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Thursday, April 24, 2008

उलझन ....

ईश्वर ने जब रचा यह संसार
तब शायद बनाया
ज़मीन को एक किताब
चाँद सितारों की जिल्द
से उसको सजा कर
फूलों और नज़ारों
से कुछ पन्ने लिख डाले
वही उस किताब में ही
लिखे कुछ बेकारी और
जुल्म के किस्से
और ....
कई अनचाहे दर्द भर डाले
अब यह उस किताब में लिखी
कोई सच्ची कहानी है
या खुदा की लिखावट
से छूटी हुई कुछ गलतियां ??

Wednesday, April 23, 2008

ज़िंदगी जीने का नाम है ...

जीने की जिजीविषा ..मुश्किलों से लड़ने की हिम्मत हो तो कोई काम मुश्किल नही होता है और मेरा मनाना है कि यदि ज़िंदगी आसान हो तो जीने का मज़ा ही क्या ? कुछ मुश्किल आएगी तो ही हमे जीने की प्रेरणा मिलेगी ..यही मुश्किलें हमे रास्ता दिखाती है आगे बढ़ने का .अब कोई इसको हंस के निभा लेता है कोई रो के ..और वक्त अपनी चाल चलता रहता है ...सबका अपना अपना तरीका है इस से निपटने का :) ....मेरे सामने जब कोई मुश्किल आती है तो मैं पहले एक बार तो परेशान जरुर हो जाती हूँ ..इंसान हूँ आखिर कोई एलियन तो नही.....फ़िर सोचती हूँ कि बेटा रंजू इसको सोच समझ के हंस के ही हल करना पड़ेगा नही तो सामने वाला आपको और कमजोर करेगा ...अपने आस पास देखे तो अपने से ज्यादा दुःख नज़र आते हैं ..मैं अपनी इसी श्रृंखला में आपको एक घटना बताती हूँ जो मैंने अभी हाल में ही एक न्यूज़ में पढी ...घटना आकलैंड की है लोग एक ताल के सामने हैरान से खड़े थे , बात ही कुछ ऐसी थी क्यूंकि सामने जो तैर रही थी वह जलपरी थी ..सब लोग हैरान परेशान से आँखे फाड़े उसको देख रहे थे ..दरअसल वह कोई जलपरी नही थी वहाँ की रहने वाली एक लड़की थी नाम था उसका नादिया .....अपने जीवन के पचास वर्ष पूरे कर चुकी नादिया को बचपन से ही तैरने का शौक रहा है लेकिन एक दुर्घटना में वह अपने दोनों पैर खो बैठी ..उन्होंने अपना पहला पैर सात साल की उम्र में ही खो दिया था जबकि दूसरा पैर सोलह वर्ष की उमर में खो दिया वह कुछ ऐसा काम करना चाहती थी जो कुछ चुनौती से भरा हुआ हो इतना कुछ होने पर भी उन्होंने अपनी हिम्मत नही खोयी ..और ही ख़ुद को कमजोर साबित होने दिया उन्होंने अपने बचपन के सपने को पूरा करने का निश्चय किया उन्होंने अपने दिल में ठान लिया की वह तेरेंगी ..बिना पांव के यह होना केवल मुश्किल था बलिक नामुमकिन भी था पर जहाँ चाह वहाँ राह तभी एक संस्था जिसने हालीवुड में फ़िल्म लार्ड आफ थे रिंग्स में स्पेशल इफेक्ट दिए थे वह उनकी सहायता के लिए तैयार हो गई उनके लिए उन्होंने एक जलपरी की संकल्पना तैयार की एक ख़ास तरह की पूंछ तैयार करवाई गई और इसकी सहायता से उन्होंने इस काम को अंजाम दिया नादिया ने तैरते वक्त अपनी खुशी का इजहार किया और कहा की मैं इस वक्त ख़ुद को जलपरी सा महसूस कर रही हूँ मेरे लिए यह अनुभव कभी भूलने वाला है .. ऐसे जीने वाले दिल दूसरो के लिए एक प्रेरणा बन जाते हैं ..और बता देते हैं अपने कामों से कि ज़िंदगी जीने का नाम है ...

रंजू भाटिया

Wednesday, March 19, 2008

प्रेम में स्वतंत्रता

आरकुट में कविता जी ने अमृता प्रीतम के प्रेम के बारे में विचारों को पढ़ा और यह सवाल मुझसे पूछा ..तो मुझे लगा की इस विषय पर कुछ विचार यहाँ लिखूं ..आप सब का भी स्वागत है इस विषय पर अपने विचार जरुर दे ..
--
अभी अभी आपके अमृता प्रीतम वाले पार्ट को पढ़ा ...उसमें एक बात है कि अमृता जी ने कहा है कि वो और इमरोज़ एक दूसरे में लीन नही ..वरना प्यार करने वाला कौन रहेगा ...इस बारे मेरी ऑरकुट पर बहुत लोगों से चर्चा करने की कोशिश की..किसी ने ख़ास इंटेरेस्ट नही लिया आप बताएं..प्रेम में स्वतंत्रता ...इस बारे में आप क्या सोचती हैं ??एक प्रेम मीरा का था ...जहाँ 'तू' ही था मीरा समाप्त हो गयी थी ...कहते हैं ना प्रेम गली आती सांकरी ता में दो ना समाए..??...किंतु स्वतंत्रता की बात करें तो उसकी सीमा क्या होगी...सोचियेगा और बताइयेगा ...फिर मैं बताऊँगी कि मुझे क्या लगता है??


कविता जी सबसे पहले आपने इसको इतने ध्यान से पढ़ा और समझा उसके लिए तहे दिल से शुक्रिया ...बहुत ही अच्छा सवाल है जो आपके जहन में आया है ..प्रेम में स्वतंत्रता ...बहुत जरुरी है क्यूंकि प्रेम बन्धन या बंधने का नाम नही है .प्रेम वही है जो एक दूसरे को समझे उसको वैचारिक आजादी दे ..प्रेम के बारे में इस से पहले मैं इसी ब्लॉग में ढाई आखर प्रेम के लिख चुकी हूँ ..अमृता जी यदि यह कहती है प्रेम में लीन नही इसका मतलब सिर्फ़ इस बात से है कि प्रेम किसी को अपने बन्धन में बांधने की कोशिश नही है ,यह तो एक दूसरे को समझने और जानने और उनके विचारों को भी उतनी ही आजादी देने का नाम है जितनी की अपनी .अमृता ने इमरोज़ को .वैचारिक .आजादी अपनी सोच की आजादी दी और इमरोज़ ने उन्हें ..दोनों ने कभी एक दूसरे के ऊपर ख़ुद को थोपा नही कभी ....शायद तभी .शायद अमृता जी की यही प्रेम की कशिश थी आजादी थी जो मैंने इमरोज़ जी की आंखो में उनके जाने के बाद भी देखी ....

पर आज कल कौन इस बात को समझ पाता है समय ही ऐसा आ गया है कि लोग प्रेम को सिर्फ़ अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करते हैं स्वार्थ वश दोस्ती करेंगे और मतलब के लिए प्यार केवल अपने लिए सोचेंगे और अपना मतलब पूरा होते ही गिरगिट की तरह रंग बदल लेंगे ,,

अब आती है मीरा के प्यार की बात ..प्यार के लिए सबका अपना अपना नजरिया है कोई इस में डूब के पार लगता है तो उस में बह के ...फर्क सिर्फ़ समझने का है ..यहाँ न अमृता के प्यार को कम आँका जा सकता है न मीरा के ..दोनों ने अपने अपने तरीके से प्यार के हल पल को जीया और भरपूर जीया ....

मेरी नज़र में प्यार वही है जो देहिक संबंधों से ऊपर उठ कर हो .प्रेम देह से ऊपर अध्यात्मिक धरातल पर ले जाता है और प्रेम की इस हालत में इंसान कई प्रकार के रूप लिए हुए भी समान धरातल में जीता है ..प्रेम की चरम सीमा वह है जब दो अलग अलग शरीर होते हुए भी सम्प्दनों का एक ही संगीत गूंजने लगता है और फ़िर इसका अंत जरुरी नही की विवाह ही हो ..प्रेम हर हालात में साथ रहता है .मीरा के प्रेम की सिथ्ती अध्यात्मिक थी वह उस परमात्मा का अंश बन गई थी उसी का रूप बन गई थी जहाँ कोई भेद नही ...कोई छुपाव नही ...


यह मेरे अपने विचार है ..प्रेम क्या है इस के बारे में सबके मत अपने अपने हो सकते हैं ..कविता जी मुझे आपके विचारों का इंतज़ार रहेगा ..शुक्रिया

Tuesday, December 04, 2007

ज़िंदगी


ज़िंदगी कभी तू भी मुझे अपनो की तरह मिल
किसी ग़ैर की तरह क्यों सताती है मुझे
रोता है दिल मेरा तेरी बेरूख़ी देख कर
तेरी हर बात आज रुलाती हैं मुझे,

कभी थामा था दामन हमने ख़ुशी का
कभी हमने भी खिलते गुलो को देखा था
कभी मुस्कराया था जीवन मेरा भी
कभी हमने भी प्यार का मौसम देखा था

आज क्यों हर बात लगती है सपना
किसी किस्से सी तू नज़र आती है मुझे
यूँ ना दिखा संगदिली अपनी ऐ ज़िंदगी
कि अब मौत भी ठुकराती है मुझे

ज़िंदगी कभी तू भी मुझे अपनो की तरह मिल
किसी ग़ैर की तरह क्यों सताती है मुझे!!

Thursday, November 29, 2007

किसी की प्रेरणा जीवन को कैसे बदल देती है !!


हम कभी कभी किसी व्यक्ति से या किसी स्थान से बहुत प्रेरित हो जाते हैं और वह हमे जीवन में आगे बढ़ने कुछ करने के लिए उत्साहित करते हैं ..यही आगे बढ़ना किसी से कुछ प्रेरित हो के काम करना प्रेरणा कहलाता है इसका जीवन में बहुत ही मुख्य स्थान है .इस के बिना इंसान आगे नही बढ़ सकता इस के कारण ही कई महान काव्य ,पुस्तकों का और अविष्कारों का जन्म हुआ ,कोई प्रेरणा सामने हो तो व्यक्ति काम दिल लगा के करता है अपनी मंज़िल को पाने की कोशिश करता है और अतं में कामयाब होता है ,प्रेरणा कभी किसी से भी मिल स्काती है ..किसी व्यक्ति में यह जन्म जात होती है काम को करने की लगन कूट कूट के भारी होती है ,कभी हम प्रकति के विभिन्न रूप को देख के प्रेरित हो जाते हैं ,कभी किसी की नफ़रत ही हमे आगे बढने के लिए मजबूर कर देती है कि कुछ कर के दिखाना है यह समय पर है कि, कौन कब किस से प्रभावित हो जाए
-- जन्म से मिली प्रेरणा कई लोगों में होती है, ऐसे लोग बचपन से ही तेज़ बुद्धि के होते हैं यह लोग बचपन से ही सामान्य बच्चो से अलग काम करते हैं जैसे कोई बचपन से ही कविता लिखने लगता है ,कोई गणित में बहुत तेज़ बुद्धि का होता है ,कई बच्चे कई तरह के सवाल पूछते हैं और जब तक उचित जवाब नही पा लेते उस को पूछते रहतें हैं बदल बदल कर, जब तक उनकी ख़ुद की तस्सली नही हो जाती है वो स्कूल ज्ञान से काफ़ी आगे निकल जाते हैं और उस शिक्षा में अक्सर अपने को असहज पाते हैं ..जेम्स वाट का दिल बचपन में पढ़ाई में नही लगता था लेकिन आगे चल कर उन्होने भाप के इंजन का आविष्कार किया! आइन्स्टीन भी अपने अध्यापक से ऐसे ऐसे सवाल पूछते थे कि उनका जवाब देना मुश्किल हो जाता था !एडिसन भी प्रकति के रहस्य को जानने में ज्यादा रुचि रखते थे उनका कहना था कि एक बूँद प्रेरणा और 99 बूँद पसीना तब सफलता मिलती है जब उसको सच कर के भी दिखाया जाए !उनको बचपन से ही प्रकति से प्रेरणा मिली और उन्होने अविष्कार किए !हमारे देश के रविन्द्र नाथ टेगोर भी ऐसे ही थे वो स्कूल कि पढ़ाई में रुचि नही लेते थे पर उन्होने साहित्य में बहुत नाम कमाया और नोबल पुरूस्कार भी मिला .श्रीनिवास रामानुजम भी बचपन से ही गणित में बहुत आगे थे ऐसे लोगो में जन्मजात प्रेरणा होती है !कुन्दन लाल सहगल भी बिना किसी गुरु से ज्ञान लिए बिना इतना अच्छा गाते थे .लता मंगेशकर बचपन से आज तक गा रही है ..यह सभी में एक ईश्वर का दिया गुण है प्रेरणा हैं और जिसके पास ईश्वर की दी हुई प्रेरणा हो उन्हे कोई आगे बढ़ने से कैसे रोक सकता है !!

अब बात करते हैं प्यार से मिली प्रेरणा की जो किसी भी इंसान को किसी भी इंसान से किसी भी उम्र में दी जा सकती है ,कहा भी जाता है की किसी पुरुष की आसाधारण सफलता के पीछे किसी स्त्री का हाथ होता है किसी इंसान का प्यार किसी दूसरे इंसान में टॉनिक का काम करता है ,प्यार में ताक़त है जो बढ़े बढे काम को आसानी से पूरा करवा देती है ..यह प्यार किसी का भी हो सकता है भाई बहन .माता पिता प्रेमी प्रेमिका आदि किसी का भी ..

नफ़रत वाला व्यवहार भी किसी में प्रेरणा शक्ति का संचार कर देता है जैसे तुलसी दास का तिरिस्कार उनकी पत्नी न करती तो राम चरित मानस ना लिखी जाती .सूरदास जी के बारे में कहा जाता है कि वो बचपन से अंधे नही थे वरन किसी स्त्री के प्यार के कारण और उस से मिली नफ़रत के कारण उन्होने अपनी दोनो आँखे फोड़ ली थी जिस से वो केवल अपना ध्यान श्री कृष्णा में लगा सके और उन्होनें इसी से प्रेरित हो के महान काव्य रचना कर डाली !!


रचनात्मक प्रेरणा वो है जो किसी अन्य इंसान के कामों से प्रेरित हो के की जाती है किसी के काम को देख के अपना सोचने समझाने का अंदाज़ ही बदल जाता है और इंसान रचनात्मक काम करने लगता है परन्तु कई बार यह प्रेरणा बुरे काम से भी प्रभावित हो जाती है जैसे फ़िल्मे देख के लोग बुरा काम करने लगते हैं ,अपराधी बेईमान लोगो के काम से आज के अख़बार भरे हुए होते हैं ..सच में मानव के दिमाग़ का क्या भरोसा कब किस और चल पड़े !!

अब यह प्रेरणा का असर दिमाग़ में होता कैसे हैं शायद इंसान के अपने अंदर ही कोई ऐसी शक्ति है जो उसको ऐसा करने के लिए प्रेरित करती है हमारे मस्तिष्क का कोई न कोई भाग इस के लिए जिम्मेवार है जैसे किसी भी इंसान में स्मरण शक्ति के लिए आर एस ए {राईबोन्यूक्लिक एसिड } जिम्मेवार होता है जिस इंसान में इस रसायन की मात्रा जितनी अधिक होती है उसकी स्मरण शक्ति उतनी ज्यादा होती है! इसका मतलब है कि हमारे दिमाग़ में ही कोई ग्रंथि ऐसी है जो इस शक्ति का केन्द्र है जिस में यह ज्यादा है तो वो बचपन से ही सक्रिय होता है और बाक़ी मामलों में किसी बात या घटना से प्रभावित हो के यह आर एन ए रसायन शरीर में रक्त संचार को बढ़ा देता है, जिस से इंसान अपने अन्दर एक विशेष उर्जा महसूस करता है और प्रेरित हो के काम करता है जैसे किसी व्यक्ति को बचपन से साहित्य में रुचि है, किसी को विज्ञान में और किसी को संगीत में .यह अलग अलग से प्रभावित होने वाले यह रसायन भी हर दिमाग़ में अलग अलग होंगे !!
वैसे विज्ञान अभी यह पता लागने में असमर्थ है कि हमारे मस्तिष्क का कौन सा अंग इस के लिए जिम्मेवार है और यह भो हमे सही ढंग से मालूम नही कि कौन सी घटना कौन सी बात हमे किस बात के लिए प्रेरित करेगी! अब यूँ कहें कि हमारे दिमाग़ के रसायन को प्रभावित करेगी अगर यह पता चल जाए तो सारे बुरे सोचने वाले इंसानो को सुधारा जा स्कता है ..यह रसायन हमारे दिमाग़ में हर गतिविधि के जिम्मेवार है किसी रसायन की अधिकता या कमी हो जाती तो कोई विकार पैदा हो जाता है यह बात भी मज़ेदार है की यह रसायन भी अलग अलग होते हैं मस्तिष्क को ईश्वर द्वारा बनाया कंप्यूटर कहना जयदा अच्छा होगा यह सबसे अधिक संवेदन शील संभावना वाला होता है जिसके सोचने और समझने की शक्ति इंसान द्वारा बनाए कंप्यूटर की सीमा से ज्यादा होती है !यह उन काम को भी करता है जीने इंसान द्वारा बनाया कंप्यूटर ना कर सकता जैसे भावुकता ,अपनी मर्ज़ी से कही भी जाने की आज़ादी सपने देखना और किसी से प्रेरित होना . जब हम किसी की भाषण सुनते हैं तो उसकी वेश भूषा से ज्यादा उसके बोलने के तरीक़े से ज्यादा प्रभावित होते हैं उसके मन से अपने संबंध बना लेते हैं वैसे जिनके दिल साफ और निष्कपट होते हैं उनका प्रभाव भी देखने में ज्यादा आता है कोई भी संकेत यह लोग हमारे दिमाग की छटी इन्द्री तक पहुँचा देते हैं वैसे अभी बहुत कुछ खोजा जाना बाक़ी है इस विषय में ,तभी हम इस प्रेरित करने वाली घटना को अच्छे से समझ सकेंगे !!

Wednesday, October 17, 2007

"'ढाई आखर प्रेम के [दूसरी कड़ी ]



प्रेम एकांत है
नाम नही
जब नाम बनता है
एकांत ख़त्म हो जाता है !!


प्रेम विषय पर लिखते लिखते मुझे यहाँ लव गुरु की उपाधि दे गयी है :) बहुत बड़ी उपाधि है यह
और मैं तो अभी प्रेम के ढाई आखर को समझने में लगी हूँ ...वैसे प्रेम ही एक ऐसी चीज़ है जिसको दोनो हाथो से लुटाओ वो उतना ही बढता जाता है ...इसी से जुड़ी अगली कड़ी "'ढाई आखर प्रेम के ''में कुछ और बाते प्रेम पर ....वैसे इस पर जितना लिखा जाए उतना कम है क्यूंकि यह विषय अपनी प्रकति, नाम के अनुसार इतना गहरा है की जितना इस में डूबेंगे उतना ही इसको समझ पाएँगे ....
जब यह हो जाए तो कहाँ देखता है उम्र ,,कहाँ देखता है जगहा ,और कहाँ अपने आस पास की दुनिया को देख पाता है बस डुबो देता है ख़ुद में और पंहुचा देता है उन ऊंचाई पर जहाँ कोई रूप धर लेता है मीरा का तो कही वो बदल जाता है रांझा में .....पर सच्चा प्रेम त्याग चाहता है ,बलिदान चाहता है उस में दर्द नही खुशी का भाव होना चाहिये
हम सभी ईश्वर से प्रेम करते हैं और साथ ही यह भी चाहते हैं की ज्यादा से ज्यादा लोग उस ईश्वर से प्रेम करें पूजा करें वहाँ पर हम ईश्वर पर अपना अधिकार नही जताते !हम सब प्रेमी है और उसका प्यार चाहते हैं परन्तु जब यही प्रेम किसी इंसान के साथ हो जाता है तो बस उस पर अपना पूर्ण अधिकार चाहते हैं और फिर ना सिर्फ़ अधिकार चाहते हैं बल्कि आगे तक बढ जाते हैं और फिर पैदा होती है शंका ..अविश्वास ...और यह दोनो बाते फिर खत्म कर देती हैं प्रेम को ...मीरा को कभी भी श्री कृष्णा और अपने प्यार पर कभी अविश्वास नही हुआ जबकि राधा को होता था अपने उसी प्रेम विश्वास के कारण कृष्णा को मीरा को लेने ख़ुद आना पड़ा प्रेम चाहता है सम्पूर्णता , मन का सम्पर्ण ,आत्मा का सम्पर्ण ....तन शाश्वत है .,.हमेशा नही रहेगा इसलिए तन से जुड़ा प्रेम भी शाश्वत नही रहता जिस प्रेम में अविश्वास है तो वह तन का प्रेम है वह मन से जुड़ा प्रेम नही है जिस प्रेम में शंका है वह अधिकार का प्रेम है........
कुछ समय पहले इस पर लिखी कुछ पंक्तियां थी ...

""जिन्दगी के सफर में चलते चलते तुम मिले
मिले तो थे तुम खुशबुओं के झोंको की तरह
लेकिन देह की परिभाषा पढ़ते पढ़ते
जाने कहाँ तुम गुम हो गए !
काश की इस रूह को छू पाते तुम
काश की इस रूह को महसूस कर पाते तुम
अगर छुआ होता तुमने रूह से रूह को
तो यह जीवन का मिलन कितना मधुर हो गया होता
पा जाता प्रेम भी अपनी सम्पूर्णता
यदि तुमने इसको सिर्फ़ दिल से रूह से महसूस किया होता !!""



फिर मिलूंगी आपसे .इस सुंदर विषय पर सुंदर बाते ले के !!


रंजना [रंजू]

Sunday, August 26, 2007

एक धागा प्यार का


ज़िंदगी पल-पल करके ढलती रही......
बस अपने रंग रूप बदलती रही..........
और उन्ही बीतते पलों का हुआ कुछ ऐसा सिला........
कि मेरा मासूम दिल तुझसे जा मिला.........

इस दिल ने प्यार का ,भावनाओं का ,सपनो का एक जाल बुना.....
जिस का एक सिरा था मेरे पास दूसरा तेरे दिल से जा मिला.........

अब यदि तेरे दिल में भी प्यार सच्चा है......
तो पकड़ के खीच लो इस धागे को........
मैं ख़ुद ही खीची चली आऊंगी

यदि छोड़ दिया तूने इस धागे को......
तो मैं इस धागे में उलझ कर रह जाऊंगी .......
फिर तुम इस धागे को सुलझाना भी चाहोगे.......
तो भी सुलझा नही पाओगे.........
क्यों कि इस धागे की उलझन में
कई नये रिश्ते ,कई नयी गाँठे पाओगे........
करना चाहोगे तब प्यार मुझे पर कर नही पाओगे........

अभी मेरा प्यार सीधा, सच्चा, मासूम है........
नही निभेगा अगर तुमसे तो अपना सिरा भी मुझे लौटा दो......
मैं अपने प्यार के धागे को यूँ ही नही उलझने दूँगी......
तुमसे जुड़ी अपनी हसीं भावनाओं, जज़्बातों को यूँ ही नही खोने दूँगी...........

करती हू तुमसे वादा की.........
मेरे तरफ़ के सिरे में तेरे लिए यही लिपटा हुआ बस प्यार होगा........
तू चाहे वापस आए ना आए.........
इस धागे मैं मेरी अंतिम साँस तक बस तेरा नाम होगा..........

पर.........बस एक सवाल पूछती हूँ तुझसे....
तेरी तरफ़ जो सिरा है.......
क्या इस पर तब भी मेरा नाम होगा?
मेरे लिए यही हसीन जज़्बात,प्यार
और बाक़ी बची ज़िंदगी को , निभाने का साथ होगा.........?

Tuesday, August 21, 2007

प्रतीक्षा


छलकता रहा उनके अधरो पर एक प्यार का सागर
नज़रों में प्यास भर के हम बस उन्हे देखते रहे

तड़पता रहा दिल कोई फ़रियाद लिए मासूम सी
एक आचमन को बस लब मेरे तरसते ही रहे

खिल के बिखरती रही चाँदनी सब तरफ़ फिजा में
हम नजरों में उनकी प्यार की किरण तो तक़ते रहे

बूँदे स्वाती की सीपी में जा के मोती बनी
हम भी उनसे ऐसे मिलन को तरसते रहे

जलाते रहे दिल में प्यार की रोशनी
अपने तक़दीर के अंधेरो से यूँ लड़ते रहे

कई ख़वाब सजते रहे इन बंद पलको में मेरी
हम हर ख्वाब में उनसे मिलने को भटकते रहे

छलकता रहा उनके अधरो पर एक प्यार का सागर
और हम बस एक आचमन को तरसते ही रहे !!


रंजना

Monday, July 09, 2007

माँ



माँ लफ्ज़ ज़िंदगी का वो अनमोल लफ्ज है ... जिसके बिना ज़िंदगी, ज़िंदगी नहीं कही जा सकती ...आज मेरी माँ की पुण्य तिथि है ..और मेरे पास कविता लिखने से अच्छी श्रदांजलि और क्या हो सकती है ..



मेरा बचपन थक के सो गया माँ तेरी लोरियों के बग़ैर
एक जीवन अधूरा सा रह गया माँ तेरी बातो के बग़ैर

तेरी आँखो में मैने देखे थे अपने लिए सपने कई
वो सपना कही टूट के बिखर गया माँ तेरे बग़ैर.....



********************************************************************************



माँ हर पल तुम साथ हो मेरे, मुझ को यह एहसास है
आज तू बहुत दूर है मुझसे, पर दिल के बहुत पास है।
तुम्हारी यादों की वह अमूल्य धरोहर

आज भी मेरे साथ है,

ज़िंदगी की हर जंग को जीतने के लिए,
अपने सर पर मुझे महसूस होता
आज भी तेरा हाथ है।

कैसे भूल सकती हूँ माँ मैं आपके हाथों का स्नेह,

जिन्होने डाला था मेरे मुंह में पहला निवाला,
लेकर मेरा हाथ अपने हाथों में,

दुनिया की राहों में मेरा पहला क़दम था जो डाला

जाने अनजाने माफ़ किया था मेरी हर ग़लती को,

हर शरारत को हँस के भुलाया था,
दुनिया हो जाए चाहे कितनी पराई,
पर तुमने मुझे कभी नही किया पराया था,
दिल जब भी भटका जीवन के सेहरा में,
तेरे प्यार ने ही नयी राह को दिखाया था

ज़िंदगी जब भी उदास हो कर तन्हा हो आई,
माँ तेरे आँचल ने ही मुझे अपने में छिपाया था

आज नही हो तुम जिस्म से साथ मेरे,
पर अपनी बातो से , अपनी अमूल्य यादो से
तुम हर पल आज भी मेरे साथ हो..........
क्योंकि माँ कभी ख़त्म नही होती .........
तुम तो आज भी हर पल मेरे ही पास हो.........


रंजू


Tuesday, June 05, 2007

लिखो कुछ ऐसे....


यूँ ही बैठे-बैठे जब पलटे अपनी डायरी के पन्ने
जाना तब मेरे दिल ने की कुछ अनकहा सा
कुछ अछूता सा ना जाने मेरी कविता
में क्या रह जाता है
प्यार और दर्द मे डूबा मनवा
ना जाने कितने गीत रोज़ लिख जाता है
पर क्यूं लगता है फिर भी सब कुछ अधूरा सा
कुछ कहने की ललक लिए दिल हर बार
कुछ का कुछ कह जाता है

दिल ने मेरे तब कहा मुझसे मुस्कारा के
कि जो दिल में है उमड़ रहा
वो दिल की बात लिखो
कुछ नयेपन से आज
एक नया गीत रचो
लिखो वही जो दिल सच मानता है
एक आग वो जिस में यह दिल
दिन रात सुलगता है ..

कहा उसने ------
लिखो कुछ ऐसा
जैसे फूलो की ख़ुश्बू से
महक उठती है फ़िज़ा सारी
दूर कहीं पर्वत पर जमी हुई बर्फ़ को
चमका देती है सूरज की पहली किरण कँवारी
या फिर पत्तो पर चमक उठती है सुबह की ओस की बूँद कोई
आँखो में भर देती है ताज़गी हमारी
या फिर तपती दोपहर में दे के छाया
कोई पेड़ राही की थकन उतारे सारी
लिखो पहली बारिश से लहलहा के फ़सल
दिल में उमंग भर देती है उजायरी
महकने लगती है मिट्टी उस पहली बारिश से
सोँधी -सोँधी उसकी ख़ुश्बू
जगाए दिल में प्रीत न्यारी
लिखो कुछ ऐसे जैसे हीर भी तुम
और रांझा भी तुम में ही है समाया हुआ
प्यार की पहली छुअन की सिरहन
जैसे दिल के तारो को जगा दे हमारी
या फिर याद करो अपने जीवन का सोलवाँ सावन
जब खिले थे आँखो में सपने तुम्हारे
और महक उठी थी तुम अपनी ही महक से
जैसे कोई नाज़ुक कली हो चटकी हो प्यारी प्यारी

सुन के मैं मन ही मन मुस्काई
और एक नयी उमंग से फिर कलम उठाई
रचा दिल ने एक नया गीत सुहाना
कैसा लगा आपको ज़रा हमे बताना ??:)

Friday, May 11, 2007

रॉक गार्डन***


उस बनाने वाले ने रॉक गार्डन
मेरे दिल में एक नयी चाहत जगा दी है
मेरे सोए हुए अरमानो को टूटे हुए एहसासो को
फिर से जीने की एक नयी राह दिखा दी है !!

कुछ वक़्त पहले मेरे साथ लिखने वाले मेरे एक साथी ने रॉक गार्डन पर कुछ लिखा था जिसका मूल भाव यह था की जिस तरह एक कलाकार ने टूटी फूटी चीज़ो से एक नयी दुनिया बसा दी है क्या कोई मेरे एहसासो को इसी तरह से सज़ा के नये आकार में दुनिया के सामने ला सकता है ?दिल तो मेरा है "रॉक" ही, क्या उस पर अहसास का गार्डन बना सकता है? ...... मेरे दिल को उनकी लिखी यह कविता छू गयी . ..मैने कोशिश की है उनके कुछ जवाबो को अपनी तरह से देने की ..

बना तो दे हम तेरे रॉसे दिल को
फिर से अपनी चाहतो से
एक नया सा बाग़ महकता हुआ
पर क्या तुम उन टूटी फूटी चीज़ो की तरह
अपने एहसासो को फिर से जी पाओगे

अपने टूटे हुए अस्तित्व को सॉंप दिया था
उन टूटे प्यालो कंकरों, पत्थरों ने उस बाज़ीगर को
क्या तुम अपने सारे दर्द , टूटे हुए एहसास
ऐसे मुझे दे पाओगे... ?????

क्या तुम में भी है सहनशीलता उन जैसी
जो उन्होने नये आकर बन पाने तक सही थी
क्या तुम भी उन की तरह तप कर
फिर से उनकी तरह सँवर पाओगे ????

अगर मंज़ूर हैं तुम्हे यह सब
तो दे दो मुझे अपने उन टूटे हुए एहसासो को
मैं तुम्हारे इस रॉहुए दिल को
फिर से महका दूँगी सज़ा दूँगी
खिल जाएगा मेरे प्यार के रंगो से
यह वीरान सा कोना तेरी दुनिया का
पूरी दुनिया को मैं यह दिखा दूँगी !!