Tuesday, July 10, 2012

कहो सच है न ?

तुम्हे मैंने
जितना जाना
बूंद बूंद ही जाना
तुम वह नहीं ,
जो दिखते   थे ..,

तुम्हे जान कर भी
अनजान रही मैं ....
दो रूपों में ढले हुए तुम
एक वह जिसे मैंने ..
रचा अपनी कल्पनाओं में ...
अपनी कामनाओं में ..
अपनी इच्छाओं के साथ
बुना और चाहा शिद्दत से
और ....
एक तुम वह थे
जो थे अपनी ही राह के
चलते मुसफ़िर
ज़िन्दगी में जो
एक पल मिलते हैं
और
दूसरे पल
कहीं ख़ामोशी से
खो जाने का
एहसास करवाते हैं
पर ..............
कहीं यादो से दूर नहीं जा पाते हैं ..( कहो सच है न ?)



चित्र गूगल के सोजन्य से  
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