Tuesday, October 25, 2016

ज़िन्दगी जीने का नाम है

आज कल सुबह जब भी अखबार उठाओ तो एक ख़बर जैसे अखबार की जरुरत बन गई है कि फलानी जगह पर इस बन्दे या बंदी ने आत्महत्या कर ली ..क्यों है आखिर जिंदगी में इतना तनाव या अब जान देना बहुत सरल हो गया है ..पेपर में अच्छे नंबर नही आए तो दे दी जान ...प्रेमिका नही मिली तो दे दी जान ...अब तो लगता है जिस तरह से महंगाई बढ़ रही है लोग इसी तनाव में आ कर इस रेशो को और न बड़ा दे ...कल एक किताब में एक कहानी पढी इसी विषय पर लगा आप सब के साथ इसको शेयर करूँ ..एक नाम कोई भी ले लेते हैं ...राम या श्याम क्यूंकि समस्या नाम देख कर नही आती ..और होंसला भी नाम देख कर अपनी हिम्मत नही खोता है .खैर ...राम की पत्नी की अचानक मृत्यु हो गई और पीछे छोड़ गई वह बिखरी हुई ज़िंदगी और दो नन्ही मासूम बच्चियां ..सँभालने वाला कोई था नही नौकरी पर जाना जरुरी .और पीछे से कौन बच्चियों को संभाले ..वेतन इतना कम कि आया नही रखी जा सकती . और आया रख भी ली कौन सी विश्वास वाली होगी ..रिश्तेदार में दूर दूर तक कोई ऐसा नही था जो यह सब संभाल पाता..क्या करू .इसी सोच में एक दिन सोचा कि इस तरह तनाव में नही जीया जायेगा ज़िंदगी को ही छुट्टी देते हैं ..बाज़ार से ले आया चूहा मार दवा ..और साथ में सल्फास की गोलियां भी ...अपने साथ साथ उस मासूम की ज़िंदगी का भी अंत करके की सोची ..परन्तु मरने से पहले सोचा कि आज का दिन चलो भरपूर जीया जाए सो अच्छे से ख़ुद भी नहा धो कर तैयार हुए और बच्चियों को भी किया ...सोचा की पहले एक अच्छी सी पिक्चर देखेंगे फ़िर अच्छे से होटल में खाना खा कर साथ में इन गोलियों के साथ ज़िंदगी का अंत भी कर देंगे ...

सड़क क्रॉस कर ही रहे थे एक भिखारी देखा जो कोढी था हाथ पैर गलते हुए फ़िर भी भीख मांग रहा था .इसकी ज़िंदगी कितनी नरक वाली है फ़िर भी जीए जा रहा है ऑर जीने की किस उम्मीद पर यह भीख मांग रहा है .? कौन सा इसका सपना है जो इसको जीने पर मजबूर कर रहा है ? क्या है इसके पास आखिर ? फ़िर उसने अपने बारे में सोचा कि मूर्ख इंसान क्या नही है तेरे पास ..अच्छा स्वस्थ ,दो सुंदर बच्चे घर ..कमाई ...आगे बढे तो आसमान को छू ले लेकिन सिर्फ़ इसी लिए घबरा गया कि एक साथ तीन भूमिका निभा नही पा रहा है वह पिता .,अध्यापक ,ऑर माँ की भूमिका .निभाने से वह इतना तंग आ गया है कि आज वह अपने साथ इन दो मासूम जानों का भी अंत करने लगा है ..यही सोचते सोचते वह सिनेमाहाल में आ गया पिक्चर देखी उसने वहाँ ""वक्त ""'..और जैसे जैसे वह पिक्चर देखता गया उसके अन्दर का कायर इंसान मरता गया ..और जब वह सिनेमा देख के बाहर आया तो जिजीविषा से भरपूर एक साहसी मानव था जो अब ज़िंदगी के हर हालत का सामना कर सकता था ..उसने सोचा कि क्या यह पिक्चर मुझे कोई संदेश देने के लिए ख़ुद तक खींच लायी थी ..और वह कोढी क्या मेरा जीवन बचाने के लिए कोई संकेत और संदेश देने आया था ..उसने वह गोलियाँ नाली में बहा दी .और जीवन के हर उतार चढाव से लड़ने को तैयार हो गया
..जिंदगी जीने का नाम है मुश्किल न आए तो वह ज़िंदगी आखिर वह ज़िंदगी ही क्या है ..जीए भरपूर हर लम्हा जीए ..और तनाव को ख़ुद पर इस कदर हावी न होने दे कि वह आपकी सब जीने की उर्जा बहा के ले जाए ...क्यूंकि सही कहा है इस गीत में कि आगे भी जाने न तू पीछे भी न जाने तू ,जो भी बस यही एक पल है ..जीवन अनमोल है . इसको यूं न खत्म करे ..

Friday, October 21, 2016

भम भम भोले की जय



भम भोले के इस स्वर्गलोक को देखने की इच्छा किस के दिल में जागृत नही होती है पर यह इतना आसान नही है बहुत ही मुश्किल यात्रा है यह हिमालय पार जाना कोई आसान बात भी तो नही है मैं तो वहाँ जाने वाले यात्रियों के अनुभव पढ़ती जाती हूँ और जो निश्चय दिल में जागता है कि एक बार तो यहाँ जरुर जाना है उस रास्ते की मुश्किलें देख कर जैसे सब एक पल में दिल डगमगा जाता है यह यात्रा तिब्बत में कैलाश पर्वत और मानसरोवर झील की परिक्रमा करने से पूरी होती है ..यह यात्रा बहुत ही मुश्किल मानी जाती है इस में १९ हज़ार ५०० फुट की ऊंचाई तक की यात्रा करनी पड़ती है पहले लिखी किताबों और लेखो में जो पढने में आया है कि यहाँ तिब्बती डाकू का बहुत डर हुआ करता था पर इसके साथ ही जब इसके भौतिक गुणों को पढ़ा तो इसके बारे में पढ़ें तो उत्सुकता और बढती गई.... तिब्बत में चीनी घुसपेठियों के बाद १९४८ में यह स्थान भारतीय यात्रियों के लिए और व्यापारियों के लिये बंद कर दिया गया था बाद में १९ ८१ में इसको फ़िर से चीन की सरकार ने यह खोल दिया ..यह वह स्थान है जो हर हिंदू व एशिया में रहने वाले के दिल में धड़कता है कुदरत में अपना विश्वास मनुष्य ने बहुत पहले ही तलाश करना शुरू कर दिया था और इस परिकर्मा में तो छिपी है जीवन से मुक्ति की भावना और आज का मनुष्य भी इस से मुक्त नही हो पाया है

कई तरह कीजांच पड़ताल आवेदन शरीर की स्वस्थता और फ़िर उसके बाद चयन करने कि मुश्किल पार करने के बाद कई हजारों में से कुछ को जाने कि अनुमति मिलती है वहाँ या यह कहो जिस पर भोले बाबा की कृपा रहे वही इस यात्रा को सम्पूर्ण कर पाता है ...इस यात्रा को महज एक धार्मिक यात्रा समझाना कहना कम होगा क्यूंकि यह तो यात्रा है समाज संस्कृति वहाँ की प्राकतिक परिस्थति और आज के तिब्बत को जानने की और हिमालय के उस पर जहाँ भोले बाबा का निवास है उसको देखने की .....मानसरोवर झील में बिखरे वहाँ के कुदरती नज़ारों को निहारने की ...यहाँ पर खड़े शुभ्र शिखरों से मिलना तिब्बत के बौद्धिक मठो को देखना याक और कई तरह घुमंतू पशुचारकों से मिलना और कई जगह से आए तीर्थ यात्रीओं के साथ समय बिताना सच में एक नया अनुभव होगा जो शायद कभी नही भूल सकता है ..यह यात्रा अल्मोड़ा से धारचूला.तवा घाट ,मांगती ,गाला ,बुदधी ,गुंजी ,कालापानी और नवीधांग से लिपू दर्रा होते हुए चीन की सीमा में प्रवेश करती है चीन के इलाके में चीनी सुरक्षा के घेरे में यात्री आगे बढ़ते हैं ...कैलाश पर्वत की परिकर्मा करने के लिए यात्रियों को ५५ किलोमीटर चलना पड़ता है
पढ़ के लिख के जाने की इच्छा बलवती हो उठती है .पर जायेगा तो वही न जिसका बुलावा आएगा .और यह राजनितिक समस्याए खत्म होंगी .मानसरोवर झील को देखने का सपना हर भारतीय के दिल में रहता है भम भम भोले का दर्शन पाना इतना सरल भी तो नही .भम भम भोले की जय ..:)

Thursday, October 20, 2016

कितना संक्षिप्त है प्यार और भूलने का अरसा कितना लंबा

पाब्लो नेरूदा एक कैदी की खुली दुनिया

पाब्लो नेरुदा जब 1971 में नोबेल पुरस्कार लेने के लिए पेरिस स्टाक होम पहुँचे थे, उसी समय हवाई अड्डे पर ढेर सारे पत्रकारों में से किसी ने उनसे पूछा : सबसे सुन्दर शब्द क्या है ?’ इस पर नेरुदा ने कहा ‘‘मैं इसका जवाब रेडियो के गाने की तरह काफी फूहड़ ढंग से एक ऐसे शब्द के जरिये देने जा रहा हूँ जो बहुत घिसा-पिटा शब्द है : वह शब्द है प्रेम। आप इसका जितना ज्यादा इस्तेमाल करते हैं, यह उतना ही ज्यादा मजबूत होता जाता है। और इस शब्द का दुरुपयोग करने में भी कोई नुकसान नहीं होता है।’’

नेरुदा की ही एक पंक्ति है : ‘‘कितना संक्षिप्त है प्यार और भूलने  का अरसा कितना लम्बा।’’
सिर्फ 23 वर्ष की उम्र में ही अपने संकलन ‘प्रेम की बीस कविताएँ और निशाद का एक गीत’ से विश्व प्रसिद्ध हो चुके प्रेम के कवि नेरुदा एक निष्ठावान कम्युनिस्ट थे। वे एक कवि और कम्युनिस्ट के अलावा एक राजदूत दुनिया भर में शरण के लिए भटकते राजनीतिक शरणार्थी चिले के पार्लियामेण्ट में सिनेटर और राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार भी थे। वे आम लोगों और सारी दुनिया के साहित्य प्रेमियों के प्रिय रहे, तो समान रूप से हमेशा विवादों में भी घिरे रहे। उनकी कविता की तरह ही उनका समूचा जीवन कम आकर्षक नहीं रहा है।

यह पुस्तक प्रेम की कम्युनिस्ट कवि के सम्मोहक जीवन के बिना किसी अतिरंजना के एक प्रामाणिक तस्वीर पेश करती है। इसे पाब्लो नेरुदा पर हिन्दी में अपने ढंग की एक अकेली किताब कहा जा सकता है।
सीधी-सी बात

शक्ति होती है मौन ( पेड़ कहते हैं मुझसे )
और गहराई भी ( कहती हैं जड़ें )
और पवित्रता भी ( कहता है अन्न )

पेड़ ने कभी नहीं कहा :
'मैं सबसे ऊँचा हूँ !'

जड़ ने कभी नहीं कहा :
'मैं बेहद गहराई से आयी हूँ !'

और रोटी कभी नहीं बोली :
'दुनिया में क्या है मुझसे अच्छा !'

पाब्लो नेरूदा एक कैदी की खुली दुनिया
अरुण माहेश्वरी
राधाकृष्ण प्रकाशन
मूल्य--१५० रूपये 

Wednesday, October 19, 2016

किस्से प्यार के

प्यार में बस नाम और जगह बदल जाती है
सबके हिस्से वही आँसू वही तन्हाई ही आती है

जब चढ़ता है" इश्क़ का जनून "किसी के सिर पर
तो फिर दुनिया उसको रंगीन नज़र आती है

पा जाते है सिर्फ़ चंद लोग जब अपनी मंज़िल
तो राहे वफ़ा की रोनक कुछ और बढ़ जाती है

मत सुना करो तुम "इश्क़ के किस्से" यूँ ही
सुना है इनको सुनने से "रातो की नींद "उड़ जाती है !!



रन्जू

Tuesday, October 18, 2016

क्या आप जानते हैं संख्या 18 के बारे में ?

अठारह की महिमा

भारतीय मनीषा से अठारह का संबंध बहुत आश्चर्यजनक है .. ..आईये आपको बतातें हैं कैसे ..हमारे पुराण अठारह है ,गीता के अध्याय भी अठारह......देवी भागवत और वामन पुराण आदि ग्रंथों में एक प्रसिद्ध श्लोक में बड़े ही सुंदर ढंग से सूत्रबद्ध शैली में पुराणों के नाम व संख्या का वर्णन है ..इस से भारतीय मनीषा की अध्यात्मिक व दार्शनिक मेघा की अभिव्यक्ति होती है | शतपथ ब्राह्मण में सृष्टि नमक अठारह इष्टिकाओं का प्रावधान है | ऋग्वेद में गायत्री और विराट छन्द की बहुलता है .गायत्री के आठ व विराट के दस अक्षर मिला कर अठारह की संख्या बनाते हैं ..

इसी तरह बारह मॉस ,पाँच ऋतुएँ व एक सवंत्सर मिल कर अठारह भेदों को प्रकट करतें है ..सांख्य दर्शन में दस इन्द्रियाँ ( पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ ,पाँच कामेंद्रियाँ ) ,पाँच महाभूत ,(पृथ्वी ,जल वायु ,अग्नि व् आकाश ) मन प्रकृति ,पुरूष मिल कर अठारह तत्वों को अभिव्यक्त करते हैं .श्रीमद भागवद के श्लोकों की संख्या अठारह हजार है और महाभारत के पर्वों की संख्या भी अठारह है ..
ब्रह्मांड के सब पदार्थ स्थान की दृष्टि से तीन लोकों पृथ्वी अन्तरिक्ष और पातळ से जुडें हैं और प्रत्येक पदार्थ की सत्ता ,उत्पति ,वृद्धि , पूर्णता ,हास तथा विनाश की छ अवस्थाएं हैं .....इन छ अवस्थाओं को तीन लोकों से नित्य संबंद्धता के कारण सृष्टि अठारह अवस्थाओं से आबद्ध है ...

 कुरुक्षेत्र का युद्ध 18 सेनाओं के बीच ही लड़ा गया था.. रोम की प्राचीन परंपरा में 18 के अंक को खून के रिश्ते का द्योतक माना जाता है.. चीनी संस्कृति में अंक 18 को समृद्धि का प्रतीक माना जाता है और यही वजह है कि वहां किसी इमारत की 18वीं मंजिल के भाव काफी ऊंचे होते हैं.. यहूदी भाषा में जिंदगी के समानार्थी शब्द का अंक 18 है, इसीलिए वहां दान-पुण्य 18 के गुणकों में किया जाता है।

है न यह हैरानी वाली बात ...मजेदार आंकड़े ..अठारह का होने पर ही माना जाता है समझदार ...:) और तारीख भी है आज अठारह .....:)शुभ दिन ........
रंजू .....