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Monday, March 24, 2014

चार पहर की बात ........

चार पहर की बात ........

सुबह ....

रोज़ होती सुबह
आँख खोलते ही
सामने आ कर मुस्कराती है
पकड़ा देती है
चाय की प्याली हाथ में
और नए अखबार की
बासी खबरों में गुम हो जाती है !!
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दोपहर

भरी उमंगों सी
ऊपर से जवान
अन्दर से बच्ची सी लगती है
सर्दी में भाये इसकी गर्माहट
गर्मी में यह आग उगलती
फेक्ट्री सी लगती है !!
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शाम
ढला सूरज
गोधुली का साया
दुनिया हुई उधर से इधर
आसमान को जैसे
किसी ने घूंट कोई
नशे का पिलाया !!
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रात
कभी काली
कभी मतवाली
कभी तन्हाई बेहिसाब
चाँद तारों की गिरह खोले
करके  दिल की हर बात !!

@ रंजू भाटिया

Friday, October 25, 2013

क्षणिकाएं

कम्पोज़ की गोली वह बिचोलिया है जो अक्सर मेरी नींद और मेरे सपनो का मेल करवा देती है
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सो रही है रात
जाग रही आँखे
जैसे मंजिल से दूर बेनाम सा कोई रास्ता ............
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दिवार पर छेद करती ड्रिल मशीन
भुरभुरा कर गिरती लाल मिट्टी
न जाने क्यों एक सी लगी मुझे
तेरे और अपने होने की ....


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कैसे हो होती हैं पल पल मेरी ज़िन्दगी भी ठीक उस सांवली रात की तरह ..
 जो  सूरज से 
 मिलने की तड़प की इन्तजार में सिसक सिसक कर दम तोड़ देती है |

और यूँ ही उम्र तमाम होती जाती है भुरभुरा के दुःख सुख की परतों में