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Thursday, May 29, 2008

वक्त और रिश्ता


कौन कहता है कि..
हो जाता है एक नज़र में प्यार
दो दिल न जाने कब एक साथ
धड़कने लगते हैं...
तोड़ लायेंगे चाँद सितारे
और बिछा देंगे फलक
क़दमों के नीचे
ऐसे सिरफिरे वायदे भी
कसमों की जुबान होते हैं,

पर सब खो जाता है
कुछ ही पलों में...
वो दर्द को छूने की कोशिश..
वो इंतज़ार के बेकली के लम्हे..
आंखो में सजते सपने..
आग का दरिया तक
पार करने का जनून
न जाने कहाँ चला जाता है ?

रह जाता है तो सिर्फ़
एक भोगा हुआ वक्त
जो दो जिस्मों
मैं बंट कर
सिर्फ़ ...एक
पिघला हुआ एहसास
रह जाता है !!

Friday, March 21, 2008

यह तो रंग सजना प्यार का है


छलक रहा है जो रंग नजरों से
यह तो रंग सजना प्यार का है

दिल में उठ रही हैं जो धीरे से हिलोरे
यह नशा सब फागुनी बयार का है

उड़ा के ले गया है चैन-औ-करार मेरा
आंखो में ख्वाब इन्द्रधनुषी बहार का है

पलकों में बंद है बस एक सूरत तेरी
छाया हुआ खुमार तेरे ही दुलार का है

निहारूँ हर पल मैं राह तुम्हारी
नयनों को इन्तजार तेरे दीदार का है

बिखरे है फिजा में जो रंग टेसू के
ऐसा ही सपना तेरे मेरे संसार का है !!

Wednesday, October 17, 2007

"'ढाई आखर प्रेम के [दूसरी कड़ी ]



प्रेम एकांत है
नाम नही
जब नाम बनता है
एकांत ख़त्म हो जाता है !!


प्रेम विषय पर लिखते लिखते मुझे यहाँ लव गुरु की उपाधि दे गयी है :) बहुत बड़ी उपाधि है यह
और मैं तो अभी प्रेम के ढाई आखर को समझने में लगी हूँ ...वैसे प्रेम ही एक ऐसी चीज़ है जिसको दोनो हाथो से लुटाओ वो उतना ही बढता जाता है ...इसी से जुड़ी अगली कड़ी "'ढाई आखर प्रेम के ''में कुछ और बाते प्रेम पर ....वैसे इस पर जितना लिखा जाए उतना कम है क्यूंकि यह विषय अपनी प्रकति, नाम के अनुसार इतना गहरा है की जितना इस में डूबेंगे उतना ही इसको समझ पाएँगे ....
जब यह हो जाए तो कहाँ देखता है उम्र ,,कहाँ देखता है जगहा ,और कहाँ अपने आस पास की दुनिया को देख पाता है बस डुबो देता है ख़ुद में और पंहुचा देता है उन ऊंचाई पर जहाँ कोई रूप धर लेता है मीरा का तो कही वो बदल जाता है रांझा में .....पर सच्चा प्रेम त्याग चाहता है ,बलिदान चाहता है उस में दर्द नही खुशी का भाव होना चाहिये
हम सभी ईश्वर से प्रेम करते हैं और साथ ही यह भी चाहते हैं की ज्यादा से ज्यादा लोग उस ईश्वर से प्रेम करें पूजा करें वहाँ पर हम ईश्वर पर अपना अधिकार नही जताते !हम सब प्रेमी है और उसका प्यार चाहते हैं परन्तु जब यही प्रेम किसी इंसान के साथ हो जाता है तो बस उस पर अपना पूर्ण अधिकार चाहते हैं और फिर ना सिर्फ़ अधिकार चाहते हैं बल्कि आगे तक बढ जाते हैं और फिर पैदा होती है शंका ..अविश्वास ...और यह दोनो बाते फिर खत्म कर देती हैं प्रेम को ...मीरा को कभी भी श्री कृष्णा और अपने प्यार पर कभी अविश्वास नही हुआ जबकि राधा को होता था अपने उसी प्रेम विश्वास के कारण कृष्णा को मीरा को लेने ख़ुद आना पड़ा प्रेम चाहता है सम्पूर्णता , मन का सम्पर्ण ,आत्मा का सम्पर्ण ....तन शाश्वत है .,.हमेशा नही रहेगा इसलिए तन से जुड़ा प्रेम भी शाश्वत नही रहता जिस प्रेम में अविश्वास है तो वह तन का प्रेम है वह मन से जुड़ा प्रेम नही है जिस प्रेम में शंका है वह अधिकार का प्रेम है........
कुछ समय पहले इस पर लिखी कुछ पंक्तियां थी ...

""जिन्दगी के सफर में चलते चलते तुम मिले
मिले तो थे तुम खुशबुओं के झोंको की तरह
लेकिन देह की परिभाषा पढ़ते पढ़ते
जाने कहाँ तुम गुम हो गए !
काश की इस रूह को छू पाते तुम
काश की इस रूह को महसूस कर पाते तुम
अगर छुआ होता तुमने रूह से रूह को
तो यह जीवन का मिलन कितना मधुर हो गया होता
पा जाता प्रेम भी अपनी सम्पूर्णता
यदि तुमने इसको सिर्फ़ दिल से रूह से महसूस किया होता !!""



फिर मिलूंगी आपसे .इस सुंदर विषय पर सुंदर बाते ले के !!


रंजना [रंजू]

Monday, July 02, 2007

मैं ख़्याल रखूँगी...


तुम प्यास की तरह मेरे लबों पे रहो..
मैं ख़याल रखूँगी की यह प्यास जगती रहे

बसे रहो मेरे दिल में सुरीला राग बन के
मैं ख़्याल रखूँगी यह धुन प्यार की बजती रहे

सजाओ मेरे आशियाँ को अपने ख्वाबो से
मैं ख़याल रखूँगी की यह रात सितारों सी चमकती रहे

प्यार की बरसती घटाओ को मुझ पे जम के बरसाओ
मैं ख़याल रखूँगी की यह सावन की रुत यूँ चलती रहे

ढल जाओ मेरे गीतो में प्यार का लफ्ज़ बन के तुम
मैं ख़्याल रखूँगी की एक आग इन लफ़्ज़ो में सुलगती रहे

कर दो अपनी पवन छुअन से मुझ पत्थर को पारस
मैं ख़्याल रखूँगी की धड़कनो में धुन तेरे नाम की बजती रहे

ज़िंदगी ना लगे कभी यूँ ही बेवजह सी जीती हुई सी
मैं ख़याल रखूँगी की जीने की आस दिल में पलती रहे

कब चल पाया है यह संसार नफ़रत की बातों से
मैं ख़्याल रखूँगी की प्यार की शमा दिल में जलती रहे !!

Friday, June 22, 2007

नारी एक प्रेम-व्यंजना




नारी है एक प्रेम-व्यंजना
उढ़ेलती जाती प्रेम रस को…
चढ़ा देती है अपने प्यार के पुष्प वो
देवता और इन्सान के चरणो में
छू लेती है जब वो कलम को
बन के सुंदर गीत प्रेम के,
विरह के निकल आते हैं
कविता में ढल के उस के बोल
बस प्रेम मय हो जाते हैं

चुनती है वह घर का आँगन
जहाँ सिर्फ़ प्रेम के बाग लहराते हैं
उड़ने के लिए चुनती है सिर्फ़ वही आकाश
जहाँ सिर्फ़ उसके सपने सज जाते हैं

गीत लिखती है वो वही सिर्फ़
जिसके बोल उसके पिया मन भाते हैं
प्रेम में स्त्री के दोनो जहाँ सिमट आते हैं
प्रेम में डूब कर कब रहता है उस को भान समय का
उसके शब्दकोष में बस प्यार के रहस्य ही समाते हैं

Monday, June 18, 2007

यह भीगा सा मौसम



सावन की यह भीगी सी बदरिया
बरसो जा के पिया की नगरिया

यहाँ ना आके हमको जलाओ
अपने बरसते पानी से यूँ शोले ना भड़काओ

उनके बिना मुझे कुछ नही भाये
सावन के झूले कौन झुलाये

बिजली चमक के हमे ना डराओ
बिन साजन के दिल मेरा कांप जाये

उलझा दिए हैं बरस के जो तुमने मेरे गेसू
उनको अब कौन अपने हाथो से सुलझाए

यह बिखरा सा काजल,यह चिपका सा आँचल
अब हम किसको अपनी आदओ से लुभायें

रुक जाओ आ बहती ठंडी हवाओं
तेरी चुभन से मेरा जिया और भी तड़प सा जाये

मत खनको बेरी कंगना,पायल
तुम्हारी खनक भी अब बिल्कुल ना सुहाये

सब कुछ सूना सूनाा है उनके बिना
मुझको यह बरसती बदरिया पिया के बिना बिल्कुल ना भाये!!

Saturday, April 28, 2007

ख्वाबो की हक़ीकत



1.तुम भी भावनाओ मैं जीते हो,
इसका अहसास तब हुआ मुझको.
जब गीने दिन तुमने हमारी मुलाक़ातो के,
प्यार के, बातो के, और उन सपनो के...
जो सच नही होने थे शायद..............?
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2,यह पत्थरो का शहर हैं यहाँ ख्वाबो को तलाश मत करना
होंठो पर खिलते गुलाब देख कर कोई पेगाम ख़ुशी का ना समझ लेना
सिर्फ़ झूठी तसलियो में यहाँ कटती है ज़िंदगी हर किसी की
आईना है हर चेहरा यहाँ किसी की आँखो में भी झाँक लेना !!
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3. जो बात ज़ुबान से कही ना जाए
वह आँखो से बयान होती है

एक पल भी मिले कोई सकुन की छाँव इस दिल को
उस पल में ख्वाबो की हक़ीकत मालूम होती है

क्यूं उदास उदास सा है यह समा आज भी
मेरे दर्द की दास्तान क्यूं ऐसे मशहूर होती है !!
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4.मुझे कब चाह थी की मुझे यह चाँद मिले आसमान मिले
बस एक तमन्ना रही की मुझे मेरे सपनो का जहाँ मिले

जीए हम अपनी ज़िंदगी को कुछ ऐसे भी कभी कभी
कही ग़म के साये तो कही राही ही अनजान मिले

रंज़- ओ ग़म की रात कटती ही नही है मेरी
अब तो देखने को मेरी इन सूनी आँखो को हसीन ख़वाब मिले!!
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5. कब गुज़रा था दिन कब रात बीत गयी
बात दिल की थी दिल से हो कर गुज़र गयी

मंज़िल तलाशते रहे हम उमर भर
मुलाक़ात से पहले ही बात जुदाई की हो गयी

तलाशते रहे हम ख़ुशी को उमर भर
ख़ाली ख़ाली यह नज़र वापस मुझ तक ही लौट गयी

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6. निकले थे घर से अपनी प्यास बुझाने के लिए
ले के किसी समुंदर का पता
पर कभी उसके साहिल तक को छू भी ना पाए
हाथ में आई सिर्फ़ रेत मेरे
और लबो पर आज तक है अनबुझी किसी प्यास के साये !!
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Thursday, February 01, 2007

अहसास


पेडो से जब पते गिरते है तो,
उसको:" पतझड़" कहते हैं
और जब नये फूल खिलते हैं तो,
उसको" वसंत कहते हैं
दूर मिलने का आभास लिए
जब धरती गगन मिलते हैं
तोह उसको "क्षितिज कहते हैं
पर
तेरा मेरा मिलना क्या है
इसे ना तो "वसंत,"
ना तो "पतझड़"
और ना "क्षितिज कहते हैं
यह तो सिर्फ़ एक अहसास है
अहसास
कुछ नही, एक पगडंडी है
तुमसे मुझे तक आती हुई,
मैं और तुम,
तुम और मैं
जिसके आगे शून्य है सब...................