Wednesday, June 29, 2022

इजाज़त मंजर नामा (फिल्म समीक्षा)

 एक दफा वो याद है तुमको ,

बिन बत्ती जब साईकल का चालान हुआ था 

हमने कैसे भूखे प्यासों बेचारों सी एक्टिंग की थी

हवलदार ने उल्टा .एक अट्ठनी दे कर भेज दिया था

एक चवन्नी मेरी थी ,

वो भिजवा दो ....

सब भिजवा दो

मेरा वो समान लौटा दो ....

एक इजाजत दे दो बस ,

जब इसको दफनाऊँगी 

मैं भी वही सो जाऊँगी ..


भूल सकते हैं क्या आप इस गाने के बोल को ...नहीं न ?



कुछ कुछ फ़िल्में दिल पर गहरे अपना असर छोडती है और अक्सर देखी जाती है पर वही आपके हाथ में यदि किताब के रूप में आ जाए तो इस से बढ़िया तो कुछ हो ही नहीं सकता है ..कुछ ऐसा ही हुआ जब मुझे गुलजार की  लिखी किताब "इजाजत " मुझे मिली ..यह एक "मंजर नामे "के रूप में है |जो नजर आये उसको "मंजर "कहते हैं और मनाज़िर में कही गयी कहानी को "मंजरनामा "कहा जाता है गुलजार के लफ़्ज़ों में

साहित्य में मंज़रनामा एक मुकम्मिल फॉर्म है। यह एक ऐसी विधा है जिसे पाठक बिना किसी रुकावट के रचना का मूल आस्वाद लेते हुए पढ़ सकें। लेकिन मंज़रनामे का अन्दाज़े-बयान अमूमन मूल रचना से अलग हो जाता है या यूँ कहें कि वह मूल रचना का इन्टरप्रेटेशन हो जाता है।

मंज़रनामा पेश करने का एक उद्देश्य तो यह है कि पाठक इस फॉर्म से रू-ब-रू हो सकें और दूसरा यह कि टी.वी. और सिनेमा में दिलचस्पी रखने वाले लोग यह देख-जान सके कि किसी कृति को किस तरह मंज़रनामे की शक्ल दी जाती है।

   फिल्म "इजाज़त का मंज़रनामा"  फिल्म की तरह ही  रोचक है इस फिल्म को अगर हम औरत और मर्द के जटिल रिश्तों की कहानी कहते हैं, तो भी बात तो साफ हो जाती है लेकिन सिर्फ़ इन्हीं शब्दों में उस विडम्बना को नहीं पकड़ा जा सकता, जो इस फिल्म की थीम है। वक्त और इत्तेफ़ाक, ये दो चीजें आदमी की सारी समझ और दानिशमंदी को पीछे छोड़ती हुई कभी उसकी नियति का कारण हो जाती हैं और कभी बहाना।

        

" इजाजत" कहानी का इतिहास कुछ इस तरह से है ...गुलजार के लफ़्ज़ों में सुबोध दा  की कहानी "जोतो ग्रह "बंगला में पढ़ी उन्होंने कोलकत्ता जा कर उनसे राइट्स खरीद लिए कई साल गुजर गए उन्हें कोई प्रोड्यूसर नहीं मिला और फिल्मों में कहानियां बहुत जल्दी आउट डेटेड हो जाती है बहुत साल बाद जब उन्हें सचदेव जैसे प्रोड्यूसर मिले तो गुलजार ने एक और स्क्रिप्ट लिखी जिस में कहानी का अक्स रह गया कहानी बदल गयी किरदार बदल गए लेकिन पहली और आखिरी मुलाकात वही रही जो उस कहानी में थी फिर वह डरते डरते सुबोध  दा के पास गए और सब बात सही कह दी ..सुबोध दा बोले सुनाओ कहानी ..गुलजार जी ने  सुना दी सुनने के बाद वह कुछ देर चुप रहे फिर धीरे से चाय की चुस्की ली और बोले --गलपों शे नोयें  --किन्तु भालो लागछे !"गुलजार साहब ने पूछा कि आपका नाम दे दूँ ?"वह मुस्कराए और बोले दिए दो ...आमर नामेर टाका ओ तो दिए छो "उनसे इजाजत ले कर उन्होंने यह फिल्म शुरू कर दी ... 

          पानी की तरह बहती हुई इस कहानी में जो चीज़ सबसे अहम है वह है इंसानी अहसास की बेहद महीन अक़्क़ाशी, जिसे गुलजार ही साध सकते थे। पढ़ते पढ़ते आप कहानी के पात्रों के साथ साथ चलते जाते हैं .लिखा हुआ हर वाक्य पात्र द्वारा बोला हुआ लगने लगता है ..जैसे यह ..


"थोड़ी देर सो गयी होती |'


नींद नहीं आई |"


पता ही नहीं चला ..कब शाल मुझे ओढा कर चली गयी ,पानी का गिलास रख दिया .जैसे पूरा घर साथ ले कर चलती हो .."


आपने भी सब सारा समान ऐसे यहाँ वेटिंग रूम में बिखरा रखा है जैसे घर में बैठे हो ..तोलिया कहीं ,साबुन कहीं .गीले कपडे अभी तक बाथरूम में हैं ...मैं थी इस लिए या अब तक वही हालात  है ..

कुछ घर जैसा ही लग रहा है सुधा .."

जी ..

तुम्हे कुछ पूछना नहीं है मुझसे ?

जरुरत है ?"

नहीं हो हुआ उसको बदला नहीं जा सकता है आदमी पछता सकता है .माफ़ी मांग सकता है मैंने तुम्हारे साथ बहुत ज्यादती की है "


 सुधा बात बदलते हुए" माया कैसी है ?"

थोड़ी देर ख़ामोशी के बाद महेंदर ने जवाब दिया

तुम्हे याद है जब हम "कुदरे मुख" से वापस आये थे

हाँ उसी दिन आपका जन्मदिन था

उसी दिन एक फ़ोन आया था

और आपको जरुरी काम से बाहर जाना पड़ा था

तुम्हे याद है सब

हूँ ...........

वही मैं अस्पताल गया था उस रात माया ने खुदकशी की कोशिश की थी उस वक़्त तुम्हे बताना मुनासिब नहीं समझा उस वक़्त चला गया और उसके बाद उसको लगातार मिलता रहा उसको बचाना अपना फर्ज़ महसूस हुआ ..पागल थी वो ..कभी रोती थी ,कभी लडती थी ..और कभी लिपटती थी ..उसी में शायद एक दिन उसका झुमका मेरे कोट में अटका रह गया ,जैसे शाल में अटका आज तुम्हारा यह झुमका मिला है ..


सुधा अपने कानों को देखने लगी .एक झुमका महेंदर की हथेली पर था


शायद मुझे तुम्हे सब कुछ बता देना चाहिए था लेकिन मेरी अपनी समझ में नहीं आ रहा था कुछ भी ...माया की इस हरकत से मैं डर गया था संभलने की कोशिश कर रहा था कि वो घर से भाग गयी ..वापस आया तो तुम भी जा चुकी थी ...उस दिन  मुझे दिल का पहला दौरा पड़ा "

सुधा ने चौंक कर महेंदर की तरफ देखा एक गुनहगार की तरह ......

तुम्हारा जाना बुरा लगा गुस्सा  भी था नाराजगी भी थी ...एक महीना अस्पताल में रहा ..


इस तरह आप कहानी के साथ देखें गए पात्रों के साथ खुद को देखते हुए बहते चले जाते हैं और यह काम सिर्फ गुलज़ार कर सकते हैं ...निश्चय ही यह एक श्रेष्ठ साहित्यक रचना है जिसको आप बार बार पढना चाहेंगे  ..और इस का अहम् किरदार" माया "...जिसने मुझे तो बेहद प्रभावित किया ...वह बिंदास सी लड़की ..जो अपनी ज़िन्दगी सिर्फ अपनी शर्तों पर जीती है ..और अपना अंत भी खुद हो तय करती है ...उसका होना इस कहानी को मुकम्मल बनाता है ...माया ..और यह किताब और यह मूवी .लाजवाब है ..

अपने लिखे हुए इस में इस गाने के सच्चे बोल सी


तुमने तो आकाश बिछाया

मेरे नंगे पैरों में ज़मीन है

देखे तो तुम्हारी आरज़ू है

शायद ऐसे ज़िन्दगी हसीन है

आरज़ू में बहने दो

कतरा कतरा मिलती है

कतरा कतरा जीने दो

ज़िंदगी है, बहने दो

रंजू ..........

Monday, June 27, 2022

पहली हवाईयात्रा (किस्से घुमक्कड़ी के भाग 4)

 


गर्ल्स गैंग किस्से घुमक्कड़ी के भाग3

(वाइजेग ) विशाखापट्टनम की स्पेशल यात्रा ...


यह मेरे लिए हर मायने में स्पेशल यात्रा थी, एक तो यह मेरी पहली जिंदगी की "हवाई यात्रा "थी, दूसरा बेटी की जॉब करके "नोवाटेल होटल " फाइवस्टार में बिल्कुल समुंद्र के सामने कमरा बुक था। और बहुत ही vip वेलकम रहना घूमना था। उस पर यह जगह बहुत ही सुंदर थी। मुझे वैसे ही समुंद्र बहुत पसंद है। तो इस तरह से चार दिन के ट्रिप की हर बात खास थी। 


   आस पास के सब जगह के साथ हमने वहां के आदिवासी इलाके और "बोराकेव्स "भी देखी। जब हम वहां फरवरी में भी गए थे तो भी उस वक्त भी वहां बहुत तेज गर्मी थी। 


होटल में हम सुबह रेडी होते ,साथ में हमारा लंच और स्नैक्स,पानी अच्छे से पैक कर के दे देते होटल वाली और गाड़ी तो हमेशा रेडी थी हमें घुमाने के लिए। हम भी पूरे उत्साह से इस नई जगह को एक्सप्लोर कर रहे थे। हर जगह की रोचक जानकारी ले रहे थे।वहां के बीच अब तक के देखे गए बीच से बहुत ज्यादा साफ सुथरे और सुंदर थे। 



एक दिन हम होटल के सामने वाले बीच पर बैठे थे ,शाम का समय था बहुत ही सुंदर और बढ़िया नजारा था, तभी एक तेज लहर आई और बिटिया की चप्पल ले गई ।अब होटल वापिस कैसे आए ,फाइव स्टार होटल दरबान ,और सब एंट्री पर ,वो जो हम भागते हुए लिफ्ट तक गए वह बहुत ही फनी था। अब लगता है कि इतने  क्यों कनफ्यूज थे आखिर हम ,अब यदि समुंदर के किनारे हैं तो इस तरह से बातें होना स्वाभाविक ही था। पर शायद दिमाग में फाइव स्टार होटल का होना था कि कैसे अंदर इस तरह से जाएं।


खैर आने से एक दिन पहले हमे बताया गया कि आज हम "रामो जी स्टूडियो "देखने जाएंगे ,यह हैदराबाद जितना बड़ा तो नहीं पर देखने लायक है, मिस करने लायक नहीं है। उस दिन गर्मी बहुत थी और हम दोनो मां बेटी का बिल्कुल ही जाने का मन नहीं था, सोचा कि यहां से निकलते हैं रास्ते में ड्राइवर को कह देंगे आइडिया चेंज हो गया है आप हमें "ऋषिकोंडा बीच "पर उतार देना। पर एक समस्या जो बहुत बड़ी थी वह थी भाषा की ,न वो हिंदी समझ रहे न इंग्लिश ,उन्हें जो होटल मैनेजर ने कहा था वो बस  यस यस बोलते हमारी हर बात पर और हमे वहां फिल्म स्टूडियो की तरफ ले चले। हम दोनो खूब इरिटेट और चिडचिडे से उतरे गेट पर कि यार!  क्या जबरदस्ती है। नहीं जाना हमे फिल्म स्टूडियो देखने। 




लेकिन हम शायद गलती पर थे ,वो फिल्म स्टूडियो हम दोनों ने  इतना एंजॉय किया कि अभी तक भूल नहीं सकती। वो घरों के ,मार्केट के बड़े बड़े सेट ,जेल पुलिस स्टेशन ,बड़े बड़े बाग ,मंदिर ,चर्च के सेट ,बहुत ही अमेजिंग लगे । 


इसी को देख कर मेरे मन में हैदराबाद वाले फिल्म स्टूडियो को देखने की इच्छा हुई थी जो कुछ वक्त बाद मैने देखा भी। पर यह पहला अनुभव किसी फिल्म स्टूडियो को देखने का बहुत ही रोमांचकारी था। यदि ड्राइवर हमारी बात समझ कर हमें न ले जाता तो हम वाकई कुछ मिस कर देते अपने इस ट्रिप का। बाद में वो हमें बीच पर भी ले गया ,अब यह याद नहीं कि वो उसको कहा गया था ,या हम दोनो बार बार बीच बोल रहे थे तो ले गया। पर हमने दोनो जगह खूब एंजॉय की ।और वापसी में उन्हें थैंक्स बोला। कई बार ट्रिप के दौरान वहां के लोगों की बात मान लेनी चाहिए ताकि बाद में अफसोस न रहे कि हम इतनी दूर गए भी और यह देखना मिस कर दिया। इस ट्रिप के साथ बहुत ही मीठी और प्यारी यादें जुड़ी हैं ठीक किसी भी पहले प्रेम सी और यह हमेशा याद रहेगी।

यात्राएं जब तक कोरोना ने दस्तक नहीं दी थी ,खूब घुमक्कड़ी की और हर यात्रा के साथ तो यूं ही खट्टी मीठी यादें जुड़ ही जाती है। इस सीरीज की आखिरी कड़ी में मिलते है जल्द ही ...


Thursday, June 23, 2022

गर्ल्स गैंग ट्रिप ,किस्से घुमक्कड़ी के भाग 3

 

खट्टे मीठे किस्से घुमक्कड़ी के भाग1

खट्टे मीठे किस्से घुमक्कड़ी के भाग2


यह  है गुजरात की न भूलने वाली यात्रा जो सिर्फ हम गर्ल्स गैंग ने पहली बार की और बहुत सफल रही, इस यात्रा के मजेदार अनुभव के बाद हमारे इस तरह से घूमने के हौंसले बुलंद हुए😊


बहन के पैरों की छम छम और वो दीव (diu) की उस साल की आखिरी रात...


छोटी बेटी की अहमदाबाद में इंटर्नशिप थी ,और फिर कुछ टाइम वहां जॉब भी। जब बिटिया गुजरात में है तो घूमना तो बनता ही था। पूरा हमारा सिस्टर्स ग्रुप with सब बच्चों के साथ रेडी हो गया ,सब हम लड़कियां और एक बहन का बेटा कुल नौ का ग्रुप । अहमदाबाद से आगे की सब बुकिंग बेटी ने करवा रखी थी। हमारे घूमने के स्थान थे अहमदाबाद, फिर पोरबंदर, सोमनाथ ,द्वारका धीश और अंत में दियु द्वीप। 

इसमें सोमनाथ को छोड़ कर बाकी सब जगह रहने की पहले ही बुकिंग करवा दी थी। सोमनाथ में भी कोई अधिक मुश्किल नहीं हुई वहां भी रहने की जगह मिल गई। जो गाड़ी हमने अहमदाबाद से आगे के लिए की थी उसका ड्राइवर बहुत ही सरल और ध्यान रखने वाला इंसान था।  वो हर जगह हमारा पूरा ध्यान रखता रहा। 

  सोमनाथ ट्रिप में जो बात याद रही वो बहुत ही मजेदार किस्सा है ,वहां पर सोमनाथ मंदिर में रात को लाइट एंड साउंड का शो होता है, जब हम उस जगह पहुंचे तो शो शुरू हो चुका था, अंधेरा था ,पीछे साउंड और लाइट चल रही कि कुछ इस तरह के संवाद के साथ कि "रानी यूं छम छम करती हुई आती थी, "सुन कर मेरे से छोटी बहन उसी तरह मटकते हुए छम छम बोलती  और चलती आ रही थी  कि सामने देखा तो पूरी सीट्स भरी हुई है लोगों से और लाइम लाइट में वो दिख रही है। हम सब भी उसके पीछे पीछे वैसे ही हंसते हुए चले आ रहे।और सब हमें और हमारी हरकतों को देख रहे कि यह कौन सा लाइट एंड शो का हिस्सा है। 


सामने लोगों को देख कर हम सबने भाग कर अपनी सीट ली और आगे का शो चुपचाप देख कर सबके निकलने के बाद ही वहां से निकले। आज भी हम उस किस्से को याद करके जोरों से हंस देते हैं।

 
ट्रिप के  आखिरी के  दिन हमारे दीव (diu)के नाम थे। होटल प्रॉपर दीव से एक घंटे के दूर था। गाड़ी पास होने से यह दूरी बहुत अधिक नहीं लग रही थी।


 31 दिसंबर की रात थी सब नए साल को मानने की जोश में थे। हम लोगों ने भी diu boat क्रूज का प्रोग्राम बनाया । सब रेडी हो कर गाड़ी में बैठे तो ड्राइवर ने कहा कि "आप सब लड़कियां है तो जाइए जरूर पर टाइम से वापिस आ जाएं क्योंकि शाम होते ही वहां का माहौल खराब हो जायेगा। " असल में गुजरात में ड्रिंकिंग एलाऊ नहीं है पर दीव द्वीप में कोई मनाही नहीं है , सो पीने वाले वो भी नए साल की पार्टी वहां कर रहे थे ,तो वहां का माहौल बिगड़ना लाज़मी था। उसी की चेतवानी दबे शब्दों में हमारे ड्राइवर ने हमसे कही। पर जी हम तो कुछ अपने ही नए साल को मानने के मूड में थे, तो "अच्छा अच्छा" कह कर उसकी बात टाल सी दी । जब गाड़ी से उतरे हम सब तब भी उसने कहा आप लोग जल्दी से घूम कर वापस आ जाए । जल्दी वापस जाना आज ठीक रहेगा। 

हमने आराम से डिनर किया बोट क्रूज की टिकट ली और खूब गाने डांस करके  क्रूज में भी  एंजॉय किया। टाइम बीत रहा था और हम आने वाले किसी भी बात से बेफिक्र थे। 


क्रूज जब वापिस किनारे लगी तो सामने का नजारा देख कर हम तीनों बहनों और बच्चों की तो एक बार फूक ही सरक गई। उतरने वाली जगह पर तो बहुत से यंग लड़के ,बड़े आदमी कुछ पीए हुए , कुछ हाथ में लिए हुए खड़े हैं , वहां औरते बहुत कम नाम मात्र ही थी उस वक्त किनारे पर। हमारे साथ जवान बेटियां थी ,खुद हम थे ,पता नहीं उस वक्त हमने कैसे आंखों ही आंखों में एक दूसरे को इशारा किया एक दूसरे का हाथ पकड़ा और तेज़ी से भीड़ को चीरते हुए अपनी गाड़ी की तरफ भागे , "हटो , हटिए ,दूर हटो "सिर्फ यह शब्द और भागती हम तीनों बहनों के हाथ में बच्चों के हाथ ,बस यही होश बाकी था उस वक्त ।

ड्राइवर जो शुरू से सावधान कर रहा था पर उस बेचारे की बात कौन समझता  न्यू ईयर के मौके पर। हमें यूं भागते आते देख कर उसने  गाड़ी एक दम स्टार्ट  करी और हम एक दूसरे को अंदर धकलते हुए गाड़ी में जैसे तैसे बैठ गए। आगे का वो एक घंटे का रास्ता ड्राइवर समेत हम सब ने बिल्कुल चुपचाप तय किया। गाड़ी से उतरे और अपने होटल में चले आए। ड्राइवर से कुछ कहने पूछने की भी हिम्मत नहीं हुई कि कल कितने बजे की वापसी है ।वो भी हम सबको डरा हुआ देख कर बिल्कुल चुप रहा। 

होटल रूम में आ कर हम सबने एक दूसरे को देखा ,डरे हुए चेहरे अब सामान्य होने की कोशिश कर रहे थे और फिर जो सबकी जो हंसी निकली वो याद रहेगी। पर यह हंसी तभी थी जो हम सुरक्षित वापिस आ गए। नहीं तो जो भीड़ और उसका हवस भरा चेहरा हमने देखा था वह बहुत ही डराने वाला था। कुछ न होता तो सही था पर यूं पिए  हुए लोगों का और इस तरह की भीड़ की कोई शक्ल और कोई तमीज नहीं होती, कुछ गलत हो जाता तो क्या होता किसी भी बच्ची या हमारे साथ ही कोई छेड़छाड़ हो जाती तो हम कैसे उस से निपटते ,यह तो वहां सुरक्षित पहुंच कर ही सोचा। यह शिक्षा ली कि ऐसी जगह जाना avoid  ही किया जाए और लोकल रहने वाली की बात जरूर सुन लेनी चाहिए , मान लेनी चाहिए।

और इसी बात को कि लोकल घुमाने वाले की बात मान लेनी चाहिए को ले कर ही अगली घुमक्कड़ी यात्रा जो "#वाईजेग "से जुड़ी है यादों के साथ। जुड़े रहिए किस्से खट्टे मीठे घुमक्कड़ी के किस्सों के साथ।

पहले के दो किस्से यदि आपने नहीं पढ़े हैं तो इसी ब्लॉग पर इन लिंक्स पर पढ़े...

किस्से घुमक्कड़ी के भाग 1

किस्से घुमक्कड़ी के भाग 2


Tuesday, June 21, 2022

किस्से घुमक्कड़ी के (भाग 2)

 खट्टे मीठे किस्से घुमक्कड़ी के भाग 1


खट्टे मीठे किस्से घुमक्कड़ी के अगले भाग में है पहली उड़ीसा यात्रा सुसराल के साथ .. तो इस यात्रा को तो यादगार रहना ही है😊



शादी के बाद दो चार बार जहां घूमने गए हम दोनो पति पत्नी ही गए। फिर बच्चे हुए तो आगे बहनों का सुसराल में परिवार भी बढ़ता गया। तो घूमना परिवार के साथ हो गया ।  और पति के साथ कम शुरुआत में पहले कुछ ट्रिप सास ससुर और ननद के साथ हुए। जब पहला ट्रिप इस तरह का बना तो दिल में बहुत घबराहट थी क्योंकि अस्सी दशक की बहू मेरे जैसी सिर्फ हांजी हांजी और सिर्फ जो पूछा उसके जवाब के साथ सिमटी हुई थी तो इस तरह से उनके साथ घूमने जाना बहुत ही अनोखा एहसास दे रहा था। और एक डर भी क्योंकि पति नहीं साथ जा रहे थे। 

मैं मेरी दोनो बेटियां ननद और उसकी बेटी साथ में सासू मां और ससुरजी। मम्मी यानी सास से मेरी बहुत बनती थी तो उनके साथ सहज थी। पापा के साथ थोड़ा डर वाली फीलिंग  और ससुर बहु वाली एक झिझक भी थी।  वह घर में काफी रौब से रहते थे और जो उन्होंने कह दिया बस वही सही बाकी कोई कुछ न बोले। सरकारी नौकरी में अच्छी पोस्ट पर थे। घूमने का उनका खुद का तो काफी रहता था ,पर इस बार घूमने का प्रोग्राम परिवार के साथ बनाया उन्होंने। अब प्रोग्राम चूंकि उन्होंने ही बनाया था और कहा साथ चलना है तो बस जाना ही था चूंकि मुझमें खुद भी घूमने का कीड़ा था तो अंदर से डरी हुई के साथ खुश भी थी। 

पहला ट्रिप हमारा जगन्नाथ पुरी का था। ट्रेन से जाना था । खाना बना कर ले गए थे । सफ़र बहुत ही सुखद और हंसी खुशी गया। जब हम स्टेशन पर उतरे तो शाम हो चुकी थी । गेस्ट हाउस हमारा बुक था और स्टेशन से कुछ दूर अंदर मन्दिर के कहीं आसपास था।  वहां जा कर पता चला कि  वो सिर्फ रहने की जगह है , खाने पीने का इंतजाम हम लोगों को खुद करना था ।

 ट्रेन का सफर दो दिन का था उन दिनों और हमारे पास तीन छोटे बच्चे थे जिनके कपड़े काफी गंदे हो चुके थे। तो मम्मी और मैं तो मौका मिलते ही कपड़े धोने में लग गए पापा जी खाने का इंतजाम करने चले गए। अभी आधे कपड़े ही धुले थे कि पापा जी आए और बोले कि दूसरे guest House में जाना है यहां आगे भी खाने की  समस्या रहेगी बच्चों के साथ ठीक नहीं रहेगा।  हम सास बहू ने यूं ही आधे धुले  गीले कपड़ों की पोटली बांध ली ,परंतु मैं अंदर से डरी हुई थी कि अब डांट पड़ेगी इस तरह से आते ही कपड़े धोने पर और यूं गठरी बांधने पर ।आखिर उनके भी स्टेट्स की बात थी। उस पर सोने पर सुहागा कि तेज बारिश शुरु हो गई ,लाइट सब गुल हो गई और कोई टैक्सी वहां जहां जाना था वहां तक के लिए नहीं मिल रही थी। उन दिनों कोई मोबाइल या अन्य नेट सुविधा तो थी नहीं कि ऑनलाइन कुछ मंगवा लिया जाए ,बाहर जा कर ढूंढना था और वो भी अनजान शहर में।

 रात होने के कारण गेस्ट हाउस में जो बंदा था वो भी न हमारी भाषा समझ पा रहा न हम उसको कुछ समझा पा रहे। तीन छोटे बच्चे ,ननद और मैं और एक तरह से हर चीज को संभालने वाले पापा जी। खुद का सोचूं तो अभी कुछ ऐसी बात हो जाए तो मैं बाहर भी आसानी से हैंडल कर लूंगी पर उस वक्त की मैं जो चौबीस साल की थी बिल्कुल ही भोंदू और डरपोक सी थी पूरी तरह से बड़ों पर डिपेंडेट। तभी गेस्ट हाउस के सामने एक हाथ रिक्शा खड़ा दिखा ,पापा जी ने उस से कोई मोलभाव नहीं किया बस कहा कि इस से दूर ही कुछ गेस्ट हाउस एक और है वहां तक जाना है ,वो ले चलने को तैयार हो गया। सीट पर किसी तरह हम तीन बच्चों के साथ न जाने कैसे बैठे वो तो अब इतना याद नहीं पर पापा जी रिक्शे वाली की सीट पर हमारे गीले कपड़ों की गठरी ले कर जिस तरह बैठे वो आज भी अच्छी तरह से याद है। रिक्शे वाला न जाने कैसे उस भरी बरसात में हमे ले कर जा रहा था वो भी वो ही जाने। हां यह जरूर था मन में मेरे कि वहां सही सलामत पहुंच जाए ,और जो डांट पड़नी है उस से कैसे बचा जाएगा।


 राम राम करके वहां पहुंचे तो कमरे में जा कर पापा जी मुस्करा रहे , मम्मी ने पूछा क्या हुआ तो यही बोले कि "यह पहला दिन याद रहेगा। तुम सास बहू का रेस्ट हाउस पहुंचते ही उसको घर सा बना देना और मेरा यूं उल्टे मुंह रिक्शे पर बैठ कर आना वो भी तुम्हारी गीली गठरी के साथ। यह तो रात है और बारिश है तो जो मुझे किसी ने इस तरह से देखा नहीं "कह कर वह हंस दिए। 

उनके इस तरह कहने से  माहौल एक दम सहज सरल सा हो गया। और जो एक झिझक सी थी वह भी खत्म हो गई । उस यात्रा के साथ उनके साथ की गई आगे की यात्राएं भी सरल हो गई। बाहर निकल कर उनका घर वाला कठोर रूप बिल्कुल बदल जाता था। मम्मी के साथ मैं शुरू से ही सहज कंफर्टेबल थी। बाहर घूमने में पापा जी के साथ भी वही सहजता आ गई । वह हर चीज का ध्यान रखते ,खाने पीने से ले कर बच्चों के साथ आराम से घूमने का। हर छोटी बात पर बच्चों सा खिलखिलाते और हमे भी हंसाते। उनके साथ याद रखने लायक यात्राओं में सोमनाथ मंदिर , द्वारकाधीश , उड़ीसा ,आदि हैं। 


यह यात्राएं हमें इंसान के उस रूप से भी मिलाती है जो घर में अलग ही व्यक्तित्व लिए रहते हैं पर अलग स्थान अलग परिवेश उन्हें उस व्यक्तित्व से बिल्कुल जुदा दिखाता है जो हमारे समाज के नियमों चलते उन्हें घर में बनाए रखना पड़ता है। घर वापस आते ही हम फिर उसी रंग में वापिस आ जाते हैं। तभी तो मुझे घुम्मकड़ होना पसंद है क्योंकि यही यात्राएं आपको खुद से परिचित करवाती है ,दूसरों के मूल स्वभाव से परिचित करवाती हैं। 

एक और यादगार यात्रा के रंग अगले अंक में ..जुड़े रहिए मेरे साथ खट्टे मीठे किस्से घुमक्कड़ी के में ...


हनीमून ट्रिप का मजेदार किस्सा 

Sunday, June 19, 2022

खत अमृता के बच्चों के नाम भाग एक

 खिड़कियां... यह वो संग्रह है जिसमे सोवियत रूस से प्यारे से खत नवराज़ और कंदला दोनो बच्चों को लिखे गए हैं। बेहद खूबसूरत अंदाज में अमृता द्वारा..



खत बच्चों के नाम भाग एक 


https://youtu.be/WQdPH7ER4jQ

मेरे प्यारे बच्चों,

तुमने बचपन में यह कहानी तो सुनी होगी कि एक थी शहजादी। उसे किसी दुरात्मा का श्राप लग गया था और वह सौ बरस सोई रही। फिर एक दूर देश का शहजादा आया ,और उसने जादू की छड़ी से उस शहजादी को जगा लिया। मैं तुम्हे आज जिस घाटी से पत्र लिख रहीं हूं इस घाटी की कहानी भी उस परी जैसी है।


आगे पूरा ख़त सुनिएगा मेरी आवाज़ में इस लिंक में .. रोचक पत्र हैं यह अमृता के बच्चों के नाम । आज समझिए इसका यह पहला भाग है आगे सिलसिला जारी रहेगा। 

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https://youtu.be/WQdPH7ER4jQ