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Thursday, June 19, 2008

नाम की महिमा

नाम भी कैसे हम चीजों को दे देते हैं न ..कई बार दिमाग में आता है कि आलू , का नाम यदि आलू न होता तो क्या होता? और यदि यह नाम है तो कैसे किसने क्या सोच कर रखा ? आलू प्याज का तो पता नही कि यह नाम कैसे किसने रखे .पर टेडी एक खिलौना [बच्चो को क्या मुझे भी बहुत पसंद है :) उसका नाम कैसे टेडी कैसे पड़ा यह रोचक जानकारी मैंने एक जगह पढ़ी .. इसके खिलोने के नाम के पीछे बहुत ही रोचक कहानी है ..बात सन १९०२ की है इस से पहले आज सबको भाने वाला यह खिलौना टेडी बियर नही था जिस टेडी बियर को हम देख के इतना खुश होते हैं यह अमरीका के एक राष्टीयपति का उपनाम है जिनका नाम था थियोडोर रूसवेल्ट उन्ही का निक नेम टेडी था .एक बार इन्हे जंगली जानवरों की रक्षा के लिए देश से अपील करनी थी शिकार के शौकीन लोग शेर ,बाघ भालू आदि का शिकार किया करते थे इस से अमेरिका की सरकार तंग आ चुकी थी मगर पता नही किसी कार्टूनिस्ट को इस में सरकार की दोहरी नीति दिखायी दी उसने १९०२ में एक कार्टून बनाया जिस में राष्ट्रिय पति रूजवेल्ट हाथ में बन्दूक थामे खड़े हैं और उनके पीछे दो खूबसूरत भालू बने थे और नीचे भालू को न मारने की अपील की गई थी ..इस कार्टून की पूरे देश भर में खूब चर्चा हुई और इसके यूँ चर्चा का विषय बनने पर एक दूकानदार ने ग्राहकों का ध्यान अपनी दूकान की और आकर्षित करने के लिए इस कार्टून से भालू को ध्यान में रख कर इसकी एक खिलौना आकृति बनायी और सरकार से इसको टेडी पुकारे जाने की इजाजत मांगी राष्ट्रीय पति के इस उपनाम को इस भालू के लिए टेडी नाम मिल गया और यह तभी से टेडी बियर के नाम से मशहूर हो कर बिकने लगा ..


नाम की महिमा बहुत है ..नाम ही किसी की पहचान बनाते हैं या उसके होने के अस्तित्व की पहचान है ..पर यदि नाम ही किसी का गुम जाए तो ....एक बार इसी दर्द पर कुछ पंक्तियाँ लिखी गई थी ...


तन तो थक कर चैन मेरा पा गया
पर मन क़ी थकन अब कौन उतारे
खड़ी हूँ मैं भीड़ में तन्हा ऐसे
जैसे कोई किश्ती हो साहिल किनारे

एक शोर सा दिल में जाने कैसा है यह
एक आग दिल में कोई जैसे तूफ़ान उठा ले
अन्जाना अंधकार है मेरे चारो तरफ़
करता है दूर सितारो से भरा गगन कैसे इशारे

बिखरें हैं चारों तरफ़ धूल भरे यह रास्ते
मेरी मंजिल है कहाँ, कौन सा रास्ता अब पुकारे
मिलने को मिलता है यहाँ सारा जहान हमको
एक नही मिलता ज़ो प्यार से मेरा नाम पुकारे !!

Tuesday, June 10, 2008

गुलजार जिनके लिखे गीत महकते हैं प्यार के एहसास से

हमारी हिन्दी फिल्में गानों के बिना अधूरी है ..कई गाने इतने अच्छे होते हैं कि यह फ़िल्म देखने पर मजबूर कर देते हैं ..किसी भी फ़िल्म की लोकप्रियता संगीत की धुन और उस में आए गानों के बोल भी होते हैं ..हमारी हिन्दी फिल्मों में यह परम्परा पारसी थियटर से आई और इसी परम्परा ने शायरों ,गीतकारों को सबके सामने रखा ।आज के लिखे जाने वाले गीतों से सबको शिकायत है कि पहले के गीत दिल को छूते थे पर आज कल के गीत गुब्बारे की तरह है जो आए और कब चले गए पता ही नही चलता कुछ जुबान पर चढ़ते हैं पर दिल में नही उतरते हैं ..पर आज के इस दौर में कई अच्छे गीतकार हैं जैसे जावेद अख्तर ,गुलजार .निदा फाज़ली आदि ..जिनके लिए लिखना सिर्फ़ तुकबंदी करना नही है ..वह लफ्जों में जान डाल देते हैं उसके अन्दर की गहराई को शिद्दत से महसूस करवाते हैं।

इसी कड़ी में गुलजार जी का नाम बहुत अच्छे से दिलो दिमाग पर असर करता है ।आम बोलचाल के लफ्जों को वह यूं पिरो देते हैं कि कोई भी बिना गुनगुनाए नही रह सकता है ..जैसे कजरारे नयना और ओमकारा के गाने सबके सिर चढ़ के खूब बोले .आज की युवा पीढ़ी खूब थिरकी इन गानों पर ।सच में वह कमाल करते हैं जैसे उनके गाने में आँखे भी कमाल करती है .उस से सबको लगता है कि यह उनके दिल कि बात कही जा रही है ।वह गीत लिखते वक्र जिन बिम्बों को चुनते हैं वह हमारी रोज की ज़िंदगी से जुड़े हुए होते हैं इस लिए हमे अपने से लगते हैं उनके गाने ।ओ साथी रे [ओमकारा] का गाना में तेरी मेरी अट्टी बट्टी ..दांत से काटी कट्टी ..जैसे लफ्ज़ को जादुई एहसास देना गुलजार जैसे गीतकार ही कर सकते हैं



प्यार और रोमांस से जुडा जो जादुई एहसास जो वो पिरोते हैं अपने लफ्जों में वह सबको अपने दिल के करीब सीधा दिल में ही उतरता सा लगता है ,अपने इन गानों से उन्होंने लाखो करोड़ों प्रेम करने वाले दिलो को शब्द दिए हैं। आज की युवा पीढ़ी के भावो को भी गुलजार बखूबी पकड़ कर अपने गीतों में ढाल लेते हैं ।उनके कुछ गीत हमेशा ही हर पीढ़ी में लोकप्रिय रहेंगे जैसे मेरा कुछ समान--- इजाजत ,इस मोड़ से जाते हैं तेरे बिना ज़िंदगी से कोई शिकवा तो नही ..आंधी,तुम पुकार लो .खमोशी ..रोज़ रोज़ आंखो तले फ़िल्म के सभी गाने आदि आदि अनेक गाने .लिस्ट तो बहुत लम्बी है उनके लिखे गानों की ।किस को यहाँ लिखूं किसको न लिखूं .मुझे सब बेहद पसंद है ..

..वह जो शब्द अधिकतर इस्तेमाल करते हैं रात ,चाँद ,पानी आदि उन्होंने इन शब्दों को बहुत से अलग अलग अर्थ दिए हैं ..वह शब्दों से जी ध्वनि पैदा करते हैं वह अर्थ हीन नही होती है रोमांस में डूबी उनकी हर कविता उनके लिखे हुए हर लफ्ज़ को और रोमांटिक एहसास से भर देती है ..हमेशा इनके लिखे का इंतज़ार रहेगा और इनके लिखे गाने सबके दिलों में गूंजते रहेंगे ....!!

अभी उन्ही का लिखा एक गाना सुनिए .मुझे यह बेहद पसंद है ..:)

Saturday, May 24, 2008

जरा यूं भी सोचिये ...

अमित जी आपकी पोस्ट के जवाब में मैं यही कह सकती हूँ ..

बच्चे घर मे दोनों के प्यार के लिए तरसते रह जातें हैं । नई पीढ़ी माँ बाप के प्रेम से वंचित है। आरुषी का केस इसलिए (खास तौर से समूची नारी जाति के लिए एक आई ओपनर है। यही घड़ी है नारी समाज अब समाज राष्ट्र भावी पीढ़ी के हित में घरो की ओर अपना रुख कर ले।


http://ultateer.blogspot.com/


सवाल कई है और जवाब भी कई ...? पर क्या यह सचमुच इतना आसान है ...परिवार टूटने लगे हैं बिखरने लगे हैं ..? और एक महिला घर पर रहे .क्या आपको लगता है की इस से समस्या सुलझ जायेगी ..."?महिला कभी कोई भी काम करे अपने परिवार को भूल नही पाती है ...पर जो हालत आज कल पैदा हो रहे हैं उस में उसका नौकरी करना भी उतना ही जरुरी है जितना परिवार को वक्त देना .और ना सिर्फ़ वक्त बेवक्त की मुसीबत के लिए उसके अपने लिए भी अपने पेरों पर खड़ा होना सवालंबी होना जरुरी है यही वक्त की मांग है ....पर इस में सबका सहयोग चाहिए ...बढ़ती महंगाई , बदलता समाज हमारे रहने सहने का ढंग सब इतने ऊँचे होते जा रहे हैं कि एक की कमाई से घर नहीं चलता है .. और यह सब सुख सुविधाये अपने साथ साथ बच्चो के लिए भी है ..बात महिला के घर पर रहने की या न रहने की नही है असल में बात है माता पिता दोनों को वक्त देने की अपने बच्चो को अपने बच्चो से निरन्तर बात करने की ..और उन को यह बताने की हम हर पल आपके साथ है ..आप क्या समझते हैं जिन घरों में महिलाए रहती है वहाँ बच्चे नही बिगड़ते हैं ..??आज का माहोल जिम्मेवार है इस के लिए ..अपने आस पास नज़र डालें जरा ..दिन भर चलता टीवी उस पर चलते बेसिरपैर के सीरियल अधनंगे कपड़ो के नाच ,माल संस्कृति ,और लगातार बढ़ती हिंसा .. जिन्हें आज कल बच्चे दिन रात देखते हैं इंटरनेट का बढता दुरूपयोग ...मोबाइल का बच्चे बच्चे के हाथ में होना ..क्या आप रोक पायेंगे या एक माँ घर पर रहेगी तो क्या यह सब रुक जायेगा ..नही ..यह आज के वक्त की मांग है और माता पिता यह सुविधा ख़ुद ही बच्चो को जुटा के देते हैं .ताकि उनका बच्चा किसी से ख़ुद को कम महसूस न करे और यही सब उनके दिमाग में बचपन से बैठता जाता है और तो और उनके कार्टून चेनल तक इस से इस से बच नही पाये हैं ..अब घर पर माँ है तब भी बच्चे टीवी देखेंगे और नही है तब भी देखेंगे ..इन में बढती हिंसा और हमारा इस पर लगातार पड़ता असर इन सब बातो को बढावा दे रहा है ..नेतिकता का पतन उतनी ही तेजी से हो रहा है जितनी तेजी से हम तरक्की की सीढियाँ चढ़ रहे हैं ..हर कोई अब सिर्फ़ अपने बारे में सोचता है...और जब उस राह पर मिलने वाली खुशी में कोई भी रोड अटकाता है तो बस उसको मिटाना है हटाना है अपने रास्ते से यही दिमाग में रहता है ....संस्कार माँ बाप दोनों मिल कर बच्चे को देते हैं ..शिक्षा का मध्याम ज्ञान को बढाता है और यही नए रास्ते भी सुझाता है .. पर जीवन के इस अंधाधुंध बढ़ते कदमों में जरुरत है सही दिशा की सही संस्कारों की ...और सही नेतिक मूल्यों को बताने की ...सिर्फ़ माँ की जिम्मेवारी कह कर पुरूष अपनी जिम्मेवारी से मुक्त नही हो सकता वह भी घर की हर बात के लिए हर माहोल के उतना ही जिम्मेवार है जितना घर की स्त्री ..यदि वह अपना आचरण सही नही रख पाता है तो एक औरत माँ कितना संभाल लेगी बच्चे को आखिर वह सब देखता है अपने जीवन का पहला पाठ वह घर से ही सिखाता है हर अच्छे बुरे की पहचान पहले उसको अपने माँ बाप दोनों के आचरण से होती है वही उसके जीवन के पहले मॉडल रोल होते हैं ...मैं तो यही कहूँगी कि आज के बदलते हालात का मुकाबला माता पिता दोनों को करना है और अपने बच्चो को देने हैं उचित सही संस्कार ..बबूल का पेड़ बो कर आम की आशा करना व्यर्थ है ..और नारी को सिर्फ़ घर पर बिठा कर आप इन बिगड़ते हालात को नही सुधार सकते ..यह हालात हम लोगो के ख़ुद के ही बनाए हुए हैं तो अब इनका मुकाबला भी मिल के ही करना होगा ..नही तो यूं ही अरुशी केस होते रहेंगे और इंसानियत शर्मसार होती रहेगी ...आप इसको जरा यूं भी सोचिये ..

Monday, May 12, 2008

विज्ञापन का असर कहानी से ज्यादा ?

सिनेमा हमेशा से ही समाज पर अपना प्रभाव छोडती है ..और सबसे अधिक इस से परभावित होता है युवा वर्ग .हर फ़िल्म का इस में काम करने वालों का देखने वालों पर के असर होता है यह बात अब कहने की नहीं रह गई है ...युवा वर्ग अपना हीरो जिस को मान लेते हैं उसी के अनुसार उनकी चाल ढाल ढल जाती है ..बबिता कट बालों से ले कर बाबी ड्रेस तक धोनी के बालों से ले कर शाहरुख़ के सिक्स एप्स तक ..कौन अछुता रहा है इन सब से उनके हाव भाव उनकी उपयोग की गई चीजों की भी जबरदस्त मांग मार्केट में बढ़ जाती है ..और जाने अनजाने फ़िल्म और हीरो व्यवसायिक वस्तुओं के विज्ञापन की भूमिका निभाते रहते हैं .ताल में सुभाष घई ने जिस खूबसूरती से कोका कोला बेचने की शुरुआत की थी वह आज तक कायम है उस फ़िल्म में भारतीय संगीत भी इस की बिक्री के आगे फीका सा नज़र आने लगा था ...लक्स का विज्ञापन तो इस बारे में एक रेकॉर्ड ही माना जा सकता है की कोई हिरोइन सुंदर है तो वह लक्स का ही कमाल है ..हर चीज अब विज्ञापन बनती जा रही है जिस से न केवल युवा वर्ग बलिक आज की नई पौध भी अच्छी खासी प्रभावित है ...बिना उसका नुकसान जाने पहचाने बस लेने की जिद है .अब अभिताभ बच्चन डाबर गुलोकोज पी के ताक़तवर हो रहे हैं या वह चाकलेट खा रहे हैं तो उनको मानने वाले कैसे इन चीजों नही अपनाएंगे ..विज्ञापन बनाने वाले या फ़िल्म में इसका इस्तेमाल करने वाले जिस खूबसूरती से भावनाओं से जुड़ कर इस से आम जनता को जोड़ देते हैं वह काबिले तारीफ है ..याद करे ताल का कोका कोला का वह सीन जहाँ हीरो हिरोइन में कोई स्पर्श नही हुआ पर एक दूसरे का झूठा पीने का वह सीन कितनी देर तक परदे पर छाया रहा जो प्रेम का स्वीकृत रूप बना ..चिट्ठी पत्री , दोस्त सखी या कोई और अन्य साधन अब बीते वक्त की बात हो चुकी हैं ... आज सब बिकता है साबुन से लेकर फेयर एंड लवली तक ..बस बेचना आना चाहिए आख़िर बाज़ार की संस्कृति ने हमे हर चीज को बेचना सिखा ही दिया है ....टीवी पर आने वाले हर प्रोग्राम का यही हाल है आधे घंटे का प्रोग्राम नही की ५० तरह के विज्ञापन हर प्रकार के विज्ञापन से भरा पढ़ा है शायद इन में आने वाले सीरियल की कहानी लिखने वालों को पता है की यह दर्शकों को बाँध सके न सके पर शायद यह विज्ञापन तो कुछ ऐसे मजेदार बनाए जाए कि लोग देखते रहे ....कई बार कोई पुरानी फ़िल्म देखने को मिले तो उस में एक ख़ास बात नोट की मैंने कि नायक या नायिका के हाथ में कभी कभी अंग्रेजी लेखक या हिन्दी कवि की कोई किताब होती है जिस से उस किताब को पढने की इच्छा होती है पर आज की नई पीढ़ी शायद यही विज्ञापन देख के ही बेचैन रहेगी और इसी तरह हमारी फिल्म सीरीयल कहानी कम और विज्ञापन ज्यादा नजर आते रहेंगे !!

Saturday, May 10, 2008

ज़िंदगी क्या इसी को कहते हैं[मीना कुमारी]



अभिनय की हर बारीकी से सम्पन्न मीना कुमारी एक अभिनेत्री के रूप में ३२ साल तक भारतीय सिने जगत पर छाई रहीं फ़िल्म परिणीता की शांत अल्हड़ नवयौवना ,बैजू बावरा की चंचल हसीं प्रेमिका साहब बीबी और गुलाम की की सामंती अत्याचार व रुदिवादी परम्परा की निष्ठुर यातनाएं झेलने वाली बहू और शारदा की ममता मयी माँ और सबसे बेहतरीन पाकीजा की साहब जान इन मीना कुमारी को कौन नही जानता...

१ अगस्त १९३२ को जन्मी और गरीबी में पली इस अभिनेत्री का बचपन भी बहुत अच्छा नही गुजरा मात्र ८ साल की उम्र में यह फिल्मों में आ गई पहले यह गाने गाया करती थी कई गजल और गीत उन्होंने अपनों दर्द भरी आवाज़ में गाए हैं उपनाम नाज से वह लिखा भी करती थी ..कुछ कहानिया भी लिखी थी इन्होने ..यदि यह अभिनेत्री न होती तो एक बहुत अच्छी शायरा होतीं ....सन १९४७ में बनी पिया घर आजा के सभी गीत मीना जी ने गाए थे इन में देश पराए जाने वाले .नयन डोर में बाँध लिया आदि गीत बहुत लोक प्रिय भी हुए थे ...सन १९52 में बेजू बावरा बहुत हिट साबित हुई और इन्हे फ़िल्म फेयर अवार्ड भी मिला ज्यूँ ज्यूँ यह शोहरत की बुलन्दी पर पहुंचती गई उतनी ही अपनी ज़िंदगी में तन्हा होती गई हर वक्त खोयी खोयी उदासियों में जीने वाली मीना के अभिनय भी वह दर्द छल कता ही रहा सन १९७१ में बनी पाकीजा में जैसे उन्होंने अपनी सच्ची पीडा को ही फ़िल्म में उतार दिया उस फ़िल्म का एक संवाद भूले नही भूलता हम तो वह लाश है जिसकी कब्र खुली पड़ी रहती हैं इस को बोलते हुए उन्हें कोई अभिनय नही करना पड़ा क्यूंकि उनकी ज़िंदगी की सारी पीड़ा जैसे उस में सिमट के रह गई थी ...

बच्चो से मीना जो को बहुत लगाव था उन्होंने कई अनाथ बच्चों की मदद की कहते हैं कि कई बार वह सारा सारा दिन उन बच्चो के साथ बिता देती थी ..पर तकदीर ने उन्हें औलाद का सुख नही दिया परदे पर माँ कि ममता रूप जीने वाली सदा माँ बनने के लिए तरसती रहीं .अन्तिम दिनों में सावन कुमार टाक उनके साथ रहे उन्होंने मीना जी की सेवा मैं कभी कोई कमी नही आने दी उन्होंने उनक दिल रखने के लिए उनकी फ़िल्म गोमती के किनारे में भी काम किया उन्होंने पूरी ज़िंदगी में कभी किसी को निराश नही किया लेकिन कोई उनका नही हो सका तब उन्होंने शराब को उन्होंने साथी बना लिया सिर्फ़ ४० साल की छोटी सी उम्र में उन्होंने इस बेदर्द दुनिया से रुखसत ली यह कहते हुए

ज़िंदगी क्या इसी को कहते हैं जिस्म तन्हा है और जां तन्हा
मीना कुमारी का ही लिखा हुआ है
चाँद तन्हा है आसमं तन्हा
दिल मिला हैं कहाँ कहाँ तनहा
ज़िंदगी क्या इसी को कहते हैं
जिस्म तन्हा है जां तन्हा

Saturday, April 19, 2008

आगे भी जाने न तू पीछे भी न जाने तू ,जो भी बस यही एक पल है

आज कल सुबह जब भी अखबार उठाओ तो एक ख़बर जैसे अखबार की जरुरत बन गई है कि फलानी जगह पर इस बन्दे या बंदी ने आत्महत्या कर ली ..क्यों है आखिर जिंदगी में इतना तनाव या अब जान देना बहुत सरल हो गया है ..पेपर में अच्छे नंबर नही आए तो दे दी जान ...प्रेमिका नही मिली तो दे दी जान ...अब तो लगता है जिस तरह से महंगाई बढ़ रही है लोग इसी तनाव में आ कर इस रेशो को और न बड़ा दे ...कल एक किताब में एक कहानी पढी इसी विषय पर लगा आप सब के साथ इसको शेयर करूँ ..एक नाम कोई भी ले लेते हैं ...राम या श्याम क्यूंकि समस्या नाम देख कर नही आती ..और होंसला भी नाम देख कर अपनी हिम्मत नही खोता है .खैर ...राम की पत्नी की अचानक मृत्यु हो गई और पीछे छोड़ गई वह बिखरी हुई ज़िंदगी और दो नन्ही मासूम बच्चियां ..सँभालने वाला कोई था नही नौकरी पर जाना जरुरी .और पीछे से कौन बच्चियों को संभाले ..वेतन इतना कम कि आया नही रखी जा सकती . और आया रख भी ली कौन सी विश्वास वाली होगी ..रिश्तेदार में दूर दूर तक कोई ऐसा नही था जो यह सब संभाल पाता..क्या करू .इसी सोच में एक दिन सोचा कि इस तरह तनाव में नही जीया जायेगा ज़िंदगी को ही छुट्टी देते हैं ..बाज़ार से ले आया चूहा मार दवा ..और साथ में सल्फास की गोलियां भी ...अपने साथ साथ उस मासूम की ज़िंदगी का भी अंत करके की सोची ..परन्तु मरने से पहले सोचा कि आज का दिन चलो भरपूर जीया जाए सो अच्छे से ख़ुद भी नहा धो कर तैयार हुए और बच्चियों को भी किया ...सोचा की पहले एक अच्छी सी पिक्चर देखेंगे फ़िर अच्छे से होटल में खाना खा कर साथ में इन गोलियों के साथ ज़िंदगी का अंत भी कर देंगे ...

सड़क क्रॉस कर ही रहे थे एक भिखारी देखा जो कोढी था हाथ पैर गलते हुए फ़िर भी भीख मांग रहा था .इसकी ज़िंदगी कितनी नरक वाली है फ़िर भी जीए जा रहा है ऑर जीने की किस उम्मीद पर यह भीख मांग रहा है .? कौन सा इसका सपना है जो इसको जीने पर मजबूर कर रहा है ? क्या है इसके पास आखिर ? फ़िर उसने अपने बारे में सोचा कि मूर्ख इंसान क्या नही है तेरे पास ..अच्छा स्वस्थ ,दो सुंदर बच्चे घर ..कमाई ...आगे बढे तो आसमान को छू ले लेकिन सिर्फ़ इसी लिए घबरा गया कि एक साथ तीन भूमिका निभा नही पा रहा है वह पिता .,अध्यापक ,ऑर माँ की भूमिका .निभाने से वह इतना तंग आ गया है कि आज वह अपने साथ इन दो मासूम जानों का भी अंत करने लगा है ..यही सोचते सोचते वह सिनेमाहाल में आ गया पिक्चर देखी उसने वहाँ ""वक्त ""'..और जैसे जैसे वह पिक्चर देखता गया उसके अन्दर का कायर इंसान मरता गया ..और जब वह सिनेमा देख के बाहर आया तो जिजीविषा से भरपूर एक साहसी मानव था जो अब ज़िंदगी के हर हालत का सामना कर सकता था ..उसने सोचा कि क्या यह पिक्चर मुझे कोई संदेश देने के लिए ख़ुद तक खींच लायी थी ..और वह कोढी क्या मेरा जीवन बचाने के लिए कोई संकेत और संदेश देने आया था ..उसने वह गोलियाँ नाली में बहा दी .और जीवन के हर उतार चढाव से लड़ने को तैयार हो गया
..जिंदगी जीने का नाम है मुश्किल न आए तो वह ज़िंदगी आखिर वह ज़िंदगी ही क्या है ..जीए भरपूर हर लम्हा जीए ..और तनाव को ख़ुद पर इस कदर हावी न होने दे कि वह आपकी सब जीने की उर्जा बहा के ले जाए ...क्यूंकि सही कहा है इस गीत में कि आगे भी जाने न तू पीछे भी न जाने तू ,जो भी बस यही एक पल है ..जीवन अनमोल है . इसको यूं न खत्म करे ..

Monday, February 11, 2008

फ़िर आया वसंत


सखी फ़िर आया वसंत
फ़िर से लिखा गया एक लफ्ज़ प्यार का
और रख दिया इसको बंद करके
दिल के किसी कोने में
जब आहट होगी फ़िर से किसी धड़कन की .
इस कोने से निकल से यह लफ्ज़
कुछ पल तो जीया जायेगा
ज़िंदगी का सफर है चंद लम्हों का
यह कुछ तो हसीन हो जायेगा !! [रंजू ]
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जी हाँ आ गया आज फ़िर से वसंत ,वसंत प्यार का उत्सव ,प्रकति का उत्सव ,यह बात और है कि आज इस साल अभी तक ठंड पूरे जोरों पर है ..पर शायद वसंत है आज ,यह सोचना दिल में एक अजब सी उमंग भर देता है ,भर देता है यह जीवन में जोश उमंग और आशा ..पूरे वातावरण में जाग उठती है एक नई प्रेरणा ...पर हमारी आज
की युवा पीढ़ी वसंत से ज्यादा वेलेंटाइन दिवस को ज्यादा पहचानती है ..यदि हम पीछे गुजरे अपने आतीत को देखे तो वसंत लाखों सालों से हमे प्रेम की प्रेरणा दे रहा है जबकि वेलेंटाइन का इतिहास कुछ साल ही पुराना है हमारा वसंत जहाँ हमे एक नव जीवन से भर देता है वहाँ वेलेंटाइन कि कहानी कुछ अजब सी है ....इसकी कहानी जो पढने में आती है कि रोम का राजा क्लाउडिस बहुत कठोर दिल का राजा था अपनी सेना में अनुशासन बना रहे इस के लिए आदेश दिया की कोई सेनिक विवाह नही करेगा ..सेंट वेलेंटाइन ने चुचाप शादी करवानी शुरू कर दी राजा ने उनके जेल में बंद कर दिया ...और एक दिन सेंट वेलेंटाइन ने जेल के अकेलेपन से उब कर जेलर की बेटी को एक ग्रीटिंग कार्ड दे कर अपने प्रेम का इजहार किया .तब से इसको मनाने की परम्परा चल पड़ी ..पर आज का प्यार उस गहराई को नही छू पाता ,आज प्यार का मतलब सिर्फ़ स्वार्थ रह गया है .इस में अब वो गहरी भावना नही दिखती है ..और प्यार के लिए सिर्फ़ एक ख़ास दिन की जरुरत नही है ..और न ही किसी पैमाने की .यह कहाँ कब कैसे हो जाए कौन जानता है ? हर किसी की पसंद अपनी और अपने विचार हैं इस बारे में ..प्यार में सागर सी गहराई है तो नदी से बहने का प्रवाह भी ...जीवन की सारी कठोरताओं ,मुसीबतों को झेल कर भी यदि प्रेम बना रहे तो वही प्रेम है ...प्रेम का काम है जोड़ना ,....तोड़ना नही . और यह इसी रूप में सुंदर लगता है ..वसंत का आगमन प्रतीक है नए उमंगो के खिलने का .और यह उमंग सकरात्मक रूप से रहे .वही अच्छा लगता है ..प्रेम के इस पावन पर्व वसंत का स्वागत .इमरोज़ जी की लिखी इन पंक्तियों से बेहतर और क्या हो सकता है .

सारे शब्द
सारे रंग
मिल कर भी
प्यार की तस्वीर
नहीं बना पाते
हाँ प्यार की तस्वीर
देखी जा सकती है
पल पल मोहब्बत जी रही
ज़िंदगी के आईने में !!

Saturday, January 12, 2008

-क्या मरने के बाद भी जीवन है ?



-क्या मरने के बाद भी जीवन है ? क्या कोई मरने के बाद भी यूं सेवा कर सकता है ? अभी कुछ दिन पहले यह लेख पढ़ा तो सोच में डूब गई क्या सच में आत्माओं का अस्तित्व होता है ? कहते हैं कि मरने के बाद भी जीवन है ,इसको अब झुठलाया नही जा सकता है ..इस के बारे में कई प्रमाण भी मिले हैं .उस के आधार पर यह कह सकते हैं कि मरने के बाद सब कुछ समाप्त नही हो जाता ,जीव चेतना का अस्तित्व बना रहता है और समय आने पर वह सहायता भी करते हैं और सीमा की रक्षा भी .ऐसी ही दो आत्माओं की गाथा पिछले दिनों पढने में आई ...इस में से एक केप्टन हरभजन सिंह की आत्मा थी और दूसरी जसवंत सिहं रावत की ..दोनों ही अशरीरी होते हुए भी सीमाओं की रक्षा में जुटे रहे !

केप्टन हरभजन सिंह पंजाब रेजिमेंट की २३ वी बटालियन के सिपाही थे .उनकी मृत्यु सिक्किम सिथ्त नाथुला में भारत -चीन सीमा पर तब हो गई थी ,जब वे अपने साथियों के साथ ड्यूटी पर थे और सीमा पर गश्त लगा रहे थे !उनकी मृत्यु ऐसे समय पर हुई जब वह अपने साथियों से कुछ पीछे रह गए और उन पर बर्फ की चट्टान गिर पड़ी ,वे उसी के नीचे दब गए उनके साथियों का कहना है कि जब कई दिन तक उनका कोई पता नहीं चला तो उनकी आत्मा ने सपने में आ कर अपने साथियों को बताया उसका शव अमुक स्थान पर बर्फ के नीचे चट्टान में दबा हुआ है उसके बाद ही उनकी खोज ख़बर ली गई और उनके बताये स्थान पर जब देखा गया तो उनका शव वहीं से मिला बाद में उसना अन्तिम संस्कार कर दिया गया ! जब उनकी मृत्यु हुई तब उनकी उम्र २६ साल की थी इसके बाद से लगातार उनकी आत्मा अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद थी ...बताते हैं कि सर्दी के दिनों में जब सिक्किम की चोटियां बर्फ से ढक जाती थी तब भी उनकी आत्मा वहाँ पर ड्यूटी देती देखी गई ! इसको चीनी गश्ती दलों ने भी देखा था और वह हैरान थे की मज्जा तक को ठिठुरा देने वाली इस ठंड में बिना गर्म कपडों के गश्त लगाने वाला यह भारतीय सिपाही कौन है ?बताया जाता है कि हरभजन की आत्मा ने अपने अधिकारियों को यह विश्वास दिला रखा था कि वह सीमा कि रक्षा कि चिंता छोड़ दे उस पर भरोसा रखे वह सीमा पर कोई भी गड़बड़ होने से ७० घंटे पहले सूचना दे देगा ,अधिकारियों ने अन्य सैनिकों की भांति हरभजन कि आत्मा को भी सारी सुविधा दे रखी थी सिपाहियों को वर्ष में २ महीने कि छुट्टी मिलती है तो हरभजन की आत्मा को भी इस से वंचित नही रखा जाता था !! छुट्टियों के दौरान सिलीगुड़ी एक्सप्रेस में उनके नाम की सीट बुक करवाई जाती .यात्रा वाले दिन उनका साथी उनका समान बर्थ के नीचे रख कर बर्थ पर उनका बिस्तर लगा देते उनकी वर्दी भी वही बर्थ के ऊपर टांग दी जाती ,यह सब करने के लिए एक सिपाही उनके साथ जाता था .....जालंधर स्टेशन आने पर उनका समान उतारा जाता और उन्हें उनके घर पहुँचाया जाता था... उनके परिवार को पूरा वेतन भी दिया जाता था और फ़िर बाद में पदोन्नति भी दी गई ,तभी वह एक सैनिक से केप्टन बने सके !
यह सिलसिला पिछले ३० सालों से चलता रहा ,बाद में उनकी आत्मा ने सेवानिरवती की इच्छा जाहिर की उनकी इस इच्छा को मान दिया गया बाद में ससम्मान उनकी विदाई भी की गई !!


इस से मिलती जुलती एक कहानी एक और भारतीय सैनिक जसवंत सिंह रावत की भी है ! वह सेना की चौथी गढ़वाल राईफल्समें सेवारत थे ! उनकी नियुक्ति अरुणाचल प्रदेश की नुरानांग चौकी पर हुई थी ! सन् १९६२ के चीन युद्ध के समय उन्होंने अकेले दम पर चीनियों को तीन दिन तक रोके रखा था ,बाद में जब उनको पता चला की एक अकेले भारतीय ने उन्हें तीन दिन तक रोके रखा तो वह गुस्से में उनका सिर काट के ले गए ! लड़ाई के बाद जब एक चीनी अधिकारी तो इस बात का पता चला तो उसने उनका कटा हुआ सिर लौटा दिया और साथ में एक पीतल की आवक्ष परितमा भी दी .वहाँ बाद में उसी जगह जहाँ उन्होंने प्राण त्यागे थे वहाँ उनकी समाधि बना दी गई आज वह स्थान बहादुर सैनिक के नाम पर जसवंत गढ़ कहलाता है .आज भी उनकी आत्मा वहाँ पर रात के सन्नाटे में गश्त लगाते देखी जाती है और जो अपनी ड्यूटी पर कोई आलस्य करते हैं उनको वह चांटा भी लगा देती है उनसे प्रेरित हो कर वहाँ हर सैनिक चुस्त दुरस्त रहता है उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया है !!

इस तरह की घटने वाली घटनाएं कई बार बहुत हैरानी में डाल देती है और हम सोचने पर मजबूर हो जाते हैं की क्या सच में मरने के बाद भी जीवन है और वह भी ऐसा की स्थूल शरीर की तरह देश की सेवा करता और बाकी लोगों की सहायता करता रहे ...अजब रंग है इस संसार के जो आज भी अपनी ऐसी बातों से हमको सोचने पर मजबूर कर देतें हैं !!
अखंड ज्योति में पढे गए एक लेख के आधार पर आधारित है यह लेख

Thursday, November 29, 2007

किसी की प्रेरणा जीवन को कैसे बदल देती है !!


हम कभी कभी किसी व्यक्ति से या किसी स्थान से बहुत प्रेरित हो जाते हैं और वह हमे जीवन में आगे बढ़ने कुछ करने के लिए उत्साहित करते हैं ..यही आगे बढ़ना किसी से कुछ प्रेरित हो के काम करना प्रेरणा कहलाता है इसका जीवन में बहुत ही मुख्य स्थान है .इस के बिना इंसान आगे नही बढ़ सकता इस के कारण ही कई महान काव्य ,पुस्तकों का और अविष्कारों का जन्म हुआ ,कोई प्रेरणा सामने हो तो व्यक्ति काम दिल लगा के करता है अपनी मंज़िल को पाने की कोशिश करता है और अतं में कामयाब होता है ,प्रेरणा कभी किसी से भी मिल स्काती है ..किसी व्यक्ति में यह जन्म जात होती है काम को करने की लगन कूट कूट के भारी होती है ,कभी हम प्रकति के विभिन्न रूप को देख के प्रेरित हो जाते हैं ,कभी किसी की नफ़रत ही हमे आगे बढने के लिए मजबूर कर देती है कि कुछ कर के दिखाना है यह समय पर है कि, कौन कब किस से प्रभावित हो जाए
-- जन्म से मिली प्रेरणा कई लोगों में होती है, ऐसे लोग बचपन से ही तेज़ बुद्धि के होते हैं यह लोग बचपन से ही सामान्य बच्चो से अलग काम करते हैं जैसे कोई बचपन से ही कविता लिखने लगता है ,कोई गणित में बहुत तेज़ बुद्धि का होता है ,कई बच्चे कई तरह के सवाल पूछते हैं और जब तक उचित जवाब नही पा लेते उस को पूछते रहतें हैं बदल बदल कर, जब तक उनकी ख़ुद की तस्सली नही हो जाती है वो स्कूल ज्ञान से काफ़ी आगे निकल जाते हैं और उस शिक्षा में अक्सर अपने को असहज पाते हैं ..जेम्स वाट का दिल बचपन में पढ़ाई में नही लगता था लेकिन आगे चल कर उन्होने भाप के इंजन का आविष्कार किया! आइन्स्टीन भी अपने अध्यापक से ऐसे ऐसे सवाल पूछते थे कि उनका जवाब देना मुश्किल हो जाता था !एडिसन भी प्रकति के रहस्य को जानने में ज्यादा रुचि रखते थे उनका कहना था कि एक बूँद प्रेरणा और 99 बूँद पसीना तब सफलता मिलती है जब उसको सच कर के भी दिखाया जाए !उनको बचपन से ही प्रकति से प्रेरणा मिली और उन्होने अविष्कार किए !हमारे देश के रविन्द्र नाथ टेगोर भी ऐसे ही थे वो स्कूल कि पढ़ाई में रुचि नही लेते थे पर उन्होने साहित्य में बहुत नाम कमाया और नोबल पुरूस्कार भी मिला .श्रीनिवास रामानुजम भी बचपन से ही गणित में बहुत आगे थे ऐसे लोगो में जन्मजात प्रेरणा होती है !कुन्दन लाल सहगल भी बिना किसी गुरु से ज्ञान लिए बिना इतना अच्छा गाते थे .लता मंगेशकर बचपन से आज तक गा रही है ..यह सभी में एक ईश्वर का दिया गुण है प्रेरणा हैं और जिसके पास ईश्वर की दी हुई प्रेरणा हो उन्हे कोई आगे बढ़ने से कैसे रोक सकता है !!

अब बात करते हैं प्यार से मिली प्रेरणा की जो किसी भी इंसान को किसी भी इंसान से किसी भी उम्र में दी जा सकती है ,कहा भी जाता है की किसी पुरुष की आसाधारण सफलता के पीछे किसी स्त्री का हाथ होता है किसी इंसान का प्यार किसी दूसरे इंसान में टॉनिक का काम करता है ,प्यार में ताक़त है जो बढ़े बढे काम को आसानी से पूरा करवा देती है ..यह प्यार किसी का भी हो सकता है भाई बहन .माता पिता प्रेमी प्रेमिका आदि किसी का भी ..

नफ़रत वाला व्यवहार भी किसी में प्रेरणा शक्ति का संचार कर देता है जैसे तुलसी दास का तिरिस्कार उनकी पत्नी न करती तो राम चरित मानस ना लिखी जाती .सूरदास जी के बारे में कहा जाता है कि वो बचपन से अंधे नही थे वरन किसी स्त्री के प्यार के कारण और उस से मिली नफ़रत के कारण उन्होने अपनी दोनो आँखे फोड़ ली थी जिस से वो केवल अपना ध्यान श्री कृष्णा में लगा सके और उन्होनें इसी से प्रेरित हो के महान काव्य रचना कर डाली !!


रचनात्मक प्रेरणा वो है जो किसी अन्य इंसान के कामों से प्रेरित हो के की जाती है किसी के काम को देख के अपना सोचने समझाने का अंदाज़ ही बदल जाता है और इंसान रचनात्मक काम करने लगता है परन्तु कई बार यह प्रेरणा बुरे काम से भी प्रभावित हो जाती है जैसे फ़िल्मे देख के लोग बुरा काम करने लगते हैं ,अपराधी बेईमान लोगो के काम से आज के अख़बार भरे हुए होते हैं ..सच में मानव के दिमाग़ का क्या भरोसा कब किस और चल पड़े !!

अब यह प्रेरणा का असर दिमाग़ में होता कैसे हैं शायद इंसान के अपने अंदर ही कोई ऐसी शक्ति है जो उसको ऐसा करने के लिए प्रेरित करती है हमारे मस्तिष्क का कोई न कोई भाग इस के लिए जिम्मेवार है जैसे किसी भी इंसान में स्मरण शक्ति के लिए आर एस ए {राईबोन्यूक्लिक एसिड } जिम्मेवार होता है जिस इंसान में इस रसायन की मात्रा जितनी अधिक होती है उसकी स्मरण शक्ति उतनी ज्यादा होती है! इसका मतलब है कि हमारे दिमाग़ में ही कोई ग्रंथि ऐसी है जो इस शक्ति का केन्द्र है जिस में यह ज्यादा है तो वो बचपन से ही सक्रिय होता है और बाक़ी मामलों में किसी बात या घटना से प्रभावित हो के यह आर एन ए रसायन शरीर में रक्त संचार को बढ़ा देता है, जिस से इंसान अपने अन्दर एक विशेष उर्जा महसूस करता है और प्रेरित हो के काम करता है जैसे किसी व्यक्ति को बचपन से साहित्य में रुचि है, किसी को विज्ञान में और किसी को संगीत में .यह अलग अलग से प्रभावित होने वाले यह रसायन भी हर दिमाग़ में अलग अलग होंगे !!
वैसे विज्ञान अभी यह पता लागने में असमर्थ है कि हमारे मस्तिष्क का कौन सा अंग इस के लिए जिम्मेवार है और यह भो हमे सही ढंग से मालूम नही कि कौन सी घटना कौन सी बात हमे किस बात के लिए प्रेरित करेगी! अब यूँ कहें कि हमारे दिमाग़ के रसायन को प्रभावित करेगी अगर यह पता चल जाए तो सारे बुरे सोचने वाले इंसानो को सुधारा जा स्कता है ..यह रसायन हमारे दिमाग़ में हर गतिविधि के जिम्मेवार है किसी रसायन की अधिकता या कमी हो जाती तो कोई विकार पैदा हो जाता है यह बात भी मज़ेदार है की यह रसायन भी अलग अलग होते हैं मस्तिष्क को ईश्वर द्वारा बनाया कंप्यूटर कहना जयदा अच्छा होगा यह सबसे अधिक संवेदन शील संभावना वाला होता है जिसके सोचने और समझने की शक्ति इंसान द्वारा बनाए कंप्यूटर की सीमा से ज्यादा होती है !यह उन काम को भी करता है जीने इंसान द्वारा बनाया कंप्यूटर ना कर सकता जैसे भावुकता ,अपनी मर्ज़ी से कही भी जाने की आज़ादी सपने देखना और किसी से प्रेरित होना . जब हम किसी की भाषण सुनते हैं तो उसकी वेश भूषा से ज्यादा उसके बोलने के तरीक़े से ज्यादा प्रभावित होते हैं उसके मन से अपने संबंध बना लेते हैं वैसे जिनके दिल साफ और निष्कपट होते हैं उनका प्रभाव भी देखने में ज्यादा आता है कोई भी संकेत यह लोग हमारे दिमाग की छटी इन्द्री तक पहुँचा देते हैं वैसे अभी बहुत कुछ खोजा जाना बाक़ी है इस विषय में ,तभी हम इस प्रेरित करने वाली घटना को अच्छे से समझ सकेंगे !!

Thursday, November 15, 2007

आपके द्वारा बनाए चित्र बताते हैं आपके दिल की बात




मानव मन चंचल होता है शान्त बैठना इसका स्वभाव नही है .हम कुछ भी करते वक़्त अक्सर सब कुछ ना कुछ यदि पेन और काग़ज़ सामने दिखे तो कुछ लिखते रहेंगे या कुछ चित्र बनाते रहेंगे ..बिना सोचे विचारे बात करते करते कभी यह चित्र बहुत ही मज़ेदार बन जाते हैं की आप ख़ुद ही तारीफ़ करने लगते हैं कभी कभी सिर्फ़ अपने नाम को अलग अलग ढंग से लिखने लगते हैं कभी फूल पत्ती या कोई जानवर की शकल बनाने लगते हैं ...यूँ ही बात करते करते बनाई इन आकृति को डूडल कहा जाता है ..कुछ दिन पहले इस पर बहुत ही रोचक लेख पढ़ा था .जब इसकी प्रद्शनी अमरीका के राष्ट्रपतियों के द्वारा बनाई गयी डूडल प्रद्शनी में लगाई गयी थी

इन चित्रो के बारे में मनोवैज्ञानिक कहते हैं की असल में यह आपके द्वारा बनाए गये चित्र आपकी अंदर चल रही मानसिक हलचल को बताते हैं .यदि आप पन्ने के बाई तरफ़ डूडल बना रहे हैं तो इसका मतलब है की आप ज्यादा किसी से घुलते मिलते नही है और अपने बीते समय के बारे में ज्यादा सोचते हैं ,यदि आप दाहिने तरफ़ ज्यादा लिख रहे हैं तो इसका मतलब है कि आप बहुत सोशल हैं और ज्यादातर अपने भविष्य के बारे में सोचते हैं बीच में डूडल बना रहे हैं तो आप सबका ध्यान अपनी तरफ़ खीचना चाहते हैं मनोवैज्ञानिकों ने डूडल को सिंबल बना के इस के आधार पर लोगो के दिल की बात बात बताने की कोशिश की है !यह माना जाता है कि महिलाए पुरुषों से ज्यादा डूडल बनाती हैं

अब बात है कि आप के बनाए डूडल क्या कहते हैं ??यदि आप नाव ,जहाज़ और कार बना रहे हैं तो इसका मतलब है कि आप एक लंबा अवकाश चाहते हैं और कही बाहर घूमना चाहते हैं ,यदि आप तीर के निशान बना रहे हैं और उसकी नोक ऊपर की तरफ़ है तो आप बहुत आगे बढ़ने की सोचते हैं ....आपके अंदर ज़िंदगी में कुछ कर गुज़रने की तीव्र इच्छा है और यदि तीर के निशान हर दिशा में बना रहे हैं तो इसका मतलब है कि आप खुले विचार वाले है

यदि आप स्टार यानी की तारे का निशान बना रहे हैं तो आप एक आदर्शवादी व्यक्ति है पाँच सितारे बनाना बताता है कि आप मह्त्वकंशी है ..!छ सितारे वाले चित्र बनाना आपके ध्यान की सिथ्ती को बताता है ,यदि आप बात करते करते या कुछ सोचते सोचते ख़ुद ही ज़ीरो कांटा का खेल खेलते हैं तो यह आपकी प्रतिस्पर्द्धि स्वभाव को बताता है

यदि आप आयताकार या त्रिभुज बना रहे हैं यानी कि ज्यामिती रचनाए बनाने लगते हैं तो यह आपकी सॉफ स्पष्ट सोच को बताता है ,सुंदर चेहरे बनाना आपके सामजिक स्वभाव के बारे में बताता है और यदि आप जानवर बना रहे हैं तो इसका मतलब है कि आप दूसरों को किसी मुसीबत से बाहर निकलना चाहते हैं

यदि आप दिल के निशान बना रहे हैं तो आप बहुत भावुक हैं और फूल बनाने का मतलब कि आप किसी को चाहते हैं और उसका ध्यान अपनी तरफ़ आकर्षित करना चाहते हैं और पत्ती बनाना आपके अंदर अपने पैसे के लिए दीवानेपन को बताता है ..

तो देखा आपने यह अनजाने में किया गया काम कैसे आपके स्वभाव और सोच को बता देता है ...अक्सर यह चित्र बनाना हम सब करते हैं .बात करते हुए किसी सोच में अनजाने में डूबे हुए या कुछ लिखते लिखते अनजाने में यह चित्र बनाने लगते हैं ...रोचक लगा मुझे इनके बारे में जानना क्यूंकि अक्सर जिज्ञासा होती है दिल में कि क्यों हम यह चित्र बनाने लगते हैं :) कुछ और रोचक जानकारी मिली इस विषय पर तो ज़रूर ले के आऊँगी फिर आपके सामने ..देखिए आपसे बात करते करते मैने कितने चाँद और सितारे बना डाले :)


::::::::::::::ranju:::::::::::
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Tuesday, August 07, 2007

नारी और प्रेम..........एक विचार



प्रेम के विषय में बहुत कुछ पढ़ा और समझा गया है ... प्रेम का नाम सोचते ही ...नारी का ध्यान ख़ुद ही आ जाता है ...क्यूँ की नारी और प्रेम को अलग करके देखा ही नही जाता|
मैने जितनी बार अमृता ज़ी को पढ़ा प्रेम का एक नया रूप दिखा नारी में और उनकी कुछ पंक्तियां
दिल को छू गयी|उनके लिखे एक नॉवल ""दीवारो के साए'' में शतरूपा .. की पंक्तियां नारी ओर प्रेम को सही ढंग से बताती हैं ...
औरत के लिए मर्द की मोहब्बत और मर्द के लिए औरत की मोहब्बत एक दरवाज़ा होती है और इसे दरवाज़े से गुज़र कर सारी दुनिया की लीला दिखाई देती | लेकिन मोहब्बत का यह दरवाज़ा जाने खुदा किस किस गर्दो_गुबार मैं खोया रहता है की बरसो नही मिलता, पूरी पूरी जवानी रोते हुए निकल जाती है तड़पते हुए यह दरवाज़ा अपनी ओर बुलाता भी है ओर मिलता भी नही...
प्यार का बीज जहाँ पनपता है मीलों तक विरह की ख़ुश्बू आती रहती है,............ यह भी एक हक़ीकत है की मोहब्बत का दरवाज़ा जब दिखाई देता है तो उस को हम किसी एक के नाम से बाँध देते हैं| पर उस नाम में कितने नाम मिले हुए होते हैं यह कोई नही जानता. शायद कुदरत भी भूल चुकी होती है की जिन धागो से उस एक नाम को बुनती है वो धागे कितने रंगो के हैं, कितने जन्मो के होते हैं.......
शिव का आधार तत्व हैं और शक्ति होने का आधार तत्व :..वो संकल्पहीन हो जाए तो एक रूप होते हैं . संकल्पशील हो जाए तो दो रूप होते हैं ,इस लिए वो दोनो तत्व हर रचना में होते हैं इंसानी काया में भी . कुदरत की और से उनकी एक सी अहमियत होती है इस लिए पूरे ब्रह्मड में छह राशियाँ पुरुष की होती है और छह राशियाँ स्त्री|
शतरूपा धरती की पहली स्त्री थी ठीक वैसे ही जैसे मनु पहला पुरुष था|ब्रह्मा ने आधे शरीर से मनु को जन्म दिया और आधे शरीर से शतरूपा को | मनु इंसानी नस्ल का पिता था,
और शतरूपा इंसानी नस्ल की माँ..|
अंतरमन की यात्रा यह दोनो करते हैं लेकिन रास्ते अलग अलग होते हैं मर्द एक हठ्योग तक जा सकता है और औरत प्रेम की गहराई में उतर सकती है ...साधना एक विधि होती है लेकिन प्रेम की कोई विधि नही होती ,इस लिए मठ और महज़ब ज्यदातर मर्द बनाता है औरत नही चलाती|
लोगो के मन में कई बार यह सवाल उठा की बुद्ध और महावीर जैसे आत्मिक पुरुषों अपनी अपनी साधना विधि में औरत को लेने से इनकार क्यूं किया ? इस प्रश्न की गहराई में उतर कर रजनीश ज़ी ने कहा ..
बुद्ध का सन्यास पुरुष का सन्यास है , घर छोड़ कर जंगल को जाने वाला सन्यास ,जो स्त्री के सहज मन को जानते थे कि उसका होना जंगल को भी घर बना देगा ! इसी तरह महवीर जानते थे कि स्त्री होना एक बहुत बड़ी घटना है..उसने प्रेम की राह से मुक्त होना है साधना की राह से नही , उसका होना उनका ध्यान का रास्ता बदल देगा |
वह तो महावीर की मूर्ति से भी प्रेम करने लगेगी ... उसकी आरती करेगी हाथो में फूल ले ले कर उसके दिल में जगह बना लेगी ,उसके मन का कमल प्रेम में खिलता है ....ध्यान साधना में बहुत कम खिल पाता है|
उन्ही की लिखी कविता एक कविता है जो प्रेम के रूप को उँचाई तक पहुँचा देती है

आसमान जब भी रात का
रोशनी का रिश्ता जोड़ते हैं,
सितारे मुबारकबाद देते हैं
मैं सोचती हूँ, अगर कही ...........
मैं , जो तेरी कुछ नही लगती

जिस रात के होंठो ने कभी
सपने का माथा चूमा था
सोच के पैंरों में उस रात से
एक पायल बज रही है,

तेरे दिल की एक खिड़की ,
जब कही बज उठती है,
सोचती हूँ , मेरे सवाल की
यह कैसी ज़रूरत है !

हथेलियों पर इश्क़ की
मेहंदी का कोई दावा नही
हिज़रे का एक रंग है ,
और
तेरे ज़िक्र की एक ख़ुश्बू


मैं जो तेरी कुछ नही लगती !!!!!!