Thursday, May 18, 2017

भ्रम की दहलीज

दोस्त ! तुमने ख़त तो लिखा था
पर दुनिया की मार्फत डाला
और दोस्त ! मोहब्बत का ख़त
जो धरती के माप का होता है
जो अम्बर के माप का होता है
वह दुनिया वालों से पकड़ कर
एक कौम जितना क़तर डाला
कौम के नाप का कर डाला
और फिर शहर में चर्चा हुई
वह तेरा ख़त जो मेरे नाम था
लोग कहते हैं
कि मजहब के बदन पर
वह बहुत ढीला लगता
सो ख़त की इबारत को उन्होंने
कई जगह से फाड़ लिया था ....

और आगे तू जानता
कि वे कैसे माथे
जिनकी समझ के नाप
हर अक्षर ही खुला आता
सो उन्होंने अपने माथे
अक्षरों पर पटके
और हर अक्षर को उधेड़ डाला था ....

और मुझे जो ख़त नहीं मिला
वह जिसकी मार्फ़त आया
वह दुनिया दुखी है --कि मैं
उस ख़त के जवाब जैसी हूँ ....

अमृता की यह नज्म सच में उस ख़त के जैसी है जो न जाने कैसी मोहब्बत की भूख ले कर दुनिया में आता है .एक ऐसा शख्स जिसने अपनी कल्पना की पहचान तो कर ली .एक परछाई की तरह ,लेकिन रास्ता चलते चलते उसने वह परछाई देखी नहीं कभी ....उसने वह पगडंडियाँ खोज ली हैं जिन पर सहज चला जा सकता है लेकिन उस राह को खोज लेना उसके बस में नहीं है जो कल्पित मोहब्बत की राह हो ...एक अजीब सा खालीपन हो जाता है .बाहर भीड़ है दुनिया कि पर अन्दर मन खाली वह न इस भीड़ में खो सकता है .और न ही उसके खालीपन को कोई भर सकता है ..वह एक दहलीज पर खड़े हुए इंसान जैसा हो जाता है जहाँ न अन्दर आया जा सकता है और न ही उससे बाहर जाया जा सकता है ...

अमृता की वर्जित बाग़ की गाथा में एक चरित्र है सुरेंदर ...बहुत रोचक लगा उस शख्स के बारे में पढना ...खुद अमृता ने एक दिन उसको कहा था कि मैं तुम्हारी कहानी लिखना चाहूंगी तुम कोई ऐसी बात सुना दो ,जिसके तारो में तुम्हारी सारी ज़िन्दगी लिपट गयी हो ...

सुरेंदर अमृता जी के मुहं से यह सुन कर कुछ देर खामोश हो गया .फिर कहने लगा ...कि एक कहानी सुनाता हूँ दीदी आपको .....एक आदमी मोटर साईकल पर कहीं जा रहा था .रास्ते में वह किसी आदमी से टकरा गया उस दूसरे बन्दे को कोई जख्म नहीं आया पर थोडी सी खरोंच लग गयी ...उसने उठ कर उस मोटर साईकल वाले को पकड़ लिया और पीटने लगा ..जब मारते मारते थक गया तो जहाँ वह मोटर साईकल वाला खडा था वहां एक लाइन उसके चारों तरफ खींच दी ..और कहा इस से बाहर मत आना ..बस वहीँ खड़े रहना ...
और वह दूसरी तरफ इंट कर उसकी मोटर साईकल को तोड़ने लगा ..पहले उसकी लाईट तोडी फिर शीशा लकीर में खडा आदमी कुछ हँसा ..मोटर साईकल तोड़ने वाले ने एक नजर उसको देखा फिर उसकी मोटर साईकल का पैडल तोड़ दिया ..लकीर में खडा आदमी फ़िर हंसा उसने अब उसकी मोटर साईकल का हेंडल तोड़ दिया
वह मोटर साईकल तोड़ने वाला बन्दा हैरान कि यह हँस क्यों रहा है ..वह जितना हँसता वह और जोर से उसकी मोटर साईकल तोड़ने लगता ...आखिर उस से रहा नहीं गया ..उसने उस से पूछा कि मैं तो तेरा नुकसान कर रहा हूँ तू हँस क्यों रहा है ? देख मैंने तेरी मोटर साईकल का क्या हाल कर दिया है ?
वह लकीर में खडा हुआ आदमी कहने लगा कि मैं इस बात पर हँस रहा हूँ कि जब तू मोटर साईकल तोड़ने में ध्यान देता था तो मैं आहिस्ता से अपना पैर लकीर के बाहर निकल लेता था ..
सुरेंदर अमृता से यह कहानी सुना कर बोला कि वह लकीर में खडा हुआ आदमी मैं हूँ ..जो ज़िन्दगी के कीमती बरस टूटते हुए देख रहा हूँ ...बस इसको टूटते हुए देखते रहता हूँ ,,कभी कभी हँस भी लेता हूँ ...जब तोड़ने फोड़ने वाले की नजर उस तरफ होती है तो अपना पैर लकीर से बाहर कर लेता हूँ ...
अब तुम मुझ पर क्या कहानी लिखोगी ....अमृता ने सुन कर कहा ..अब कुछ न कहो ..आगे कहने को कुछ नहीं रहा ...हम सब इसी तरह की दहलीज पर खड़े हैं ..जो खुद को भरम भुलावे में उलझाए रखते हैं ......और ज़िन्दगी को जीते रहते हैं ...कभी हँसते हुए .कभी ....बस यूँ ही ....

Friday, May 12, 2017

नींद ,सपने और ख्वाब


नींद भी अजब होती है ..ज़िन्दगी और सपनो सी यह भी आँख मिचोली खेलती रहती है ..इसी नींद के कुछ रंग यूँ उतरे हैं इस कलम से ...


नहीं खरीद पाती
बीतती रातों से
अब कोई ख्वाब
यह आँखे
उफ़ !!!
यह
नींद भी
अब कितनी
महंगी है .........

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क्यों आज कल
हर पल रहती है
मेरी आँखे
नींद से बोझिल
क्या कोई ख्वाब
मेरी आँखों में भी
समां गया ?
*******************
कह गये थे
तुम ख्वाबो को
 चुपके से चले आना
आँखो में
पर
  निगोड़ी नींद भी
 तेरे जाते ही यह 
मुझसे बेवफ़ा हो गई   
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आ जाएगी नींद  तो
सो जायेंगे
तेरी बाहों के घेरे में
हम सकून से
पर ..
तुझे भी तो
कभी इस तरह
शिद्दत से
मेरी  याद आये
***************************
कम्पोज़ की गोली
वह बिचोलिया है
जो अक्सर
मेरी नींद
और मेरे सपनो का मेल
करवा ही देती है .... 

Sunday, May 07, 2017

इश्क़ की इंतहा


आज की बात अमृता के अपने लफ्जों में ..क्यूंकि मैं इसको पढ़ कर कितनी देर तक खामोश बैठी    रह जाती हूँ ..कुछ कहने को बोलने को दिल नही चाहता है बस यही ख्याल कि रब्बा यह "इश्क की वो इन्तहा है "जो खुदा से मिला देती है ..

कोरा कागज .

पच्चीस और छब्बीस अक्तूबर की रात २ बजे जब फ़ोन आया की सहिर नही रहे तो पूरे बीस दिन पहले की वह रात उस रात में मिल गई जब मैं बल्गारिया में थी ,डाक्टर ने कहा था कि दिल की तरफ़ मुझे खतरा है ,और उस रात मैएँ नज्म लिखी थी अज्ज आपणे दिल दरिया दे विच्च मैं आपणे फुल्ल प्रवाहे...."" अचानक मैं अपने हाथो की तरफ़ देखने लगी कि इन हाथों से मैंने अपन दिल के दरिया में अपनी हड्डियाँ प्रवाहित की थी .पर हड्डियां बदल कैसे गई ? यह भुलावा मौत को लग गया की हाथो को ?  
साथ ही वह समय सामने आ गया ,जब दिल्ली में पहली एशियन राइटर्स कांफ्रेंस हुई थी ,शायरों -आदबों को उनके नाम के बैज मिले थे .जो सबने अपने कोटों में लगाए थे ,और सहिर ने अपने कोट पर से अपना नामा का बैज उतार कर मेरे कोट पर लगा दिया था  और मेरे कोट से मेरे नाम का बैज उतार कर अपन कोट पर लगा लिया था उस समय किसी की नज़र पड़ी ,उसने कहा था की हमने बैज ग़लत लगा रखे हैं .तो साहिर हंस पड़ा था की बैज देने वाले से गलती हो गई होगी ,पर इस गलती को हमें न दुरुस्त करना न हमने किया ....अब बरसों बाद जब रात को दो बजे ख़बर सुनी कि साहिर नही रहे तो लगा जैसे मौत ने अपना फ़ैसला उसी बैज को पढ़ कर किया है ,जो मेरे नाम का था ,पर साहिर के कोट पर लगा हुआ था ...."'

मेरी और साहिर की दोस्ती में कभी भी लफ्ज़ हायल नही हुए थे यह खामोशी का हसीं रिश्ता था मआइने जो नज्में लिखी तो उस मजमुए को जब अवार्ड मिला तो प्रेस रिपोटर ने मेरी तस्वीर लेते हुए चाहा की मैं कुछ कागज़ पर लिख रही हूँ वैसे तस्वीर ले वह .तस्वीर ले कर जब वह प्रेस वाले चले गए तो मैंने उस कागज को देखा की मैंने उस पर बार बार एक ही लफ्ज़ लिखा था साहिर साहिर साहिर इस दीवानगी के आलम के बाद घबराहट हुई कि सवेरे जब यह तस्वीर अखबार में छपेगी तो तस्वीर वाले कागज पर यह नाम पढ़ा जायेगा तो न जाने कैसी कयामत आ जायेगी .? पर कयामत नही आई तस्वीर छापी पर वह कागज कोरा ही नजर आया वहां

यह और बात है कि बाद में यह हसरत आई दिल में कि ओ   खुदाया! जो कागज कोरा दिखायी दे रहा था वह कोरा नही था 
कोरे कागज कि आबरू आज भी उसी तरह है .रसीदी टिकट में मेरे इश्क कि दसात्न दर्ज़ है साहिर ने पढ़ी थी पर उसके बाद किसी मुलाक़ात में न रसीदी टिकट का जिक्र मेरी जुबान पर आया न साहिर कि जुबान पर

याद है एक  मुशायरे में साहिर से लोग आटोग्राफ ले रहे थे लोग चले गए मैं अकेली उसके पास रह गई तो मैंने हंस कर उसके आगे अपनी हथेली कर दी थी कोरे कागज की तरह और उसने मेरी हथेली पर अपना नाम लिख कर कहा था यह कोरे चेक पर मेरे दस्तखत है जो रकम चाहे भर  लेना   और  जब चाहे काश करवा लेना वह कागज चाहे मांस कि हथेली  थी पर उसने कोरे कागज का नसीब पाया था इस लिए कोई भी हर्फ उस पर नही लिखे जा सकते थे ...

हर्फ आज भी मेरे पास कोई नही हैं रसीदी टिकट में जो भी कुछ भी है और आज यह सतरें  भी कोरे कागज की दास्तान है ...

इस दास्तान की इब्तदा भी खामोश थी और सारो उम्र उसकी इन्तहा भी खमोश रही आज से चालीस बरस पहले लाहौर में जब साहिर मुझसे मिलने आता था बस आ कर चुपचाप सिगरेट पीता मेरा और उसके सिगरेट का धुंआ सिर्फ़ हवा में मिलता था ,साँस भी हवा में मिलते रहे और नज्मों के लफ्ज़ भी हवा में ...

सोच रही हूँ हवा कोई भी फासला तय कर सकती है वह आगे भी शहरों का फासला तय किया करती थी,अब इस दुनिया  और उस दुनिया का फासला भी जरुर तय कर लेगी .....

२ नवम्बर १९८० 
--
प्यार के एक पल ने जन्नत को दिखा दिया
प्यार के उसी पल ने मुझे ता -उमर रुला दिया
एक नूर की बूँद की तरह पिया हमने उस पल को
एक उसी पल ने हमे खुदा के क़रीब ला दिया !!
..........रंजू ..........

Thursday, April 27, 2017

इश्क की दरगाह भी तू ... यह सारी कायनात तू ..

नागमणि में कभी कभी कुछ लेखकों की आपस में बातचीत छपती थी इस कॉलम का नाम "गुफ्तगू "था ...कई बार अमृता भी इस बात चीत में शरीक होती थी आज उसी कॉलम के कुछ हिस्से यहाँ पढ़िए ...
हम सभी हुए न हुए जन्म की पीड़ा झेल कर भी मरते हैं ,और अजन्मा होने की हसरत ले कर भी ..लगता है यह स्वाति नक्षत्र का नहीं अस्वाती नक्षत्र का  युग है और हम सब सीपियों में पड़ी हुई स्वाति कि बुँदे नहीं अस्वाती कि बुँदे हैं .मोती बनने की सीमा तक पहुँच कर भी अमोती है और इस लिए हम मौत को सदा एक साँस की दूरी पर भोगते हैं ...
नागमणि ,अगस्त १९६८

शिव कुमार : तुम्हे कौन सी आँखे पसंद है ?
अमृता : मैंने काजानजाकिस को देखा नहीं ,पर जैसी उसकी अनकहे थी ...
शिवकुमार :उसकी आँखों का रंग क्या था ?
अमृता : वह रंग ,जिस से उसे अपने ग्रीक लोगों की गुलामी की पीड़ा दिखाई देती थी
नागमणि अक्तूबर १९६९ 


दिलीप टिवाना: अमृता जी ! आ मुझे इस बात का जवाब दीजिये कि आप लिखती क्यों हैं ?
अमृता :इस बात का जवाब मैं पहले भी दे चुकी हूँ कि यह हमारी कृतियाँ अपने से आगे तक पहुँचाने का हमारा संघर्ष होता है ?
दिलीप :फिर इस में लोगों तक पहुंचाना क्यों जरुरी है ?
अमृता :असली अर्थों में लेखक कभी लोगों तक नहीं पहुँचता ,लोग लेखक तक पहुँचते हैं
दिलीप :चेखव के बारे में कहा जाता है कि उसने लोगों को उनका आपा खोज कर दिया आप इस की व्याख्या  कैसे करती है ?
अमृता :जो बात मैंने अभी कही ,वह उसी का अलग शब्दों में समर्थन है कि चेखव ने अपना आपा खोजा .जिसके कारण लोगों ने अपने आप को पाया 
नागमणि अप्रैल १९७७

आपकी दो पंक्तियाँ हैं
पैर तेरे सुच्चे और होंठ मेरे झूठे आज छुएंगे
पैर तेरे झूठे या होंठ मेरे सुच्चे आज होंगे
यह किस उम्र अवस्था की बात है ...?

अमृता :  इन पंक्तियों की शिद्दत इनको हासिल है ,बाकी सच्चा और झूठे जैसे लफ्ज़ सामाजिक संस्कारों के दिए हुए हैं .अनजान उम्र में स्लेट पर लिखे उल्ट पुलट अक्षरों जैसे और उस अनजान उम्र में इस तरह की  शिद्दत से व्यक्ति मनफ़ी( माइनस )होता है

इमरोज़ को आपने कैसे पहचाना ?पति की तरह ?प्रेमी की तरह ?या दोस्त की तरह ?
अमृता :इमरोज़ को देख कर ही मैंने लिखा था
बाप ,भाई .दोस्त और खावंद
किसी लफ्ज़ से कोई रिश्ता नहीं
वैसे जब मैंने तुम्हे देखा
सारे अक्षर गहरे हो गए ..
खुदा की मुलाक़ात ने दुनिया का दिया हुआ किसी रिश्ते का लफ्ज़ लागू नहीं होता और न कोई लफ्ज़ उस मुलाक़ात से बाहर खड़ा रह जाता है ...उसी तरह से ...
जैसे योग की एक राह भी तू
इश्क की दरगाह भी तू ...
यह सारी कायनात तू ..
खुदा की मुलाक़ात तू ..वाह सजन ..वाह  सजन

अमृता की यह पंक्तियाँ इश्क़ की रूहानी बात कहती है 

यादो का ताजमहल

तेरी कुछ यादे हैं
ख़ुश्बू है और कुछ ख़ाली ख़त है
पास मेरे
जिन्हे मैं आज भी
 अपनी तन्हाई में पढ़ लिया करती हूँ

सज़ा है इस दिल में
कोई तेरी ही यादो का ताजमहल
आज भी उसके साए को याद करके तुझे नज़र भर के प्यार कर लेती हूँ !!

Tuesday, April 25, 2017

उम्र के खत(अमृता प्रीतम)

अमृता प्रीतम के इन खतों को जब जब पढ़ा है लिखा है इन शब्दों ने उन दिलों को छुआ है जो जानते हैं कि असल में प्रेम के अर्थ क्या है ।हर बार इन खतों को पढ़ती हूँ और नए अर्थ पाती हूँ फिर आप सब के साथ सांझा कर देती हूँ । हर पढने वाले को यह लिखे लफ्ज़ अपने दिल की आवाज़ लगते हैं और मेरे लिखने का उत्साह बढ़ जाता है ।शुक्रिया आप सभी दोस्तों का इस सफर का हमसफ़र बनने के लिए ।आज उनका लिखा एक और यादगार ख़त चंद लफ़्ज़ों में @रंजू भाटिया
जीती!
यह मेरी ज़िन्दगी की सड़क कैसी है,जिसके सारे मील के पत्थर हादसों  के बने हुए हैं ।तुम थे तो घर नहीं था ।आज घर है तो तुम नहीं हो  थोड़े से मीलो की दूरी होती है ,पर एक कानून की छोटी सी मोहर उसे दूसरी दुनिया की दूरी बना देती है ।मैं अजीब तरह से परेशान हूँ और ऐसा लग रहा है जैसे यह बेचनी मेरी उम्र जितनी लम्बी है ,या मेरी उम्र का नाम ही बैचनी है ।
29 .3.62
आशी