Monday, December 02, 2019

माँ नारी का सबसे सुंदर रूप ( भाग 3)

यदि आप माँ के साथ हैं तो उनका दिल ना दुखाएं और यदि माँ से भौतिक रूप से दूर हैं तो अपने दिन का थोडा सा वक़्त  माँ को समर्पित कर दे और उस वक़्त में फिर से बच्चे बन कर देखिये.....माँ के नाजुक हाथों का स्पर्श स्वमेव अपने ऊपर आशीर्वाद के रूप में पाएंगे !!!

ढल चुकी हो तुम एक तस्वीर में माँ
पर दिल के आज भी उतनी ही करीब हो
जब भी झाँक के देखा है आंखो में तुम्हारी
एक मीठा सा एहसास बन कर आज भी
तुम जैसे मेरी गलती को सुधार देती हो
संवार देती हो आज भी मेरे पथ को
और आज भी इन झाकंती आंखों से
जैसे दिल में एक हूक सी उठ जाती है
आज भी तेरे प्यार की रौशनी
मेरे जीने का एक सहारा बन जाती है !

!बच्चे को छाया एवं सुरक्षा महसूस होती रहे और अभाव महसूस ना हों इसके लिए माँ क्या क्या प्रयत्न करती है, शायद ही कोई पिता यह महसूस कर पाया होगा !वह सबसे मीठा शब्द है संसार का तभी वह देवताओं का सा स्थान पाती है ,संसार के सब रिश्तो को आप एक बार बोल कर देखे ,भाई बहन ,पति पत्नी ,आदि सब में पहले पुरुष का नाम आयेगा पर एक यही पावन रिश्ता है जिसमे माँ का नाम पहले लिए जाता है
माँ जो है ......
संसार का सबसे मीठा शब्द
इस दुनिया को रचने वाले की
सबसे अनोखी और
आद्वितीय कृति

है यह प्यार का
गहरा सागर
जो हर लेता है
हर पीड़ा को
अपनी ही शीतलता से

इंसान तो क्या
स्वयंम विधाता
भी इसके मोह पाश से
बच  पाये है
तभी तो इसकी
ममता की छांव में
सिमटने को
तरह तरह के रुप धर कर
यहाँ जन्म लेते आए हैं ॥

*****

माँ ..
दीवाली के रोशन दीयों की तरह
मैंने तुम्हारी हर याद को
अपने ह्रदय के हर कोने में
संजों रखा है

आज भी सुरक्षित है
मेरे पास तुम्हारा लिखा
वह हर लफ्ज़
जो खतों के रूप में
कभी तुमने मुझे भेजा था

आशीर्वाद के
यह अनमोल मोती
आज भी मेरे जीवन के
दुर्गम पथ को
राह दिखाते हैं
आज भी रोशनी से यह
जगमगाते आखर और
नसीहत देती
तुम्हारी वह उक्तियाँ
मेरे पथ प्रदर्शक बन जाते हैं
और तुम्हारे साथ -साथ
चलने का
एक मीठा सा एहसास
मुझ में भर देते हैं ..

Saturday, November 30, 2019

माँ ,नारी का सबसे सुंदर रूप ( भाग 2)

कहीं पढ़ा था कि ‘‘जब तुम बोल भी नहीं पाते थे तो मैं तुम्हारी हर बात को समझ लेती थी और अब जब तुम बोल लेते हो तो कहते हो कि माँ तुम कुछ समझती ही नहीं।’माँ साथ नहीं पर वह तब भी हर पल साथ महसूस होती है ,फिर भी एक स्नेह्हिल स्पर्श की जब जब जरूरत महसूस होती है तो यह शिकायत अपनी बात यूँ कह जाती है 

तुम तो कहती थी माँ कि..
रह नही सकती एक पल भी
लाडली मैं बिन तुम्हारे
लगता नही दिल मेरा
मुझे एक पल भी बिना निहारे
जाने कैसे जी पाऊँगी
जब तू अपने पिया के घर चली जायेगी
तेरी पाजेब की यह रुनझुन मुझे
बहुत याद आएगी .....


पर आज लगता है कि
तुम भी झूठी थी
इस दुनिया की तरह
नही तो एक पल को सोचती
यूं हमसे मुहं मोड़ जाते वक्त
 तोड़ती मोह के हर बन्धन को
और जान लेती दिल की तड़प
पर क्या सच में ..
उस दूर गगन में जा कर
बसने वाले तारे कहलाते हैं
और वहाँ जगमगाने की खातिर
यूं सबको अकेला तन्हा छोड़ जाते हैं


Monday, November 11, 2019

नारी का सबसे सुंदर रूप " माँ" ( भाग 1 )

नारी के सब रूप अनूठे हैं ,पर माँ का रूप सबसे अदभुत है कोई भी स्त्री माँ बन कर  अपनी संतान से कितना प्यार कर सकती है बदले में कुछ नही चाहती,यही  नारी का सबसे प्यारा रूप  होता है बस वो सब कुछ उन पर अपना लुटा देती है और कभी यह नही सोचती की बदले में उसका यह उपकार बच्चे उसको कैसे देंगे ! नारी का रूप माँ के रूप में सबसे महान है इसी रूप में वो स्नेह , वात्सलय , ममता मॆं सब उँचाइयों को छू लेती है | उसके सभी दुख अपने बच्चे की एक मुस्कान देख के दूर हो जाते हैं! 

तभी हमारे हिंदू संस्कार में माँ को देवता की तरह पूजा जाता है माँ को ही शिशु का पहला गुरु माना जाता है सभी आदर्श रूप एक नारी के रूप में ही पाए जाते हैं जैसे विद्या के रूप में सरस्वती ,धन के रूप में लक्ष्मी, पराक्रम में दुर्गा ,सुन्दरता में रति और पवित्रता में गंगा ..वो उषा की बेला है, सुबह की धूप है ,किरण सी उजली है इस की आत्मा में प्रेम बसता है| और जब माँ नहीं रहती तो सब कुछ सुनसान हो जाता है 

माँ लफ्ज़ ज़िंदगी का वो अनमोल लफ़ज़ है ... जिसके बिना ज़िंदगी, ज़िंदगी नही कही जा सकती ...अपनी माँ के जाने पर मुझे यह सूनापन आज तक महसूस होता है और मेरे पास अब सिर्फ शब्द है उनके दिए स्नेह को समझने के लिए



मेरा बचपन थक के सो गया माँ तेरी लोरियों के बग़ैर
एक जीवन अधूरा सा रह गया माँ तेरी बातो के बग़ैर

तेरी आँखो में मैने देखे थे अपने लिए  सपने कई
वो सपना कही टूट के बिखर गया माँ तेरे बग़ैर..... 

माँ जन्म देने वाली हो या पालने वाली ,दोनो ही दिल के करीब होती हैं। जन्म देने वाली से पालने वाली माँ की अहमियत भी कम नहीं समझ सकते । अपने पर्सनल अनुभव से मैं यही कह सकती हूँ। 


माँ हर पल तुम साथ हो मेरे, मुझ को यह एहसास है
आज तू बहुत दूर है मुझसे, पर दिल के बहुत पास है।

तुम्हारी यादों की वह अमूल्य धरोहर 
आज भी मेरे पास है,
ज़िंदगी की हर जग को जीतने के लिए,
अपने सर पर आज भी मुझे महसूस होता तेरा हाथ है।

कैसे भूल सकती हूँ माँ मैं आपके हाथों का स्नेह,
जिन्होने मुंह में मेरे डाला था पहला निवाला,
लेकर मेरा हाथ अपने हाथों में,
दुनिया की राहों में मेरा पहला क़दम था जो डाला
जाने अनजाने माफ़ किया था मेरी हर ग़लती को,
हर शरारत को हँस के भुलाया था,
दुनिया हो जाए चाहे कितनी पराई,
पर तुमने मुझे कभी पराया नही किया था,
दिल जब भी भटका जीवन के सेहरा में,
माँ की प्रीत ने एक नयी रहा जीवन को दिखाई।

ज़िंदगी जब भी उदास हो कर तन्हा हो आई,
माँ तेरे आँचल के घने छांव की बहुत याद आई।

आज नही हो तुम जिस्म से साथ मेरे,
पर अपनी बातो से , अपनी अमूल्य यादो से
तुम हर पल आज भी मेरे साथ हो..........
क्योंकि माँ कभी ख़त्म नही होती .........
तुम तो आज भी हर पल मेरे ही पास हो.........

शेष अगले भाग में ....

Wednesday, November 06, 2019

प्रेम ही बंधन प्रेम ही मुक्ति ( अंतिम भाग ,प्रेम के रंग)

मेरी नज़र में प्यार वही है जो देहिक संबंधों से ऊपर उठ कर हो .प्रेम देह से ऊपर अध्यात्मिक धरातल पर ले जाता है और प्रेम की इस हालत में इंसान कई प्रकार के रूप लिए हुए भी समान धरातल में जीता है ..प्रेम की चरम सीमा वह है जब दो अलग अलग शरीर होते हुए भी सम्प्दनों का एक ही संगीत गूंजने लगता है और फ़िर इसका अंत जरुरी नही की विवाह ही हो ..प्रेम हर हालात में साथ रहता है .जैसे " मीरा के प्रेम "की अभिव्यक्ति  अध्यात्मिक थी वह उस परमात्मा का अंश बन गई थी उसी का रूप बन गई थी जहाँ कोई भेद नही ...कोई छुपाव नही ...एक ऐसी ही जुस्तजू थी जिसको पा कर बस उसमे खोना ही सब कुछ है 



जुस्तजू 
तेरे मीठे बोलो 
तेरी प्यारी सी छवि 
अपन वजूद पर 
फैली हुई तेरी खुशबु 
बस एक ओक में भरूँ
और चुपके से पी जाऊं 

एक जगह पढ़ा कि  प्यार बुनयादी तौर  लेना देना ही है --जिस हद तक तुम दे सकते हो और जिस हद तक मैं ले सकता हूँ। .सच ही तो तो है। .पेम को परिभाषित करना मिर्जा ग़ालिब के शब्दों में। । "इश्क़ - ऐ तबियत ने जीस्त का मजा पाया /दर्द की दवा पायी दर्द -ऐ -बे दवा पाया। "भाव -- मैंने प्रेम के माध्यम से जीवन का परमानन्द पा लिया। एक दर्द का इलाज हो गया ,पर एक रोग लाइलाज लगा लिया। प्रेम के बारे में तो  जितना लिखा जाए उतना कम है पर पढ़ते पढ़ते कुछ विचार जरुर कविता में लिखे गए। ….सबकी अपनी परिभाषा जब आप प्यार मे   होते हैं तो  कुछ और   सोच नहीं पाते सिर्फ इस खेल के कि वह मुझे प्यार करता है या वह मुझे प्यार नहीं करता :) प्रेम भाषा का संस्कृत काव्य में बहुत हद तक परिष्कृत काव्य के साथ साथ लोकिक प्रेम काव्य पाया जाता है ..रामायण से हमें एक संदर्भ मिलता है कि प्रेमी इस तथ्य से आन्दित है कि वह उसी हवा में सांस ले रहा है जिस में उसकी प्रिया सांस ले रही है ...ऐ पवन ! तू वहां तक बह कर जा.जहाँ मेरी प्रिय है उसको स्पर्श कर और मुझे स्पर्श कर ...मैं तेरे माध्यम से उसके कोमल स्पर्श का अनुभव करूँगा और चन्द्रमा के प्रकाश में उसका सोन्दर्य देखूंगा ..अब आज के युग में यही सब बाते बहुत बचकानी लग सकती है 
प्रेम
उस विस्तृत नील गगन सा
जो सिर्फ अपने आभास से ही
खुद के अस्तित्व को सच बना देता है

प्रेम
टूट कर बिखरने की
एक वह प्रक्रिया
जो सिर्फ चांदनी की रिमझिम में
मद्दम मद्धम सा
दिल के आँगन में
तारों की तरह टूटता रहता है!


पर आज कल कौन इस बात को समझ पाता है समय ही ऐसा आ गया है कि लोग प्रेम को सिर्फ़ अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करते हैं स्वार्थ वश दोस्ती करेंगे और मतलब के लिए प्यार केवल अपने लिए सोचेंगे और अपना मतलब पूरा होते ही गिरगिट की तरह रंग बदल लेंगे प्यार के लिए सबका अपना अपना नजरिया है कोई इस में डूब के पार लगता है तो उस में बह के ...फर्क सिर्फ़ समझने का है ..यहाँ न अमृता के प्यार को कम आँका जा सकता है न मीरा के ..दोनों ने अपने अपने तरीके से प्यार के हल पल को जीया और भरपूर जीया ....


इश्क की इबादत .उस खुदा से मिलने जैसा ,जो नही पास हो कर भी साथ ही है ....यहाँ "'है "'और "'नही "'का मिलन वह मुकाम है .जो दिल को वहां ले जाता है जहाँ सिर्फ़ एहसास हैं और एहसासों की सुंदर मादकता ...जो इश्क करे वही इसको जाने ...जैसे हीर, राँझा -राँझा करती ख़ुद राँझा हो गई ...यह इश्क की दास्तान यूँ ही बीतते लम्हों के साथ साथ बीतती रही |कहते हैं जब किसी इंसान को को किसी के लिए पहली मोहब्बत का एहसास होता है तो वह अपनी कलम से इसको अपने निजी अनुभव से महसूस कर लफ्जों में ढाल देता है | उसको इश्क में खुदा नजर आने लगता है |एक रिश्ता जो कण कण में रहता है और पूरी कायनात को अपने वजूद में समेट लेता है .यह एहसास सिर्फ़ मन में उतरना जानता है ..किसी बहस में पड़ना नही .....यह सदियों से वक्त के सीने में धड़कता रहा ...कभी मीरा बन कर ,कभी लैला मजनू बन कर ..और कभी शीरी फरहाद बन कर ..

और कभी बाहर निकला भी तो कविता बन कर या शायरी की जुबान मे ,

समाप्त🙏

Monday, November 04, 2019

प्रेम और ध्यान ( सीरीज 4 )

प्रेम की स्थिति सच में बहुत विचित्र होती है। मन की अनन्त गहराई से प्यार करने पर भी यदि निराशा हाथ लगे तो ना जिया जाता है ना मरा। जैसे कोई रेगिस्तान की गरम रेत पर चल रहा हो जहाँ चलते-चलते पैर जल रहें हैं पर चलना पड़ता है। बस एक आशा या मृगतृष्णा सी दिल में कहीं जागी रहती है कि अब कोई सच्चा प्रेम करने वाला मिल जायेगा शायद जीवन के अगले मोड़ पर ही।
मोहब्बत

अगर कभी गुजरो
मेरे दिल के दरवाज़े से हो कर
तो बिना दस्तक दिए
दिल में चली आना
कि तुम्हारे ही इंतज़ार में
मैंने एक उम्र गुजारी है !!
परन्तु जीवन चलने का नाम है और यह निरंतर चलता ही रहा है,बह रहा है,समय की धारा में। कोई भी रिश्ता यूँ ही एक दम से नही जुड़ जाता। हर रिश्ता अपना वक़्त लेता है। कोई भी व्यक्ति सभी से सहजता से संबंध नही बना लेता,अपने जीवन में वो अपने दिल के क़रीब बहुत कम लोगो को आने देता है। जब दो व्यक्ति एक दूसरे की तरफ़ आकर्षित होते हैं तो उनके भीतर होने वाली रासायनिक क्रियाएँ ऐसे प्रभाव पैदा करती है जिनसे उनके हाव भाव बदलने लगते हैं,घंटो एक-दूसरे से बाते करना चाहे उनका कोई अर्थ हो ना हो, दोनो के दिल को सुहाता है। पहले-पहल कोई भी रिश्ता दिल से नही जुड़ जुड़ पाता पर धीरे-धीरे सब कुछ जान कर व्यक्ति आपस में बंधने लगता है।

ध्यान

सिर्फ़ तुझ में गुम
दिल में यादों के साये
और आंखो में ख्वाब तेरे
ध्यान का एक सुंदर रूप
यह भी तो है !!