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Thursday, September 01, 2011

यूँ दिल के एहसासो को

 
 
 
 
यूँ  दिल के एहसासों  को गीतो में ढाल लूंगी
मिली थी जब तुमसे उस पल को बाँध लूंगी


वक़्त की रफ़्तार थमने ना पाए अब
इन जीवन की उलझनो में कुछ सुलझने सँवार लूंगी

लावे सी पिघल कर बह क्यों  नही जाती है यह ख़ामोशी
ख़ुद को ख़ुद में समेटे कब तक यूँ तन्हा मैं चलूंगी

कुछ सवाल हैं सुलगते हुए आज भी हमारे दरमियाँ
कुछ दर्द ,कुछ आहें दे के इनको फिर से दुलार लूंगी

दे दिया अपना सब कुछ तुझे तन भी और मन भी
अब कौन सी कोशिश से अपने बिखरे वजूद को निखार लूंगी

काटता नही यह सफ़र अब यूँ ही बेवजहा गुज़रता हुआ
एक दास्तान फिर से तुझसे ,अपने प्यार की माँग लूंगी!!

मत बांधो प्यार को किसी रिश्ते की सीमाओं में
बस एक तेरे नाम पर अपना यह जीवन गुज़ार लूंगी

बहुत थक चुकी हूँ अब कही तो सकुन की छावँ मिले
अपने इन रतज़गॉं को अब तेरे सपनो से बुहार लूंगी !!
 

Tuesday, May 05, 2009

अधूरी ज़िन्दगी ....


ज़िंदगी को पूरी तरह से जीने की कला
भला किसे आती है ?
कहीं ना कहीं हर किसी की ज़िंदगी में ,
कोई न कोई तो कमी रह जाती है ....

प्यार का गीत गुनगुनाता है हर कोई,
दिल की आवाज़ो का तराना सुनता है हर कोई
आसमान पर बने इन रिश्तो को निभाता है हर कोई.
फिर भी हर चेहरे पर वो ख़ुशी क्यों नही नज़र आती है
पूरा प्यार पाने में कुछ तो कमी रह जाती है
हर ज़िन्दगी अधूरी सी नजर आती है .....

दिल से जब निकलती है कविता
पूरी ही नज़र आती है
पर कागजों पर बिछते ही..........
वह क्यों अधूरी सी हो जाती है
शब्दो के जाल में भावनाएँ उलझ सी जाती हैं
प्यार ,किस्से. कविता .कहानी ..
यह
सिर्फ़ दिल को ही तो बहलाती हैं
अपनी बात समझाने में कुछ तो कमी रह जाती है

हर किसी की निगाहें मुझे क्यों ......
किसी नयी चीज़ो को तलाशती नज़र आती हैं
सब कुछ पा कर भी एक प्यास सी क्यों रह जाती है
ज़िंदगी में कही ना कही कुछ तो कमी रह जाती है
संपूर्ण जीवन जीने की कला भला किसे आती है ???

रंजना ( रंजू ) भाटिया २६ . .००७

Tuesday, February 17, 2009

इश्क़ की महक


आज फिर से मेरी जान पर बन आई है
बाँसुरी किसने फिर यमुना के तीर पर बजाई है


खिलने लगा है फिर से मेरे चेहरे का नूर
फिर से कोई तस्वीर दिल के आईने में उतर आई है

पिघलने लगा है फिर से दिल का कोई सर्द कोना
कोई याद फिर मोहब्बत का लिबास पहन आई है

महकने लगा है फिर से कोई टेसू का फूल
यह ख़ुश्बू शायद किसी ख़्याल से आई है

लिखते लिखते लफ्ज़ बन गये हैं अफ़साना
उनकी आँखो ने कुछ राज़ की बात यूँ बताई है

मत देख अब यूँ निगाहे बचा के मुझको तू
इश्क़ की महक कब छिपाने से छिप पाई है

Wednesday, November 19, 2008

इस सवाल का उत्तर कहाँ से पा लूँ ??

लम्हा दर लम्हा
बीत रही है जिंदगानी
सांसो के आवागमन से
मिले इसको रवानी
यूं ही साँसों की हलचल में
न जाने ...
कैसे तुम ज़िंदगी में आए
हवा के झोंको में बसे
मेरी हर धड़कन में
और नस -नस में समाये ..

बने वजह यूँ मेरे जीने की

जैसे भटके मुसाफिर को...
मिले कोई मंजिल का निशाँ
वक्त से कटे लम्हे को ...
फ़िर से मिले पनाह
और किसी भटकती रूह को
ख्यालो का तस्वुर दिख जाए ..

पर ....
जीने के लिए जरुरी है
साँसों का बाहर जाना

अब ...
सोच में है मेरा दिल
कैसे रूह में बसी साँसों से
तुम्हे मैं निकालूं
कैसे जीना है तुम बिन
इस सवाल का उत्तर कहाँ से पा लूँ ??


रंजू [रंजना] भाटिया

चित्र गूगल से

Sunday, August 24, 2008

प्रीत का गीत [राधा -कृष्ण ]

राधा कृष्णा को पल पल पुकारे
यादो के पल वो लगते हैं प्यारे
झुकी झुकी यह पलके. अब क्यूँ है छलके.
जब कृष्णा भी राधा- राधा पुकारे...


मन से मन का मेल यही है ,प्रीत ऐसे ही दिल में पले
राधा ने जब कृष्ण को देखा ,आँखो में सौ दीप जले...

पंक्तियाँ बहुत पहले मथुरा में कहीं दिवार पर लिखी पढ़ी थी और तभी एक कविता लिखी थी इन्ही पंक्तियों को सोच कर ।राधा कृष्ण का प्रेम आज भी हर दिल में एक उजाला भर देता है


मन से मन का मेल यही है ,प्रीत ऐसे ही दिल में पले
राधा ने जब कृष्ण को देखा ,आँखो में सौ दीप जले
होंठो पर ठहरी बातो को, नयनो की भाषा मिले

यूँ ही आँखो आँखो में प्यार की दास्तान बढे
राधा ने जब कृष्ण को देखा दिल में प्रीत के कमल खिले

सुन बंसी की लय कृष्णा की, राधा के दिल का फूल खिले
तेरे मेरे प्यार का गीत बस वैसे प्रीत की डगर चले
राधा ने जब कृष्ण को देखा संगीत प्यार का दिल में पाले

जिस एक राग को जल उठाते दोनो दिलो के दीपक
आज अपने मधुर मिलन में उसी राग का दौर चले

प्यास जो देखी थी उस दिन तेरे मीठे लबो पर
वही मीठी मीठी प्यास अब मेरे दिल में भी पाले
राधा ने जब कृष्णा को देखा मन में सौ दीप जले!!

२६ अगस्त २००६

Wednesday, August 13, 2008

दिल की रागिनी


हूँ तेरे साथ मैं आज ,
कुछ बहके हुए एहसासों से
छिपा ले मुझे बाँहों में सनम कि,
वक़्त कटे ना अब बातो से
तेरे ही सांसो से जुड़ी ,
मैं साथ तेरे हर पल चली हूँ
तेरे ही दिल की रागिनी बन के
आज मैं तेरे दिल से जुड़ी हूँ .......


दिल धड़क रहा है मेरा
आज कुछ नये अंदाज़ से
सीने में है कुछ मचले हुए जज़्बात से
नज़रो में एक मीठी सी कसक ले के जगी हूँ
तेरे नयनों में बन सपना ,मैं ही तो खिली हूँ
तेरे ही दिल की रागिनी बन के
आज में तेरे दिल से जुड़ी हूँ .......


रात है कुछ आज सुरमई महकी हुई ,
बहकी है यह मदमस्त हवा भी
कर ले तू भी नादानियां आज
दिल की बहकी फ़िज़ाओ से...
आज तेरे साथ मैं सब हदों को ..
पार करने की नीयत से खड़ी हूँ
बाँध ले आज अपने प्यार की डोर से सनम,
मैं इस पल के लिए दुनिया से लड़ी हूँ
तेरे ही दिल की रागिनी बन के
आज मैं तेरे दिल से जुड़ी हूँ ....

१३-०२ ०५

Friday, June 27, 2008

आवारा मौसम और अल्हड सी कविता


कभी कभी कैसे दिल होता है न ..कि बस कुछ न करो और पलटो पन्ने बीती जिंदगी के ....और बुनो उस से फ़िर कोई नया सपना .....कभी लगेगा कि बस आज का दिन है कर लो जितना काम करना है क्या पता अगली साँस आए या न आए ..कभी कभी यूँ हो जाता है की क्या जल्दी है अभी तो बहुत समय है जीना है बरसों ...:) दिल की यह आवारा बातें हैं जो शांत नही बैठने देती हैं ......खिड़की से बाहर देखती हूँ तो बारिश नटखट हो कर कभी लगता है बरस जायेगी .कभी यूँ शांत हो कर बैठ जाती है की जैसे किसी शैतान बच्चे को बाँध कर बिठा दिया गया है ....दिल भी आज यूँ इस मौसम सा ही हो रहा है ..खुराफाती दिमाग और इस आवारा मौसम से मासूम दिल का क्या ठिकाना किस और चल पड़े :) सोचा कि चलो आज डायरी की बजाये उन साइट्स को पढ़ा जाए जब नेट से दोस्ती हुई थी और लफ्जों की जुबान यूँ ही कुछ भी लिख देती थी .......मैं करती हूँ जब तक ख़ुद से बातें ..आप पढ़े यह एक अल्हड सी लिखी हुई कुछ पंक्तियाँ ...

जब चली यूँ सावन की हवा
दिल के तारों को कोई छेड़ गया
वक्त के सर्द हुए लम्हों को
फ़िर से तू रूह में बिखेर गया

इक नशा सा छाया नस नस में
जब तू नज़रो से बोल गया
रंग बिखरे इन्द्र धनुष से
जब तू बस के साँसों में डोल गया

इक मीठी सी कसक उठी
जब हुई खबर तेरे आने की
फूलों की खुशबु सा महक कर
मेरा अंग अंग कुछ बोल गया


12 july 2006

Thursday, April 24, 2008

उलझन ....

ईश्वर ने जब रचा यह संसार
तब शायद बनाया
ज़मीन को एक किताब
चाँद सितारों की जिल्द
से उसको सजा कर
फूलों और नज़ारों
से कुछ पन्ने लिख डाले
वही उस किताब में ही
लिखे कुछ बेकारी और
जुल्म के किस्से
और ....
कई अनचाहे दर्द भर डाले
अब यह उस किताब में लिखी
कोई सच्ची कहानी है
या खुदा की लिखावट
से छूटी हुई कुछ गलतियां ??

Saturday, March 08, 2008

डायरी के पुराने पन्नों से महिला दिवस की कुछ पंक्तियाँ




नन्हा फूल मुरझाया

गर्भ गुहा के भीतर एक ज़िंदगी मुस्कराई ,
नन्हे नन्हे हाथ पांव पसारे..........
और नन्हे होठों से फिर मुस्कराई ,
सोचने लगी की मैं बाहर कब आऊँगी ,
जिसके अंदर मैं रहती हूँ, उसको कब"माँ " कह कर बुलाऊँगी ,
कुछ बड़ी होकर उसके सुख -दुख की साथी बन जाऊँगी..
कभी "पिता" के कंधो पर झुमूंगी
कभी "दादा" की बाहों में झूल जाऊँगी
अपनी नन्ही नन्ही बातो से सबका मन बहलाऊँगी .......

नानी मुझसे कहानी कहेगी , दादी लोरी सुनाएगी,
बुआ, मासी तो मुझपे जैसे बलिहारी जाएँगी......
बेटी हूँ तो क्या हुआ काम वो कर जाऊँगी ,
सबका नाम रोशन करूंगी, घर का गौरव कहलाऊँगी ,

पर.......................................................................
यह क्या सुन कर मेरा नन्हा ह्रदय  कंपकपाया,
माँ का दिल कठोर हुआ कैसे,एक पिता यह फ़ैसला कैसे कर पाया,
"लड़की "हूँ ना इस लिए जन्म लेने से पहले ही नन्हा फूल मुरझाया ..!!!!!!!!!

june 18 ....2006

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देखा है अजब चलन इस समाज का......
बदले है अनेक रूप इस दुनिया के.........
पर "नारी' के अस्तित्व पर आज भी प्रश्न चिन्ह सा पाया है..........
दिया है इसी समाज ने कभी उसको.......
अख़बार के पहले पन्ने पर दिया है उसको सम्मान ,
पर वही पिछले पन्नों पर उसकी इज़्ज़त को उजड़ता पाया है.......
उसने जन्म दिया मर्दो को.........
और उन्होने उस को बाज़ार का रुख़ दिखाया है.................

कही पूजा गया है उसको लक्ष्मी के रूप में........
वही उसको जानवरो से भी कम कीमत में बिकता हुआ पाया है..........
इसी समाज ने दी है उसको कोख में कब्र.........
आज भी देखा है उसको द्रोपदी बनते हुए......
आज भी उसको कई अग्निपरीक्षाओं से गुज़रता हुआ पाया है............



संवारा है अपने हुनर से, अपने हसीन जज़्बातों से......
उसने हर मुकाम को.............
पर फिर भी इस समाज ने उसके हुनर को कम.......
और हुस्न को ज्यादा आजमाया है.........................


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एक छोटी सी कली की इच्छा

मुझे भी आँखो में एक सपना सजाने दो
कल्पना के पंख लगा के मुझे भी कुछ दूर उड़ जाने दो
मुझे भी बनाने दो अपना एक सुनहरा सा जहान
मेरे दिल की कोमलता को मत यूँ रस्मो में बाँध जाने दो
मत छिनो मुझे से मेरा वजूद यूँ कतार रिवाज़ो से
एक अपनी पहचान अब मुझे भी अपनी बनाने दो
छुना  है मुझे भी नभ में चमकते तारो को
एक चमकता सितारा .........
अब मुझे भी इस दुनिया में बन जाने दो !!

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मैं क्या हूँ ,यह सोचती खुद में डूबी हुई हूँ
मैं हूँ क्या ???
कोई डूबते सूरज की किरण
या आइने में बेबस सी कोई चुप्पी
या माँ की आंखों का कोई आँसू
या बाप के माथे की चिंता की लकीर
बस इस दुनिया के समुंदर में
कांपती हुई सी कोई किश्ती
जो हादसो की धरती पर
खुद की पहचान बनाते बनाते
एक दिन यूँ ही खत्म हो जाती हूँ
चाहे हो पंख मेरे उड़ने के कितने
फिर भी क्यों
कई जगह खुद को बेबस सा पाती हूँ ?
aug 10 2006

Wednesday, January 16, 2008

रेत से गीले पल


ज़िंदगी तो मिल जाती हैं सबको चाही या अनचाही
बीच में मिल जाते हैं ना जाने कितने अनजान राही

बिताते हैं कुछ पल वोह ज़िंदगी के साथ साथ
कुछ मीठे- कड़वे पलो की सौगाते दे जाते हैं

यह ज़िंदगी का खेल बस वक़्त के साथ यूँ ही चलता जाता है
बचपन जवानी में ,जवानी को बुढ़ापे में तब्दील कर जाता है

सब अपने सुख दुख समेटे इस ज़िंदगी को बस जीते जाते हैं
बह जाते हैं यह रेत से गीले पल फिर कब हाथ आते हैं !!
रंजू