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Monday, October 08, 2012

मन के शब्द

यूँ ही बैठे बैठे
रेत पर उकेरते  -लिखते
कुछ शब्द
देख कर न जाने क्यों
दिल कांपने सा लगता है
 कि कहीं यह
थरथराती  उंगलियाँ
कहने न लगे
वो मन के शब्द
जो दिल की अंतस
गहराइयों में छिपे हैं
गहरे भीतर दूर कहीं
और मन है कि
मंडराता रहता है
उन्ही शब्दों के आस पास
उन्हीं से टकराते हुए
मन के भंवर
उन्ही शब्दों के अर्थ से
कतराते हैं ............
तब उन,
अर्थों की मौन भाषा
हम कहाँ ,कब समझ पाते हैं
जानते हैं कि देना पड़ता है
कुछ पाने से पहले
प्यार को शर्तों से तौल कर
सच की .......
अस्तित्वहीनता को ठुकराते हैं
पर जब जान ही लेते हैं
कि ज़िन्दगी
कभी चलती नहीं समानांतर
रेत पर फिर -फिर अनकहे निशाँ
बनाते हैं .................

Monday, August 13, 2012

वक़्त

भागता दौड़ता वक़्त
बहुत ही मिन्नतों से
एक पल के लिए आया था
मेरी मुट्ठी में
ठीक किसी गीले बादल सा
और छोड़ गया
अपनी नमी मेरी हथेलियों से
आँखों की उपरी पलकों में
न जाने कहाँ गया
वह छोटे से
हसीन वक़्त का
  छोटा सा टुकड़ा !!!!

रंजना (रंजू ) भाटिया .
१३ अगस्त १२

Wednesday, June 06, 2012

सवाल अनकहा

 
ऐ ज़िन्दगी ....
कभी तू .....
पढ़ लिया करती थी
मेरे उन अनकहे सफों को भी
जो आँखों के कोनो में
सिमट कर बिखर जाया करते थे
समेट लेती थी तब उन्हें
अपने इस अंदाज़ से
कि दिल के हर कोने के
अँधेरे ,उजाले में
बदल जाया करते थे
बदलते मौसम के
बिखराव की तरह
रोज़ पीले गिरते पत्ते
हरियाले और नयी कलियों की
उम्मीद में सज जाया करते थे
सोचती हूँ अब ....
तू मिले जो कहीं
तो तुझसे पूछूँ 
छोडे थे हमने जो फासले
खुशगवार लम्हों के ...
प्यार की सोगातों के ...
और मदभरी शिकायतों के ..
वो ठिठके हुए हैं
आज भी किसी
रुकी हुई झील की तरह
क्या आज भी ...??
दो किनारों पर खड़े हम
एक एक कदम बड़ा कर
कम कर सकते हैं इन एहसासों को ?
जम गए हैं जो किसी बर्फ की तरह
क्या आज भी
उन भावनाओं को ,
संवेदनाओं को ..
एक दूजे के छूने से
पिघला सकते हैं ??
रंजू .........

Monday, February 27, 2012

याद के पल

जीवन की रेल पेल में
हर संघर्ष को झेलते
हर सुख दुःख को सहते
कभी मैंने चाही नही इनसे मुक्ति
पर कभी बैठे बैठे यूं ही अचानक
जब भी याद आई तुम्हारी
तब यह मन आज भी
भीगने सा लगता है
चटकने लगते हैं तन मन में
जैसे मोंगारे के फूल
और जैसे सर्दी से कांपते बदन में
तेरी याद का साया
गुनगुनी धूप सी भर देता है

छेड़ता नहीं है कोई सरगम को
फ़िर भी एक संगीत दिल में
गूंजने लगता है ..
उतर जाते हैं कई आवरण
उन यादो से .
जिन्हें दिल आज भी संजोये हुए हैं
नही पड़ने देता दिल
 इन पर वक्त का साया
 क्यों कि यही कुछ याद के पल
इस तपते जीवन को
एक ठंडी छाया देते हैं
जीवन के कड़वे यथार्थ  को
कुछ तो समृद्ध बना देते हैं !!

Wednesday, January 25, 2012

खोये हुए पल

बीते वो लम्हे
जो सुख से भरे थे
हरियाले से वह पत्ते
अब क्यों पीले पड़ चले हैं
पर अब भी याद है
उन पलों की सोंधी सोंधी
जब सिर्फ़ तुम्हारे छूने भर से
देह तपने लगती थी
लगती थी तपते होंठों  की मोहर जब
कभी गर्दन और काँधे पर
तो झनझना के देह थिरक उठती थी

उठने लगती थी ऐसी हिलोरें
दोनों तरफ़ जैसे
कोई नदिया मचल के उमड़ती थी

पर आज वही है हम दोनों
साँसे भी वहीँ है
काँधे पर ठहरा है
कोई पुरानी याद का बोसा
और तेरी मेरी उलझी यादे कई हैं
पर न जाने कहाँ खो गया
वह स्पंदन
न जाने वह मिलने की
खुशी कहाँ गुम हुई है  

सोख लिया सब रस
इस जीवन नदिया से
हमारी भागती दौडती जरूरतों ने 
और जीवन का वह अनमोल पल
कहीं छिटक कर खो गया है ...

Thursday, November 04, 2010

अंधेरों में कुछ रोशनी की बात तुम करो

अंधेरों में कुछ रोशनी की बात तुम करो
नजर और दामन बचा कर  चलने की बात करो
भाषा भी है ,शब्द भी है पास कलम के हमारे 
भावों  में डुबो कर सही तस्वीर तुम करो
हर एक के हिस्से में हैं यह महफूज चंद साँसे
हर पल यूँ मर के जीने का रियाज न तुम करो
तलाशो न हर गजल के मायने कोई
लफ़्ज़ों का यूँ सरे आम कत्ल न तुम करो
कायम है हर रिश्ता ,यहाँ पर चंद शर्तों पर
दिल से प्यार का सफ़र अब ख्यालों में तय करो
सीखा है मुद्दतों बाद मेरी आँखों ने सोना
झूठे  ख़्वाबों का रंग न अब इन में भरो

Monday, October 04, 2010

यूँ ही

डायरी के
पुराने पीले
पन्नो में
मिली है ..
कुछ यादें पुरानी
कुछ लफ्ज़
कुछ तस्वीरें
सोच में हूँ ...
क्या तुम भी
यूँ ही
मिल जाओगे कभी ?

Tuesday, August 10, 2010

बहाना


कविता में उतरे
यह एहसास
ज़िन्दगी की टूटी हुई
कांच की किरचें हैं
जिन्हें महसूस करके
मैं लफ्जों में ढाल देती हूँ
फ़िर सहजती हूँ
इन्ही दर्द के एहसासों को
सुबह अलसाई
ओस की बूंदों की तरह
अपनी बंद पलकों में
और अपने अस्तित्व को तलाशती हूँ
पर हर सुबह ...........
यह तलाश वही थम जाती है
सूरज की जगमगाती सी
एक उम्मीद की किरण
जब बिंदी सी ......
माथे पर चमक जाती है
एक आस ,जो खो गई है कहीं
वह रात आने तक
जीने का एक बहाना दे जाती है...

Monday, March 15, 2010

ज़िंदगी का सच


क्यों खिले गुल ,
इस चमन में
दे के सुगंध ..
फिर क्यों मुरझाए?
शमा जली तो रोशनी के लिए
पर परवाना क्यों
संग जल के मर जाए?

गुनगुन करते भंवरे,
क्यों सब पराग पी जाए?
क्यों फूल भी हँस के अपना
सब कुछ उस पर लुटाए ?

झूमती गाती हवा
क्यों एक दम शांत हो जाए
धीमे धीमे बहते दिन रात
वक़्त को कैसे मिटाए ?

झरनों में बह कर पर्वत की
सब कठोरता क्यों बह जाए
अपना सब कुछ दे के भी
प्रकति हर दम क्यों मुस्कराये ?

इन्ही तत्वों से बना मानव
सब कुछ लूटा के जीने का
यह भेद क्यों समझ न पाए
इस राज़ का राज़ है गहरा
जो जीए सही अर्थ में ज़िंदगी
वही इसको समझ पाए !!

Tuesday, January 19, 2010

तलाश


बसंती ब्यार सा,
खिले पुष्प सा,
उस अनदेखे साए ने..
भरा दिल को..
प्रीत की गहराई से,

खाली सा मेरा मन,
गुम हुआ हर पल उस में
और झूठे भ्रम को
सच समझता रहा ..

मृगतृष्णा बना यह जीवन
भटकता रहा जाने किन राहों पर
ह्रदय में लिए झरना अपार स्नेह का
यूं ही निर्झर बहता रहा,

प्यास बुझ सकी दिल की
जाने ....
किस थाह को
पाने की विकलता में
गहराई में उतरता रहा,

प्यासा मनवा खिंचता रहा
उस और ही...
जिस ओर मरीचका
पुकारती रही,
पानी के छदम वेश में
किया भरोसा जिस भ्रम पर
वही जीवन को छलती रही
फ़िर भी पागल मनवा
लिए खाली पात्र अपना
प्रेम के उस अखंड सच को
सदियों तक ........
ढूढता रहा !! ढूढता रहा !!

Tuesday, January 12, 2010

धोखा


एक साँस .....
जाने किस आस पर
दिन गुजारती है..
निरीह सी आंखो से
अपने ही दिए जीवन को,
पल -पल निहारती है
पुचकारती है, दुलारती है

अपने अंतिम लम्हे तक
उसी को ...
जीने का सहारा मानती है

सच है ...
जीने की वजह
कोई बनाने के लिए
इस तरह ..
एक धोखा होना जरुरी है
और दिल के किसी कोने को
यूं ही....
सच से परे होना भी जरुरी है॥

रंजना (रंजू) भाटिया

Thursday, December 31, 2009

झूमता हुआ नया साल फ़िर आया....


नया साल
एक नई आशा
नई उम्मीद जगाता हुआ
कलेंडर के पन्नों पर
उतर आता है
और कुछ दिन तो
अपने नयेपन के एहसास से
कुछ तो अलग रंग दिखाता है....

फिर ढलने लगते हैं लम्हे
वक़्त यूँ ही गुजरता जाता है ....
कुछ नया होने की आस में
यह जीवन यूँ ही बीतता जाता है

नए साल की सबको बहुत बहुत बधाई ......इस नए साल की शुरू आत इस बार एक बाल पत्रिका में पब्लिश हुई बाल कविता से ...आने वाला नया साल यूँ ही किसी बच्चे सा मासूम हो ,सबके लिए मंगलमय हो ..इसी दुआ के साथ ...

झूमता हुआ फ़िर से नया साल आया
खुशियों की नई सौगात यह लाया


बीते पल को दे अब हम विदाई
नए पलों को यह दिखाने को लाया
झूमता हुआ नया साल फ़िर आया


सब तरफ़ अब हटे
अन्धकार का अँधेरा
बिखरें किरणे दिनकर की
नया हो सवेरा ..
कुदरत ने भी गीत नया गया
झूमता हुआ नया साल फ़िर से आया

नव बीज से नया भारत हम बनाएं
जाति धर्म का हर भेद मिटायें
मानव धर्म को सब अपनाएँ
यही संदेश दिल ने फिर दोहराया
झूमता हुआ नया साल फ़िर से आया

रंजना (रंजू ) भाटिया

Tuesday, November 10, 2009

सुनो ...


आसमान की तरह
""खाली आँखे ""
धरती की तरह
"चुप लगते "सब बोल हैं
पर तुम्हारे कहे गए
एक लफ्ज़
"सुनो "में
जैसे वक्त का साया
ठहर सा जाता है
बिना अर्थ ,बिना संवाद
के भी
यह लफ्ज़ न जाने
कितनी बातें कह जाता है
कभी लगता है
यह भोर का तारा
कभी सांझ का
गुलाबी आँचल बन
आंखो में बन के
सपना ढल जाता है

लगता है...
कभी यह राग
सुनहरे गीतों का
कभी मुझे ख़ुद में समेटे हुए
अपने में डूबोते हुए
पास से हवा सा गुजरता
यह" सुनो "लफ्ज़
एक दास्तान बन जाता है !!

रंजना (रंजू ) भाटिया

Wednesday, October 21, 2009

कोई तो होता .....


कोई तो होता ......
दिल की बात समझने वाला
सुबह के आगोश से उभरा
सूरज सा दहकता
रात भर चाँद सा चमकने वाला

पनीली आखों में है
खवाब कई ...
कोई संजो लेता ..
इन में संवरने वाला
थरथराते लबों पर
ठहरा है लफ्जों का सावन
कोई तो होता ..
इनमें भीगने वाला

दिल की धडकनों में
कांपते हैं कितने ही एहसास
कोई तो होता ..
इन एहसासों को परखने वाला
इक नाम बसा है
अरमानों के खंडहर पर
कहाँ लौट के आता है
फ़िर जाने वाला ...!!!!

रंजू भाटिया

Tuesday, June 09, 2009

दिलो के फासले


यूँ ही जाने -अनजाने
महसूस होता है
रिश्तो की गर्मी
शीत की तरह
जम गई है ...
न जाने कहाँ गई
वह मिल बैठ कर
खाने की बातें
वह सोंधी सी
तेरी -मेरे ....
घर की सब्जी
रोटी की महक सी
मीठी मुस्कान ....

अब तो रिश्ते भी
शादी में सजे
बुफे सिस्टम से
सजे सजाये दिखते हैं
प्यार के दो मीठे बोल भी
जमी आइस क्रीम की तरह
धीरे से असर करते हैं
कहने वाले कहते हैं
कि घट रही धीरे धीरे
अब हर जगह की दूरी
पर क्या आपको नही लगता
कि दिलो के फासले अब
और महंगे .....
और बढ़ते जा रहे हैं??

Monday, May 25, 2009

मौसम ..कुछ यूँ ही ..

मौसम आज कल कई रंग एक साथ दिखा रहा है ...कभी जलती गर्मी और कभी रिमझिम फुहार ..इसी रंग को इन्हीं छोटी क्षणिकाओं के रूप में कहने की एक कोशिश की है ..

१)
गुलमोहर के फूल
जैसे हाथ पर कोई
अंगार है जलता ...

२)
जेठिया आग से
झुलसे है बहार
अमलतास से मिटे
कुछ गर्मी की आस

३)
झूमे पत्ते
डाली डाली
झूम के बरसा मेघ
सावन की ऋतु आ ली

४)
कैसे मदमस्त
हो के छेड़े मल्हार
पत्तियों पर बुंदिया की
पड़े है जब मार.....

५ )
उमड़ी घटा
दीवाने बदरा
शोर मचाये
नाचा मन मोर भी
पर तुम न आये ..
बिखरी जुल्फों को
अब कौन सुलझाए ...

Tuesday, May 12, 2009

बेबसी ...


कहा उन्होंने चाँद तो ,
चांदनी बन मैं मुस्कराई
उनकी ज़िन्दगी में ....

कहा कभी उन्होंने सूरज तो
रोशनी सी उनकी ज़िन्दगी में
जगमगा कर छाई मैं ...

कभी कहा मुझे उन्होंने
अमृत की बहती धारा
तो बन के बरखा
जीवन को उनके भर आई मैं

पर जब मैंने माँगा
उनसे एक पल अपना
जिस में बुने ख़्वाबों को जी सकूँ मैं
तो जैसे सब कहीं थम के रुक गया ..
तब जाना....
मैंने कि ,
मेरे ईश्वर माने जाने वाले
ख़ुद कितने बेबस थे
जो जी नही सकते थे
कुछ पल सिर्फ़ अपने
अपनी ज़िन्दगी के लिए!!!

Friday, January 04, 2008

टीस


दिखे जब रंग इन्द्रधनुष के
कुछ स्वप्न भूले बिसरे याद आए
दे के दर्द गए वह पवन के झोंके भी
जब हौले से वह यूं छु जाए

चुभी दिल में कोई फाँस सी
जब कोयल कुहू कुहू गाए
हर बीता मौसम दे याद तुम्हारी
पर गुजरा वक्त कब हाथ है आए

टीस दे इस दिल को हर वो लम्हा
जो गुजरा तुम संग साथ बीताये
भेजे कई मिलन के संदेशे हमने
दिल की बात तुम समझ न पाये

न न मत अब सहलाना
कोई दिल का दाग तुम अब मेरा
जब तक दिल में .......
यह विरह की टीस घनेरी
तब तक हैं यादों में तेरा बसेरा
हर चुभती बात में याद आए तुम
हर दर्द में दिखे चेहरा तेरा
रहने दो अब टीस यह दिल में
यूं तो रहेगा साथ तेरा मेरा !!

Wednesday, September 05, 2007

तिलिस्म



चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी



हर इंसान जीता है अपने ही बनाये तिलिस्म में
और बुन लेता है जाने अनजाने कितने सपने
रंग भर के इन में अपने ही मन चाहे
वो एक ख्वाबों की दुनिया बसा लेता है
नही तोड़ पाता वह ख़ुद के बुने इस जाल को
कोई तीसरा इंसान ही उसे इस ख़्वाब से जगाता है
और फ़िर एक खामोशी सी फ़ैल जाती है जहाँ में
जहाँ ना कोई आता है और ना ही फ़िर कोई जाता है
जिन्दगी की शाम ढलने लगती है फ़िर तनहा-तनहा
और बीते सायों का लबादा पहने वक्त
हमे यूं ही कभी डराता है कभी बहकाता है !!

Sunday, August 26, 2007

एक धागा प्यार का


ज़िंदगी पल-पल करके ढलती रही......
बस अपने रंग रूप बदलती रही..........
और उन्ही बीतते पलों का हुआ कुछ ऐसा सिला........
कि मेरा मासूम दिल तुझसे जा मिला.........

इस दिल ने प्यार का ,भावनाओं का ,सपनो का एक जाल बुना.....
जिस का एक सिरा था मेरे पास दूसरा तेरे दिल से जा मिला.........

अब यदि तेरे दिल में भी प्यार सच्चा है......
तो पकड़ के खीच लो इस धागे को........
मैं ख़ुद ही खीची चली आऊंगी

यदि छोड़ दिया तूने इस धागे को......
तो मैं इस धागे में उलझ कर रह जाऊंगी .......
फिर तुम इस धागे को सुलझाना भी चाहोगे.......
तो भी सुलझा नही पाओगे.........
क्यों कि इस धागे की उलझन में
कई नये रिश्ते ,कई नयी गाँठे पाओगे........
करना चाहोगे तब प्यार मुझे पर कर नही पाओगे........

अभी मेरा प्यार सीधा, सच्चा, मासूम है........
नही निभेगा अगर तुमसे तो अपना सिरा भी मुझे लौटा दो......
मैं अपने प्यार के धागे को यूँ ही नही उलझने दूँगी......
तुमसे जुड़ी अपनी हसीं भावनाओं, जज़्बातों को यूँ ही नही खोने दूँगी...........

करती हू तुमसे वादा की.........
मेरे तरफ़ के सिरे में तेरे लिए यही लिपटा हुआ बस प्यार होगा........
तू चाहे वापस आए ना आए.........
इस धागे मैं मेरी अंतिम साँस तक बस तेरा नाम होगा..........

पर.........बस एक सवाल पूछती हूँ तुझसे....
तेरी तरफ़ जो सिरा है.......
क्या इस पर तब भी मेरा नाम होगा?
मेरे लिए यही हसीन जज़्बात,प्यार
और बाक़ी बची ज़िंदगी को , निभाने का साथ होगा.........?