Sunday, July 07, 2019

रुख ज़िन्दगी का

रुख ज़िन्दगी का 

जिस तरफ़ देखो उस तरफ़ है
भागम भाग
हर कोई अपने में मस्त है
कैसी हो चली है यह ज़िन्दगी
एक अजब सी प्यास हर तरफ है
जब कुछ लम्हे लगे खाली
तब ज़िन्दगी मेरी तरफ़
रुख करना


खाना पकाती माँ
क्यों झुंझला रही है
जलती बुझती चिंगारी सी
ख़ुद को तपा रही है
जब उसके लबों पर
खिले कोई मुस्कराहट
ज़िन्दगी तब तुम भी
गुलाबों सी खिलना


पिता घर को कैसे चलाए
डूबे हैं इसी सोच को ले कर
किस तरह सब को मिले सब कुछ बेहतर
इसी को सोच के घुलते जा रहे हैं
जब दिखे वह कुछ अपने पुराने रंग में
हँसते मुस्कराते जीवन से लड़ते
तब तुम भी खिलखिला के बात करना
ज़िन्दगी तब मेरी तरफ़ रुख करना


बहन की ज़िन्दगी उलझी हुई है
चुप्पी और किसी दर्द में डूबी हुई है
याद करती है अपनी बचपन की सहेलियां
धागों सी उलझी है यह ज़िन्दगी की पहेलियाँ
उसकी चहक से गूंज उठे जब अंगना
तब तुम भी जिंदगी चहकना
तब मेरी तारा तुम भी रुख करना


भइया अपनी नौकरी को ले कर उलझा है
जाने अब कौन सा काम कहाँ अटका है
हाथ के साथ है जेब भी खाली
फ़िर भी आँखों में हैं
एक दुनिया उम्मीद भरी
जब यह उम्मीद सच बन कर
झलके
तब तुम भी दीप सी दिप दिप जलना
ज़िन्दगी तुम इधर तब रुख करना

नन्हा सा बच्चा
हेरान है सबको भागता दौड़ता देख कर
जब यह सबकी हैरानी से उभरे
मस्त ज़िन्दगी की राह फ़िर से पकड़े
तब तुम इधर का रुख करना
ज़िन्दगी अपने रंगों सी  खूब तुम खिलना 

Saturday, July 01, 2017

बोल तुम्हारे ज़िन्दगी






सुनो ज़िन्दगी ... 
तुम जो कहना चाहती हो
बिना कहे ही सुन लिया है मैंने
तुम बोल रही थी ,बोल तुम्हारे चांद की ताशें काट रहे थे
तुम कह रही थीं मन की गांठें खोलते हुए
अपने अबूझ अथाह मन की हरकतों की सुगबुगाहट
पंछियों सी उडती हुई अपनी सांसों को तुमने खोल दिया था
मेरे हिस्से की नमी को अपनी आंखों में लेकर
तुमने पी लिया सारा दुख
अपनी ही हाथों सजाए थे तुमने जो सपने
मेरे जेहन में उनकी खुशबू
दिन के वक्त रात सी महक उठी थी
अपनी खामोश सरसराहट से
 तुमने घेरकर बाहों में समेट लिया सारा जहां 
जिसके एक हिस्से में खड़ी  में
निहारती रही तुमको

तुम बोलती रही
बोल तुम्हारे ,चांद की ताशें काटते रहे
अब मैं हतप्रभ  खड़ी  सोचती हूं
जो बातें की हैं मैंने तुमसे
खामोशी के साथ
उन्हें कहां रखूं
क्या करूं
इन शब्दों का
जो तुमने कहे हृदय गुहा से निकालकर.....................



रंजू भाटिया 

Saturday, June 10, 2017

ज़िन्दगी की परिभाषा

पत्थर पत्थर है ..वो ग़लत हाथो में आ जाए तो किसी का जख्म बन जाता है ..किसी माइकल एंजलो के हाथ में आ जाए तो हुनर का शाहकार बन जाता है ..किसी का चिंतन उसको छू ले तो वह शिलालेख बन जाता है ..वो किसी गौतम को छू ले तो व्रजासन बन जाता है .और किसी की आत्मा उसके कण कण को सुन ले तो वह गारेहिरा बन जाता है ..
इसी तरह अक्षर अक्षर है ..
उस को किसी की नफरत छू ले तो वह एक गाली बन जाता है ..वो किसी आदि बिन्दु के कम्पन को छू ले तो कास्मिक धवनी बन जाता है..वो किसी की आत्मा को छू ले तो वेद की ऋचा बन जाता है ,गीता का श्लोक बन जाता है ,कुरान की आयत बन जाता है ,गुरु ग्रन्थ साहिब की गुरु वाणी बन जाता है ..
और इसी तरह मजहब एक बहुत बड़ी संभावना का नाम है | वह संभावना किसी के संग हो ले तो एक राह बन जाती है .कास्मिक चेतना की बहती हुई धारा तक पहुँचने की ...और हर मजहब की जो भी राहो रस्म है -वो एक तैयारी  है  जड़  में से चेतना को जगाने की ..चेतना की पहचान "मैं "के माध्यम से होती है और मजहब उस "मैं "को एक जमीन देता है ....खडे होने की ..वह उसको अपने नाम की पनाह देता है ...लेकिन यहाँ एक बहुत बड़ी संभावना होते होते रह जाती है .मजहब में कोई कमी नही आती है ,कमी आती है इंसान में .और मजहब लफ्ज़ की तशरीह करने वालों में ..जब बहती हो धारा को रोक लिया जाता है ,थाम लिया जाता है तो वो पानी एक जोर पकड़ता है .उस वक्त इंसान को एक ताकत का एहसास होता है .लेकिन यह ताकत चेतना की नहीं......अहंकार की होती है ..कुदरत पर भी फतह पाने की जिद बढ जाती है ..तब यह अहंकार  की ताकत नफरत .और कत्लो खून में बदल जाती है ..

दुनिया के इतिहास का हर मजहब के  नाम पर खून कत्लो आम हुआ है ..और हम इल्जाम देते हैं मजहब को ..इसलिए कि कोई इल्जाम हम अपने पर लेना नही चाहते हैं .हम जो मजहब को अपन अन्तर में उतार नही पाते हैं | मजहब को अन्तर की क्रान्ति है स्थूल से सूक्ष्म हो जाने की ..और हम इसको सिर्फ़ बाहर से पहनते हैं ..सिर्फ़ पहनते हो नहीं बलिक दूसरों को भी जबरदस्ती पहनाने की कोशिश करते हैं ...

हमारी दुनिया में वक्त -वक्त पर कुछ ऐसे लोग जन्म लेते हैं -जिन्हें हम देवता ,महात्मा ,गुरु और पीर पैगम्बर कहते हैं | वह उसी जागृत चेतना की सूरत होते है ,जो इंसान से खो चुकी है | और हमारे पीर पैगम्बर इस थके हुए ,हारे हुए इंसान की अंतर्चेतना को जगाने का यत्न करते हैं ..लेकिन उनके बाद उनके नाम से जब उनके यत्न  को संस्थाई रूप दे दिया जाता है .तो वक्त पा वह यात्रा बाहर की यात्रा हो जाती है वह हमारे अन्तर की यात्रा नही बन पाती है ..

आज हमारे देश के जो हालात है वह हमारे अपने होंठों से निकली हुई एक एक भयानक चीख हैं ..और हम जो टूटते चले गए थे .हमने इस चीख को भी टुकडों में बाँट लिया .हिंदू चीख ...सिख चीख .मुस्लिम चीख .कह कर इस चीख का नामाकरण हुआ .....इसी से जातीकरण हुआ और पंजाब .असाम .गुजरात कह कर इस चीख का प्रांतीय करण हुआ ..

पश्चिम में एक सांइस दान हुए हैं लेथ ब्रेज | उन्होंने पेंडुलम की मदद से .जमीनदोज शक्तियों की खोज की ,और अलग अलग शक्तियों की पहचान के दर नियत किए ...  उन्होंने पाया कि

१० इंच की दूरी से  जिन शक्तियों का संकेत मिलता है ,वह सूरज अगनी .लाल रंग सच्चाई और पूर्व दिशा है ..

२० इंच की दूरी से ..धरती .ज़िन्दगी गरिमा .सफ़ेद रंग और दक्षिण दिशा का संकेत मिलता है ..

३० इंच की दूरी से .आवाज़ .ध्वनि .चाँद .पानी हरा रंग और पश्चिम दिशा का संकेत मिलता है

और ४० इंच की दूरी से जिन शक्तियों का संकेत मिलता है .वह मौत की .नींद की .झूठ की ,काले रंग की और उत्तर दिशा की शक्तियां  है|
यही लेथ ब्रेज थे जिन्होंने उन पत्थरों का मुआइना किया जो कभी किसी प्राचीन ज़ंग में इस्तेमाल  हुए थे   और उन्होंने पाया की उन पत्थरों  पर नफरत और लड़ाई   झगडे के आसार इस कदर उन पर अंकित हो चुके थे कि  उनका  पेंडुलम ,वही दर नियत कर रहा था ----जो उसके मौत का किया था ..

हमारे प्रचीन इतिहास में एक नाम मीरदाद का आता है ..वक्त का यह सवाल तब भी बहुत बड़ा होगा कि ज़िन्दगी से थके हुए , हारे हुए कुछ  लोग मीरदाद के पास गए तो मीरदाद ने कहा --हम जिस हवा में साँस लेते हैं ,क्या आप उस हवा को अदालत में तलब कर सकते हैं ? हम लोग इतने उदास क्यूँ हैं ? इसकी गवाही तो उस हवा से लेनी होगी ,जिस हवा में हम साँस लेते हैं और जो हवा हमारे ख्यालों के जहर में भरी हुई है ..

लेथ ब्रेज ने आज साइंस की मदद से हमारे सामने रखा  है कि ..हमारे ही ख्यालों में भरी हुई नफरत ,हमारे ही हाथो हो रहा कत्लोआम  ,और हमारे ही होंठों से निकला हुआ जहर ,उस हवा में मिला हुआ है ,जिस हवा में हम साँस लेते हैं .और वही सब कुछ हमारे घर के आँगन में ,हमारी गलियों में ,और हमारे माहौल की दरो दिवार पर अंकित हो गया है ..
और आज हम महाचेतना के वारिस नहीं ,आज हम चीखों के वारिस है .आज हम जख्मों के वारिस हैं ..आज हम इस सड़कों पर बहते हुए खून के वारिस हैं .....

ज़िन्दगी की असली इबारत क्या थी ?
वह रेशम ख्यालों सी
खुशख़त होती थी
पर लहू की तपती हुई
और सपनों की स्याही से
गीली इबारत को
जिस सोख्ते ने सोख लिया था
वह सोख्ता मैं भी हूँ --आप भी .
धरती और समाज भी
मजहब और सियासत भी ..

यह सिरों पर लटकते हुए दिन
यह छाती में टूटती हुई रातें
और हर पीढी को
विरासत में मिलती हुई
जख्मों की बातें ,
और यह जो जवानियों के बंजर
और रेतीला सहरा है
और इनमें नित्य बहते हुए
लहू के दरिया है
यह ठंडी और उल्टी लकीरें हैं
और सोख्ते जो लकीरों से काले हैं
बस यही --
अब असली इबारत के हवाले हैं
वह असली  इबारत
तो कब की खो चुकी हैं ...

प्रस्तुती .रंजना ( रंजू ) भाटिया

Thursday, June 08, 2017

मैं से मैं तक की यात्रा

मैं से मैं तक की यात्रा अंनत है ,अमृता की poems को आप यहां you tube पर भी सुन सकते हैं

https://m.youtube.com/watch?v=_CY6aEdd12I

अमृता प्रीतम से एक साक्षात्कार में पढ़ा कि ----उनसे किसी ने  पूछा उनकी नज्म मेरा पता के बारे में .... जब उन्होंने मेरा पता जैसी कविता लिखी तो उनके मन की   अवस्था कितनी विशाल रही होगी ..
 आदम को या उसकी संभावना को खोज ले तो यही पूर्ण मैं को खोजने वाली संभावना हो जाती है ....यथा ब्रह्मांडे तथा पिंडे को समझने वाला मनुष्य कहाँ खो गया है ,सारा सम्बन्ध उस से से है ...

आज मैंने अपने घर का पता मिटाया है ..
और हर गली के माथे पर लगा गली का नाम हटाया है ....

इस में हर यात्रा "मैं से शुरू होती है और मैं तक जाती है "..तंत्र के अनुसार यह यात्रा दोहरी होती है ,पहली अहम से अहंकार तक और दूसरी अहंकार से अहम तक ....आपके अहम की और जाने वाली अवस्था के रास्ते में   आज कोई सज्जाद नही ,कोई साहिर नही कोई इमरोज़ नही ...
अमृता प्रीतम से एक साक्षात्कार में पढ़ा कि ----उनसे किसी ने  पूछा उनकी नज्म मेरा पता के बारे में .... जब उन्होंने मेरा पता जैसी कविता लिखी तो उनके मन की   अवस्था कितनी विशाल रही होगी ..
 आदम को या उसकी संभावना को खोज ले तो यही पूर्ण मैं को खोजने वाली संभावना हो जाती है ....यथा ब्रह्मांडे तथा पिंडे को समझने वाला मनुष्य कहाँ खो गया है ,सारा सम्बन्ध उस से से है ...

आज मैंने अपने घर का पता मिटाया है ..
और हर गली के माथे पर लगा गली का नाम हटाया है ....

इस में हर यात्रा मैं से शुरू होती है और मैं तक जाती है ..तंत्र के अनुसार यह यात्रा दोहरी होती है ,पहली अहम से अहंकार तक और दूसरी अहंकार से अहम तक ....आपके अहम की और जाने वाली अवस्था के रास्ते में   आज कोई सज्जाद नही ,कोई साहिर नही कोई इमरोज़ नही ...

अमृता ने कहा कि आपने मेरी नज्म मेरा पता नज्म की एक सतर पढ़ी है -----यह एक शाप है .एक वरदान है ..इस में मैं कहना चाहती हूँ कि  यह सज्जाद की दोस्ती है ,और साहिर इमरोज की मोहब्बत जिसने मेरे शाप को वरदान बना दिया आपके लफ्जों में  अ शिव का प्रतीक है और ह शक्ति का ..जिस में से शिव अपना प्रतिबिम्ब देख कर ख़ुद को पहचानते हैं और मैंने ख़ुद को साहिर और इमरोज़ के इश्क से पहचाना है .वह मेरे ह है मेरी शक्ति के प्रतीक ...

और यह पढ़ कर जाना की अमृता के इश्क उनके मन की अवस्था में लीन हो चुका है .और यही लीनता उनको ऊँचा और ऊँचा उठा देती है ...


Thursday, June 01, 2017

तू पास नहीं और पास भी है

मायूस हूँ तेरे वादे से
कुछ आस नही ,कुछ आस भी है
मैं अपने ख्यालों के सदके
तू पास नही और पास भी है ....

हमने तो खुशी मांगी थी मगर
जो तूने  दिया अच्छा ही किया
जिस गम का तालुक्क हो तुझसे
वह रास नही और रास भी है ....

         साहिर की लिखी यह पंक्तियाँ ..अपने में ही एक जादू सा जगा देती हैं .इश्क का जादू .. इश्क की इबादत .उस खुदा से मिलने जैसा ,जो नही पास हो कर भी साथ ही है ....यहाँ है और नही का मिलन वह मुकाम है .जो दिल को वहां ले जाता है जहाँ सिर्फ़ एहसास हैं और एहसासों की सुंदर मादकता ...जो इश्क करे वही इसको जाने ...जैसे हीर, राँझा -राँझा करती ख़ुद राँझा हो गई ...यह इश्क की दास्तान यूँ ही बीतते लम्हों के साथ साथ बीतती रही |जो इश्क करे वही इसको जाने ...जैसे हीर, राँझा -राँझा करती ख़ुद राँझा हो गई ...यह इश्क की दास्तान यूँ ही बीतते लम्हों के साथ साथ बीतती रही ...कहते हैं जब किसी इंसान को को किसी के लिए पहली मोहब्बत का एहसास होता है तो वह अपनी कलम से इसको अपने निजी अनुभव से महसूस कर लफ्जों में ढाल देता है | उसको इश्क में खुदा नजर आने लगता है |
इस से जुड़ी एक घटना याद रही है कहीं पढ़ी थी मैंने ..कि एक बार जिगर मुरादाबादी के यहाँ एक मुशायरे में एक नए गजल कार अपनी गजल सुनाने लगे .जिगर कुछ देर तो सुनते रहे फ़िर एक दम बोले कि आप अगर इश्क करना नही जानते तो गजल क्यूँ लिखते हैं ? जो एहसास पास ही नहीं उसका अनुभव  न आपकी रूह कर पाएगी न आपकी कलम ..

..एक रिश्ता जो कण कण में रहता है  और पूरी कायनात को अपने वजूद में समेट लेता है .यह एहसास  सिर्फ़ मन में उतरना जानता है ..किसी बहस में पड़ना  नही .....यह सदियों से वक्त के सीने में धड़कता रहा ...कभी मीरा बन कर ,कभी लैला मजनू बन कर ..और कभी शीरी फरहाद बन कर ..
और कभी बाहर निकला भी तो  कविता बन कर या शायरी की जुबान में .....जो चुपके से उन अक्षरों में ढल गई और सीधे एहसासों में उतर गई ..पर होंठों तक अपनी मोजूदगी नही दर्ज करा पायी ..
साहिर ने भी शायद यही मुकाम देखा .कुछ बोला नही गया तो  धीरे से यही कहा कि  मैं अपने ख्यालों के सदके ....

पलकों पर लरजते अश्कों में
तस्वीर झलकती है तेरी
दीदार की प्यासी आँखों में
अब प्यास नही और प्यास भी है ...

यही इश्क का रिश्ता जब सब तरफ़ फ़ैल जाता है तो इस में किसी दुरी का दखल नही होता .किसी भी तर्क का दखल नही होता और न ही किसी तरह के त्याग का ..वह तो लफ्जों के भी पार चला जाता है ....सोलाह कलाएं सम्पूर्ण कही जाती है पर मोहब्बत .इश्क सत्रहवीं कला का नाम है जिस में डूब कर  इंसान ख़ुद को पा जाता है ..जहाँ इंसान की चौथी  कही   जाने वाली अवस्था तक तो शब्द है पर अगली अवस्था पाँचवीं अवस्था है जिसको सिर्फ़ अनुभव से पाया जा सकता है .जहाँ न कोई संकेत है न कोई शब्द ..बस उस में एक अकार होने का नाम ही सच्चा रूहानी इश्क है ..जुलफियां खानम की लिखी पंक्तियाँ इस संदर्भ में कितनी सही उतरती है ..

तेरे होंठो का रंग ,दिल के खून जैसा
और रगों में एक मुहब्बत बह रही
लेकिन उस दर्द  का क्या होगा
जो तूने दिल में छिपा लिया ..
इतना ...
कि  किसी शिकवे का धुंआ नही उठने दिया ..
वो कौन था ?
अच्छा मैं उसका नाम नही पूछती
तेरी जुबान जलने लगेगी .....