Friday, October 25, 2013

क्षणिकाएं

कम्पोज़ की गोली वह बिचोलिया है जो अक्सर मेरी नींद और मेरे सपनो का मेल करवा देती है
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सो रही है रात
जाग रही आँखे
जैसे मंजिल से दूर बेनाम सा कोई रास्ता ............
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दिवार पर छेद करती ड्रिल मशीन
भुरभुरा कर गिरती लाल मिट्टी
न जाने क्यों एक सी लगी मुझे
तेरे और अपने होने की ....


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कैसे हो होती हैं पल पल मेरी ज़िन्दगी भी ठीक उस सांवली रात की तरह ..
 जो  सूरज से 
 मिलने की तड़प की इन्तजार में सिसक सिसक कर दम तोड़ देती है |

और यूँ ही उम्र तमाम होती जाती है भुरभुरा के दुःख सुख की परतों में


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