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Wednesday, September 05, 2007

तिलिस्म



चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी



हर इंसान जीता है अपने ही बनाये तिलिस्म में
और बुन लेता है जाने अनजाने कितने सपने
रंग भर के इन में अपने ही मन चाहे
वो एक ख्वाबों की दुनिया बसा लेता है
नही तोड़ पाता वह ख़ुद के बुने इस जाल को
कोई तीसरा इंसान ही उसे इस ख़्वाब से जगाता है
और फ़िर एक खामोशी सी फ़ैल जाती है जहाँ में
जहाँ ना कोई आता है और ना ही फ़िर कोई जाता है
जिन्दगी की शाम ढलने लगती है फ़िर तनहा-तनहा
और बीते सायों का लबादा पहने वक्त
हमे यूं ही कभी डराता है कभी बहकाता है !!

Sunday, August 26, 2007

एक धागा प्यार का


ज़िंदगी पल-पल करके ढलती रही......
बस अपने रंग रूप बदलती रही..........
और उन्ही बीतते पलों का हुआ कुछ ऐसा सिला........
कि मेरा मासूम दिल तुझसे जा मिला.........

इस दिल ने प्यार का ,भावनाओं का ,सपनो का एक जाल बुना.....
जिस का एक सिरा था मेरे पास दूसरा तेरे दिल से जा मिला.........

अब यदि तेरे दिल में भी प्यार सच्चा है......
तो पकड़ के खीच लो इस धागे को........
मैं ख़ुद ही खीची चली आऊंगी

यदि छोड़ दिया तूने इस धागे को......
तो मैं इस धागे में उलझ कर रह जाऊंगी .......
फिर तुम इस धागे को सुलझाना भी चाहोगे.......
तो भी सुलझा नही पाओगे.........
क्यों कि इस धागे की उलझन में
कई नये रिश्ते ,कई नयी गाँठे पाओगे........
करना चाहोगे तब प्यार मुझे पर कर नही पाओगे........

अभी मेरा प्यार सीधा, सच्चा, मासूम है........
नही निभेगा अगर तुमसे तो अपना सिरा भी मुझे लौटा दो......
मैं अपने प्यार के धागे को यूँ ही नही उलझने दूँगी......
तुमसे जुड़ी अपनी हसीं भावनाओं, जज़्बातों को यूँ ही नही खोने दूँगी...........

करती हू तुमसे वादा की.........
मेरे तरफ़ के सिरे में तेरे लिए यही लिपटा हुआ बस प्यार होगा........
तू चाहे वापस आए ना आए.........
इस धागे मैं मेरी अंतिम साँस तक बस तेरा नाम होगा..........

पर.........बस एक सवाल पूछती हूँ तुझसे....
तेरी तरफ़ जो सिरा है.......
क्या इस पर तब भी मेरा नाम होगा?
मेरे लिए यही हसीन जज़्बात,प्यार
और बाक़ी बची ज़िंदगी को , निभाने का साथ होगा.........?

Monday, April 16, 2007

क्या कभी ??????????


क्या कभी शीशे के उस पार झाँक कर देखा है तुमने
क्या कभी ख़ुद क अंदर जलते हुए ख़ावाबो को देखा है तुमने


क्या कभी हँसते हुए की आँखो में आँसू देखा है तुमने
क्या कभी पानी से जलते हुए शूलो को देखा है तुमने


क्या कभी बादलो में छुपे हुए अरमानो को देखा है तुमने
क्या कभी सोते बच्चे की बंद मुट्ठी को देखा है तुमने

क्या कभी कानो में तुमको सादा सुनाई दी है किसी दिल
क्या कभी इन मेहफ़ीलो में तन्हा पड़े हुए फूलो को देखा है तुमने
क्या कभी हाँ ,अब बोलो क्या कभी इस दिल की आँखो से मुझको देखा है तुमने????

Wednesday, March 14, 2007

उनके बिना ****


दिन वीराना था ,रात मेरी सुनसान थी
बोझील सी बह रही कुछ हवा भी आज थी

दिल को यह ज़िद थी की तू आ जाए ख्वाबो में
और आँखो में तेरे बिना नींद न आने की आस थी

देर तक आँखो में चुभती रही तारों की रोशनी
न तुम आए न ही मेरे पास ख़वाबों की बारात थी

सुलगता रहा मेरा तन-मन तेरी यादों से
तरस गया दिल तेरे एक झलक को, बस इतनी सी बात थी

बहुत दूर से एक आवाज़ देती रही सदा मुझको
शायद यह मेरी रूठी हुई नींदों की बरसात थी!!


ranju

Monday, January 29, 2007

यादो के साए ******


कुछ यादो के झूरमूट से साए हैं
जो तेरी बातो से दिल में उतर आए हैं
इनको जगाना ना था तूने अपनी कड़वी बातो से
यह गुज़रे पल हमको अक्सर रुलाए हैं

जब भी हाथ बढ़ाया है इन्हे समेटने के लिए
मेरे दिल में अक्सर छाले से उभर आए हैं
कहा था तुमने की ज़िंदगी का सच बता रहा हूँ मैं
पर मेरे दिल को सिर्फ़ ख्वाबो के साए ही भाए हैं

अब जो जगा दिया तुमने अपनी बातो से इन को
तो मेरे दिल में कई सवाल से उभर आए हैं
क्यूं बुना अपने आस पास इन बेदर्द रिश्ते का जाल
जिसे लोग प्यार शब्द कह कर बुलाते आए हैं