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Thursday, April 24, 2008

उलझन ....

ईश्वर ने जब रचा यह संसार
तब शायद बनाया
ज़मीन को एक किताब
चाँद सितारों की जिल्द
से उसको सजा कर
फूलों और नज़ारों
से कुछ पन्ने लिख डाले
वही उस किताब में ही
लिखे कुछ बेकारी और
जुल्म के किस्से
और ....
कई अनचाहे दर्द भर डाले
अब यह उस किताब में लिखी
कोई सच्ची कहानी है
या खुदा की लिखावट
से छूटी हुई कुछ गलतियां ??

Tuesday, December 04, 2007

ज़िंदगी


ज़िंदगी कभी तू भी मुझे अपनो की तरह मिल
किसी ग़ैर की तरह क्यों सताती है मुझे
रोता है दिल मेरा तेरी बेरूख़ी देख कर
तेरी हर बात आज रुलाती हैं मुझे,

कभी थामा था दामन हमने ख़ुशी का
कभी हमने भी खिलते गुलो को देखा था
कभी मुस्कराया था जीवन मेरा भी
कभी हमने भी प्यार का मौसम देखा था

आज क्यों हर बात लगती है सपना
किसी किस्से सी तू नज़र आती है मुझे
यूँ ना दिखा संगदिली अपनी ऐ ज़िंदगी
कि अब मौत भी ठुकराती है मुझे

ज़िंदगी कभी तू भी मुझे अपनो की तरह मिल
किसी ग़ैर की तरह क्यों सताती है मुझे!!

Saturday, April 28, 2007

ख्वाबो की हक़ीकत



1.तुम भी भावनाओ मैं जीते हो,
इसका अहसास तब हुआ मुझको.
जब गीने दिन तुमने हमारी मुलाक़ातो के,
प्यार के, बातो के, और उन सपनो के...
जो सच नही होने थे शायद..............?
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2,यह पत्थरो का शहर हैं यहाँ ख्वाबो को तलाश मत करना
होंठो पर खिलते गुलाब देख कर कोई पेगाम ख़ुशी का ना समझ लेना
सिर्फ़ झूठी तसलियो में यहाँ कटती है ज़िंदगी हर किसी की
आईना है हर चेहरा यहाँ किसी की आँखो में भी झाँक लेना !!
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3. जो बात ज़ुबान से कही ना जाए
वह आँखो से बयान होती है

एक पल भी मिले कोई सकुन की छाँव इस दिल को
उस पल में ख्वाबो की हक़ीकत मालूम होती है

क्यूं उदास उदास सा है यह समा आज भी
मेरे दर्द की दास्तान क्यूं ऐसे मशहूर होती है !!
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4.मुझे कब चाह थी की मुझे यह चाँद मिले आसमान मिले
बस एक तमन्ना रही की मुझे मेरे सपनो का जहाँ मिले

जीए हम अपनी ज़िंदगी को कुछ ऐसे भी कभी कभी
कही ग़म के साये तो कही राही ही अनजान मिले

रंज़- ओ ग़म की रात कटती ही नही है मेरी
अब तो देखने को मेरी इन सूनी आँखो को हसीन ख़वाब मिले!!
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5. कब गुज़रा था दिन कब रात बीत गयी
बात दिल की थी दिल से हो कर गुज़र गयी

मंज़िल तलाशते रहे हम उमर भर
मुलाक़ात से पहले ही बात जुदाई की हो गयी

तलाशते रहे हम ख़ुशी को उमर भर
ख़ाली ख़ाली यह नज़र वापस मुझ तक ही लौट गयी

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6. निकले थे घर से अपनी प्यास बुझाने के लिए
ले के किसी समुंदर का पता
पर कभी उसके साहिल तक को छू भी ना पाए
हाथ में आई सिर्फ़ रेत मेरे
और लबो पर आज तक है अनबुझी किसी प्यास के साये !!
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Wednesday, April 04, 2007

एक दर्द




दिल मेरा बन के बंज़ारा कहाँ कहाँ से ना गुज़रा
हर एक रिश्ता ज़िंदगी का एक दास्तान बन के गुज़रा

आती रही हिचकियाँ हमे तमाम रात
दिल में फिर से किसी का याद का बादल था उतरा

फिर से बहलया हमने अपने दिल को दे के झूठी तसलियाँ
पर यह किसा भी सिर्फ़ मासूम दिल को बहलाने का सबब निकाला

ना मिलेगा सकुन कभी मेरी इस भटकती रूह को
जो भी गुज़रा मेरे दिल कि गली से एक दर्द नया दे के गुज़रा !!