से चली जायेगी  .अमृता को सुन का अच्छा नहीं लगा ..पर कुछ कहा नहीं उन्होंने ..मई का महीना था .कुछ दिनों बाद उनकी बहू का जन्मदिन था   .जन्मदिन वाले दिन अमृता जी ने मेज पर केक और छोटा सा उपहार रखे तो यह देख कर उनकी  बहू अचानक से रोने लगी ..अमृता को समझ नहीं आया कि यह क्या हुआ क्यों रो रही हैं यह ..उन्होंने उसको बहुत प्यार किया और पूछा  आखिर हुआ क्या है ? पर उसकी  बजाय उनके बेटे ने कहा  वह तलाक ले कर वापस लन्दन जाना चाहती है और यहाँ नहीं रहना चाहती है पर आप सब लोगों को यह करते हुए देख  कर इसका मन भर आया है   यह सब अमृता जी नहीं जानती थी ..सुनते ही उन्हें उर्मिल की बात याद हो  आई   यह सब उन्होंने इतना पहले कैसे कह दिया ..?

बाद में वीजा मिलने की कुछ  दिक्कत हुई और उनकी बहू तलाक ले कर सितम्बर में लन्दन चली गयी .कभी न वापस आने के लिए ..
उसके बाद तीन साल तक उनके घर का माहौल यूँ ही उदास सा रहा पर उर्मिल का कहना   था कि उनका बेटा जरुर शादी  करेगा और उसके दो बच्चे होंगे .. पर बेटा शादी  के लिए तैयार ही नहीं था ..आखिर १९८२ में उसका मन बदला और उसकी   एक  लड़की से जान पहचान  हुई   से बात दुबारा    चली  पर उर्मिल जी ने कहा की यह इस लड़की   को न कहेगा .. और दूसरी लड़की आएगी इसके जीवन में ..अमृता ने कहा मैं नहीं अब मन सकती इसने खुद लड़की को पसनद किए है अब यह न नहीं कर सकता पर  न जाने अचानक से क्या हुआ उनके लड़के ने उस लड़की से  शादी  करने से इनकार कर दिया ..वह उर्मिल जी की बातो को कभी नहीं मानता था इस लिए अमृता बेटे को बताये बगेरबगैर  उर्मिल से बात करती थी ..कुछ समय बाद उसने फिर एक लड़की को पसन्द किया ..अमृता ने उर्मिल जो को उस लड़की के बारे में बताया   तो  उन्होंने कुछ सितारों की गणना  करके कहा हां अब यह इस से शादी करेगा ...और अच्छा रहेगा ..
यही हुआ ..अमृता जी की उस से दोस्ती और बढती  गयी ..और तब उन्होंने  माना  कि ज्योतिष के ज्ञान की कोई सीमा नहीं है  सिर्फ कुछ एक कण हाथ लगते हैं कुदरत के रहस्य कब किस तरह अपने रंग  दिखाए  कौन जानता है
....ranju bhatia ......

Friday, April 21, 2017

किस्मत की लकीरे (AMRITA PREETAM)

मर्द ने अपनी पहचान मैं लफ़्ज़ में पानी होती है, औरत ने मेरी लफ़्ज़ में... 
‘मैं’ शब्द में ‘स्वयं’ का दीदार होता है, और ‘मेरा’ शब्द ‘प्यार’ के धागों में लिपटा हुआ होता है... 

लेकिन अंतर मन की यात्रा रुक जाए तो मैं लफ़्ज़ महज अहंकार हो जाता है और मेरा लफ़्ज़ उदासीनता। उस समय स्त्री वस्तु हो जाती है, और पुरुष वस्तु का मालिक। 
मालिक होना उदासीनता नहीं जानता, लेकिन मलकियत उसकी वेदना जानती है। 

रजनीश जी के लफ़्ज़ों में ‘‘वेदना का अनुवाद दुनिया की किसी भाषा में नहीं हो सकता। इसका एक अर्थ ‘पीड़ा’ होता है, पर दूसरा अर्थ ‘ज्ञान’ होता है। यह मूल धातु ‘वेद’ से बना है, जिस से विद्वान बनता है—ज्ञान को जानने वाला। वेदना का अर्थ हो जाता है —जो दुख के ज्ञान को जानता है।’’ सो इस वेदना के पहलू से कुछ उन गीतों को देखना होगा, जो धरती की और मन की मिट्टी से पनपते हैं। 

लोकगीत बहुत व्यापक दुख से जन्म लेता है, वह उस हकीकत की ज़मीन पर पैर रखता है, जो बहुत व्यापक रूप में एक हकीकत बन चुकी होती है। 
इसी तरह कहावतें भी ऐसे संस्कारों से बनती हैं, जि पर्त दर पर्त बहुत कुछ अपने में लपेट कर रखती हैं। जैसे कभी बंगाल में कहावत थी—‘‘जो औरत पढ़ना लिखना सीखती है, वह दूसरे जन्म में वेश्या होकर जन्म लेती है।

हमारे देश की अलग-अलग भाषाओं के होठों पर ऐसी कितनी कहावतें और गीत सुलगते हैं। आम स्त्री की हालत का अनुमान कुछ उन्हीं से लगाना होगा...  अमृता के लिखे शब्द उनकी लिखी पुस्तकों से ...
एक बरस में सूरज के हिसाब से बारह महीने होते हैं,
लेकिन चन्द्रमा के हिसाब से तेरह महीने होते हैं।सूरज बाह्यमुखी शक्ति का प्रतीक हैऔर चन्द्रमा अन्तर्मुखी शक्ति का।सूर्य शक्ति मर्द शक्ति गिनी जाती हैऔर चन्द्र शक्ति स्त्री शक्ति।दोनों शक्तियाँ स्थूल शक्ति और सूक्ष्म शक्ति की प्रतीक हैं अन्तर की सूक्ष्म चेतना, जाने कितने जन्मों से,इंसान के भीतर पड़ी पनपती रहती है।यह अपने करम से भी बनती-बिगड़ती हैऔर पिता-पितामह के करमों से भी।हमारे अपने देश में, कई जातियों मेंएक बड़ी रहस्यमय बात कही जाती है,हर बच्चे के जन्म के समय,कि बिध माता, तुम रूठकर आना और मानकर जाना।इसका अर्थ यह लिया जाता है कि बिध माता,किस्मत को बनाने वाली शक्ति, जब अपने प्रिय
से रूठकर आती है, तो बहुत देर बच्चे के पास बैठती हैऔर आराम से उसकी किस्मत की लकीरें बनाती है...मैं समझती हूँ कि बिध माता की यह गाथाबहुत गहरे अर्थों में है कि वह जब किस्मतकी लकीरें बनाने लगे तो साइकिक शक्ति को न भूल जाए,पश्चिम की गाथा में जो तेरहवीं थाली परसने का इशारा है,ठीक वही पूरब की गाथा में साइकिक शक्तियोंसे न रूठने का संकेत है।...........एक बरस में सूरज के हिसाब से बारह महीने होते हैं,लेकिन चन्द्रमा के हिसाब से तेरह महीने होते हैं।सूरज बाह्यमुखी शक्ति का प्रतीक है
और चन्द्रमा अन्तर्मुखी शक्ति का।सूर्य शक्ति मर्द शक्ति गिनी जाती हैऔर चन्द्र शक्ति स्त्री शक्ति।दोनों शक्तियाँ स्थूल शक्ति और सूक्ष्म शक्ति की प्रतीक हैंअन्तर की सूक्ष्म चेतना, जाने कितने जन्मों से,इंसान के भीतर पड़ी पनपती रहती है।यह अपने करम से भी बनती-बिगड़ती हैऔर पिता-पितामह के करमों से भी।हमारे अपने देश में, कई जातियों मेंएक बड़ी रहस्यमय बात कही जाती है,
हर बच्चे के जन्म के समय,कि बिध माता, तुम रूठकर आना और मानकर जाना।इसका अर्थ यह लिया जाता है कि बिध माता,
किस्मत को बनाने वाली शक्ति, जब अपने प्रियसे रूठकर आती है, तो बहुत देर बच्चे के पास बैठती हैऔर आराम से उसकी किस्मत की लकीरें बनाती है...मैं समझती हूँ कि बिध माता की यह गाथाबहुत गहरे अर्थों में है कि वह जब किस्मतकी लकीरें बनाने लगे तो साइकिक शक्ति को न भूल जाए,पश्चिम की गाथा में जो तेरहवीं थाली परसने का इशारा है,ठीक वही पूरब की गाथा में साइकिक शक्तियोंसे न रूठने का संकेत है।...........

Wednesday, April 19, 2017

कागज़ों का शाप (ek thi Sara)

मैंने आसमान से एक तारा टूटते हुए देखा है ...
बहुत तेजी से .आसमान के जहन  में एक जलती हुई लकीर खेंचता हुआ ,,लोग कहते हैं तो सच ही कहते होंगे कि उन्होंने कई बार टूटे हुए तारों की  गर्म राख जमीन पर गिरते देखी है  मैंने भी उस तारे की  गर्म राख अपने दिल के आँगन में बरसती हुई देखी है जिस तरह तारों के नाम होते हैं उसी तरह जो तारा मैंने टूटते हुए देखा उसका नाम था सारा शगुफ्ता ....उस तारे के टूटते समय आसमान के जिहन से जो एक लम्बी और जलती  हुई लकीर खिंच गयी थी वह सारा शगुफ्ता की  नज्म थी
नज्म जमीन पर गिरी ,तो खुदा जाने उसके कितने टुकड़े हवा में खो गए लेकिन जो राख मैंने हाथ से छू कर देखी थी उस में कितने ही जलते हुए अक्षर  थे ,जो मैंने उठा उठा कर कागज़ में रख दिए
नहीं जानती खुदा ने इन कागजों को ऐसा शाप क्यों दिया है आप उन पर कितने ही जलते हुए अक्षर रख दे वह कागज़ जलते ही नहीं
जिन लोगों के पास एहसास है जलते हुए अक्सर पढ़ते हुए उनके एहसास से सुलगने लगते हैं पर कोई कागज़ नहीं जलता
शायद यह शाप नहीं है ..है भी तो इसको शाप नहीं कहना  चाहिए अगर ऐसा होता तो खुदा जाने दुनिया कि कितनी किताबें अपनी ही अक्षरों की राख से जल जाती ...
पिछले दो दिन से में अमृता द्वारा संकलित इस किताब को पढ़ रही हूँ ..और इसका असर इस तरह से जहाँ पर हुआ कि आपसे बांटे बगैर नहीं रह सकी ..सारा का दर्द उनके लिखे लफ़्ज़ों में कई टुकडो में अमृता प्रीतम तक पहुंचा ....वह पाकिस्तान  की  शायरा अमृता तक अपने लफ़्ज़ों से नज्म  और अपनी ज़िन्दगी के किस्से सुनाती हुई पहुंचती रही ..उनके दर्द को इस नज्म से बखूबी समझा जा सकता है ..

एक थी सारा ...
मेरी तहरीरों से कई घरों ने मुझ पर थूक दिया है
लेकिन में उनका जायका नहीं बन सकती
में टूटी हुई दस्तकें  झोली में भर रही हूँ
ऐसा लगता है पानी में कील थोक रही हूँ
हर चीज बह जायेगी ,मेरे लफ्ज़ ,मेरी औरत
यह मशकरी गोली किसने चलायी अमृता !
जुबान एक निवाला क्यों कबूल करती है
भूख एक और पकवान अलग अलग
देखने के सिर्फ एक चाँद सितारा क्यों देखूं ?
समुन्द्र के लिए लहर जरुरी है
अमृता ! वह ब्याहाने वाले लोग कहाँ गए ?
यह कोई घर है ?
कि औरत और इजाजत में कोई फर्क नहीं रहा
मैंने बागवत की  है अकेली ने
अब अपने आगन में अकेली रहती हूँ
कि आज़ादी कोई बड़ा पेशा नहीं
देख ! मेरी मजदूरी ,चुन रही हूँ लुंचे मांस
लिख रही हूँ
कभी दीवारों में चिनी गयी
कभी बिस्तर पर चिनी जाती हूँ .....

Tuesday, April 18, 2017

एक खाली जगह की बात (अमृता प्रीतम )

अमृता के लिखे ने हमेशा आम इंसान की भावनाओं ,वहां के माहौल को इस तरह से अपनी कलम से लिखा है कि हर किसी को वह अपने ही घर की .... कहानी लगती है ...वह परिवार मध्यवर्गी हो या चाहे निम्न मध्यवर्गीय हर किसी को उस में अपना ही अक्स नजर आता है ...उनके उपन्यास "एक खाली जगह "से आज की कड़ी के लिए कुछ पंक्तियाँ .जिनको मैंने कई बार पढा और हर बार मुझे उस में एक नया अर्थ मिला ... निम्न मध्य श्रेणी के घरों की एक ख़ास गंध होती है ,चारपाइयों के नीचे रखे हुए ट्रंकों में और तीन के डिब्बे की तरह हर समय घर में छिप कर बैठी रहती है और कीलों पर लटकते हुए मटमैले कपडों में ,राम कृष्ण के और हनुमान के कैलेंडरों कीतरह घर की दीवारों को हथिया कर निशुन्क  खड़ी हुई भी ...
एक सुख ,सिर्फ एक तरफा ,विचार की गुलामी का सुख होता है ,जहाँ सब कुछ इकहरा होता है ,रिश्ते का रथ भी इकहरा .और इंसान के अस्तित्व का अर्थ भी इकहरा ..कोई भी रिश्ता जब बाहरी चीजों के सहारे खडा होता है जैसे मजहब के दौलत के या बने बनाये कानून के सहारे उसको कभी मन की पीडा का वरदान नहीं मिलता है .गुलामी का सुख मिलता है पर स्वंत्रता की पीडा नहीं मिलती ..

हर लड़की विवाह की पहली रात जिस कमरे में दाखिल होती है ,कभी उस कमरे का मालिक उसके स्वागत के लिए वहां नहीं होता है .और वह लड़की एक अपरिचित कमरे में एक दखलंदाजी की तरह कदम रखती है ..

शायद जिस समय जिस्म की आग जलती है ,तब सिर्फ आग के जलने की होती है ,और किसी चीज की नहीं और शायद तब सब कुछ उस में भस्म हो जाता है ..
कुछ विचार केवल गंध के समान होते हैं जिन्हें हाथ से पकड़ कर किसी को दिखाया नहीं जा सकता है हर समय होते भी नहीं मेह की बूंद पड़ते ही स्वयं आ जाते हैं ।घरों के कोनों में गुच्छा से हो कर बैठ जाते हैं और फ़िर धूप के समय  जाने कहाँ चले जाते हैं ....

कुछ फूल किसी कब्र पर चढ़ने के लिए उगते हैं ----शायद मैं भी !
हवन की अग्नि हाथ में एक रिश्ता थमा सकती है ,पर उसकी लौ मन के अँधेरे कोनों तक कभी पहुँच नहीं पाती और वे कोने किसी भी रिश्ते की हद से बाहर रह जाते हैं ..
कोई ऐसी खबर भी सच्ची हो सकती है ,जो अखबार के बाहर रह जाए ...इंसान के मन को अखबार की तरह साधारण आँखों से नहीं पढा जा सकता है ..

उपन्यास एक खाली जगह से ली गयीं यह पंक्तियाँ घर ,रिश्ते की नाजुकता का उसी बखूबी से ब्यान करते हैं जितना ज़िन्दगी खुद सच से रूबरू होती है .....

Tuesday, October 25, 2016

ज़िन्दगी जीने का नाम है

आज कल सुबह जब भी अखबार उठाओ तो एक ख़बर जैसे अखबार की जरुरत बन गई है कि फलानी जगह पर इस बन्दे या बंदी ने आत्महत्या कर ली ..क्यों है आखिर जिंदगी में इतना तनाव या अब जान देना बहुत सरल हो गया है ..पेपर में अच्छे नंबर नही आए तो दे दी जान ...प्रेमिका नही मिली तो दे दी जान ...अब तो लगता है जिस तरह से महंगाई बढ़ रही है लोग इसी तनाव में आ कर इस रेशो को और न बड़ा दे ...कल एक किताब में एक कहानी पढी इसी विषय पर लगा आप सब के साथ इसको शेयर करूँ ..एक नाम कोई भी ले लेते हैं ...राम या श्याम क्यूंकि समस्या नाम देख कर नही आती ..और होंसला भी नाम देख कर अपनी हिम्मत नही खोता है .खैर ...राम की पत्नी की अचानक मृत्यु हो गई और पीछे छोड़ गई वह बिखरी हुई ज़िंदगी और दो नन्ही मासूम बच्चियां ..सँभालने वाला कोई था नही नौकरी पर जाना जरुरी .और पीछे से कौन बच्चियों को संभाले ..वेतन इतना कम कि आया नही रखी जा सकती . और आया रख भी ली कौन सी विश्वास वाली होगी ..रिश्तेदार में दूर दूर तक कोई ऐसा नही था जो यह सब संभाल पाता..क्या करू .इसी सोच में एक दिन सोचा कि इस तरह तनाव में नही जीया जायेगा ज़िंदगी को ही छुट्टी देते हैं ..बाज़ार से ले आया चूहा मार दवा ..और साथ में सल्फास की गोलियां भी ...अपने साथ साथ उस मासूम की ज़िंदगी का भी अंत करके की सोची ..परन्तु मरने से पहले सोचा कि आज का दिन चलो भरपूर जीया जाए सो अच्छे से ख़ुद भी नहा धो कर तैयार हुए और बच्चियों को भी किया ...सोचा की पहले एक अच्छी सी पिक्चर देखेंगे फ़िर अच्छे से होटल में खाना खा कर साथ में इन गोलियों के साथ ज़िंदगी का अंत भी कर देंगे ...

सड़क क्रॉस कर ही रहे थे एक भिखारी देखा जो कोढी था हाथ पैर गलते हुए फ़िर भी भीख मांग रहा था .इसकी ज़िंदगी कितनी नरक वाली है फ़िर भी जीए जा रहा है ऑर जीने की किस उम्मीद पर यह भीख मांग रहा है .? कौन सा इसका सपना है जो इसको जीने पर मजबूर कर रहा है ? क्या है इसके पास आखिर ? फ़िर उसने अपने बारे में सोचा कि मूर्ख इंसान क्या नही है तेरे पास ..अच्छा स्वस्थ ,दो सुंदर बच्चे घर ..कमाई ...आगे बढे तो आसमान को छू ले लेकिन सिर्फ़ इसी लिए घबरा गया कि एक साथ तीन भूमिका निभा नही पा रहा है वह पिता .,अध्यापक ,ऑर माँ की भूमिका .निभाने से वह इतना तंग आ गया है कि आज वह अपने साथ इन दो मासूम जानों का भी अंत करने लगा है ..यही सोचते सोचते वह सिनेमाहाल में आ गया पिक्चर देखी उसने वहाँ ""वक्त ""'..और जैसे जैसे वह पिक्चर देखता गया उसके अन्दर का कायर इंसान मरता गया ..और जब वह सिनेमा देख के बाहर आया तो जिजीविषा से भरपूर एक साहसी मानव था जो अब ज़िंदगी के हर हालत का सामना कर सकता था ..उसने सोचा कि क्या यह पिक्चर मुझे कोई संदेश देने के लिए ख़ुद तक खींच लायी थी ..और वह कोढी क्या मेरा जीवन बचाने के लिए कोई संकेत और संदेश देने आया था ..उसने वह गोलियाँ नाली में बहा दी .और जीवन के हर उतार चढाव से लड़ने को तैयार हो गया
..जिंदगी जीने का नाम है मुश्किल न आए तो वह ज़िंदगी आखिर वह ज़िंदगी ही क्या है ..जीए भरपूर हर लम्हा जीए ..और तनाव को ख़ुद पर इस कदर हावी न होने दे कि वह आपकी सब जीने की उर्जा बहा के ले जाए ...क्यूंकि सही कहा है इस गीत में कि आगे भी जाने न तू पीछे भी न जाने तू ,जो भी बस यही एक पल है ..जीवन अनमोल है . इसको यूं न खत्म करे ..