Wednesday, July 04, 2012

बहाना जीने का

बीते कितने पल,
 लम्हे ज़िंदगी के
दिल के किसी तहखाने में क़ैद हैं
अभी भी वह अधलिखे पन्ने
कुछ अनमिटे से निशाँ
 पुरानी लाल डायरी के पन्नों पर 
यूं ही कुछ बिखरे लफ्ज़
जो आज भी जीवन के अक्स
को अपने आईने में दिखा जाते हैं

दबे हुए कुछ पुराने से किस्से
पक्की बनी इमारत में
आज भी किसी कच्ची मिटटी से
दरक कर अपनी आहट दे जाते हैं

बोझिल होती हुई हर पल साँसे
पर कहीं अभी भी दिल के कोने में
यौवन के मधुर निशाँ
और संजोये मीठे पलों की सौगाते
धड़क के दिल को जीने का संदेश दे जाते हैं

दबी हुई है बुझी राख में
अधलिखी  सी चिट्ठियां
और वह सूखे हुए गुलाब
आज भी
अपनी महक से प्रेम के हर पल को
जीवंत बना कर
एक और बहाना जीने का  दे जाते हैं .........
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