Saturday, March 08, 2008

डायरी के पुराने पन्नों से महिला दिवस की कुछ पंक्तियाँ




नन्हा फूल मुरझाया

गर्भ गुहा के भीतर एक ज़िंदगी मुस्कराई ,
नन्हे नन्हे हाथ पांव पसारे..........
और नन्हे होठों से फिर मुस्कराई ,
सोचने लगी की मैं बाहर कब आऊँगी ,
जिसके अंदर मैं रहती हूँ, उसको कब"माँ " कह कर बुलाऊँगी ,
कुछ बड़ी होकर उसके सुख -दुख की साथी बन जाऊँगी..
कभी "पिता" के कंधो पर झुमूंगी
कभी "दादा" की बाहों में झूल जाऊँगी
अपनी नन्ही नन्ही बातो से सबका मन बहलाऊँगी .......

नानी मुझसे कहानी कहेगी , दादी लोरी सुनाएगी,
बुआ, मासी तो मुझपे जैसे बलिहारी जाएँगी......
बेटी हूँ तो क्या हुआ काम वो कर जाऊँगी ,
सबका नाम रोशन करूंगी, घर का गौरव कहलाऊँगी ,

पर.......................................................................
यह क्या सुन कर मेरा नन्हा ह्रदय  कंपकपाया,
माँ का दिल कठोर हुआ कैसे,एक पिता यह फ़ैसला कैसे कर पाया,
"लड़की "हूँ ना इस लिए जन्म लेने से पहले ही नन्हा फूल मुरझाया ..!!!!!!!!!

june 18 ....2006

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देखा है अजब चलन इस समाज का......
बदले है अनेक रूप इस दुनिया के.........
पर "नारी' के अस्तित्व पर आज भी प्रश्न चिन्ह सा पाया है..........
दिया है इसी समाज ने कभी उसको.......
अख़बार के पहले पन्ने पर दिया है उसको सम्मान ,
पर वही पिछले पन्नों पर उसकी इज़्ज़त को उजड़ता पाया है.......
उसने जन्म दिया मर्दो को.........
और उन्होने उस को बाज़ार का रुख़ दिखाया है.................

कही पूजा गया है उसको लक्ष्मी के रूप में........
वही उसको जानवरो से भी कम कीमत में बिकता हुआ पाया है..........
इसी समाज ने दी है उसको कोख में कब्र.........
आज भी देखा है उसको द्रोपदी बनते हुए......
आज भी उसको कई अग्निपरीक्षाओं से गुज़रता हुआ पाया है............



संवारा है अपने हुनर से, अपने हसीन जज़्बातों से......
उसने हर मुकाम को.............
पर फिर भी इस समाज ने उसके हुनर को कम.......
और हुस्न को ज्यादा आजमाया है.........................


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एक छोटी सी कली की इच्छा

मुझे भी आँखो में एक सपना सजाने दो
कल्पना के पंख लगा के मुझे भी कुछ दूर उड़ जाने दो
मुझे भी बनाने दो अपना एक सुनहरा सा जहान
मेरे दिल की कोमलता को मत यूँ रस्मो में बाँध जाने दो
मत छिनो मुझे से मेरा वजूद यूँ कतार रिवाज़ो से
एक अपनी पहचान अब मुझे भी अपनी बनाने दो
छुना  है मुझे भी नभ में चमकते तारो को
एक चमकता सितारा .........
अब मुझे भी इस दुनिया में बन जाने दो !!

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मैं क्या हूँ ,यह सोचती खुद में डूबी हुई हूँ
मैं हूँ क्या ???
कोई डूबते सूरज की किरण
या आइने में बेबस सी कोई चुप्पी
या माँ की आंखों का कोई आँसू
या बाप के माथे की चिंता की लकीर
बस इस दुनिया के समुंदर में
कांपती हुई सी कोई किश्ती
जो हादसो की धरती पर
खुद की पहचान बनाते बनाते
एक दिन यूँ ही खत्म हो जाती हूँ
चाहे हो पंख मेरे उड़ने के कितने
फिर भी क्यों
कई जगह खुद को बेबस सा पाती हूँ ?
aug 10 2006

15 comments:

tanha kavi said...

रंजना जी!
सर्वप्रथम तो अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर आपको बहुत बहुत बधाईयाँ।

आपकी रचनाओं का संसार कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैला है। जहाँ आप बालिका-भ्रूण-हत्या की बात उठाती हैं , वहीं एक बालिका के दिल की बात को भी स्वर देती हैं, और वहीं दूसरी और अपनी शक्ति पहचाने का भी प्रयास करती है।

आपकी चारों रचनाएँ मुझे अच्छी लगीं, लेकिन पहली और चौथी ज्यादा बढिया लगीं।

बधाई स्वीकारें।

-विश्व दीपक ’तन्हा’

रश्मि प्रभा said...

रंजना जी,
सुबह से जेहन मे जाने कितने सच उमड़ रहे थे
सोचा.......महिला दिवस,क्या है फर्क आया?
आपने डायरी के पन्ने आज भी जीवंत हैं समाज मे
सत्य है"खुद की पहचान बनाते बनाते
एक दिन यूँ ही खत्म हो जाती हूँ"

amit said...

its realy related to our society and a majour problem ,,, realy ur thinking and KAVITA directaly hits 2 the person who fallowed the small thinkink like 'BHROON HATYA'
i like ur KAVITA too much,,,,realy
speciely 1st and also others

Sanjeet Tripathi said...

बात पते की!
महिला दिवस की शुभकामनाएं आपको!

राज भाटिय़ा said...

रंजना जी,आपकी रचनाएँ मुझे अच्छी लगीं.

mehek said...

sari kavitayen bahut sundar hai ranju ji,vishva mahila din ki badhai

Udan Tashtari said...

सुन्दर रचनायें...

विश्वमहिला दिवस पर शुभकामनायें..

GIRISH said...

Sabhi rachanaye ati sunder bani hai. Samayochit rachana aap ka pradan hai.

शोभा said...

रंजू जी
मज़ा आगया। इतनी सुन्दर रचनाएँ पढ़कर । महिला-दिवस की बहुत -बहुत शुभकामनाएँ । सस्नेह

Lavanyam - Antarman said...

सभी कवितायेँ भाव पूर्ण व आज की समस्या उजागर करती हुईं पसंद आयीं --
काश स्थितियां जल्द बदलें --
आज के दिन सभी महिलाओं को बहुत स्नेह व आदर , आपके संग देते खुशी हो रही है --

Priya said...

8th March International women's day .......Sirf Ek tareek ....Lekin isi bahane shayad vishva ki is srajanmayi ke liye wo khud aur log soche......aapki kavitao ne dil ko chua hai....Yahi dua hai...ki sabhi naariyon mein prakrtik tez, shakti, roop namrta, oj vidymaan rahe...

sangeeta swarup said...

आपकी नन्हा फूल मुरझाया पढ़ कर अपनी एक रचना याद आ गयी ..इसीसे मिलती जुलती है...रचयिता सृष्टि की....
आपकी ये रचना दिल को छू गयी

एनी सभी रचनाएँ नारी के अंतर्मन की विवशता को दर्शा रही हैं....मन के भावों को सुन्दर शब्दों में बाँधा है....

Navin said...

ये बहुत ही खेदजनक है की 21वी सदीमे भी पढे-लिखे(!) लोग भी ‘लडका’ है या ‘लडकी’ ये जाननेके लिये गर्भपरिक्षण कराते है.
-----
बेटी हु,
तो क्या इस दुनिया मे आ नहि शकती?
माता-पिता का प्यार पा नहि शकती?,
दोष मेरा क्या है अगर मै लडका नही
क्या मै तेरी इच्छा का फल नही?,
मै तेरे ही बाग का फूल, मा मुजे मत मार.

पुरा कव्य gagan-vihar.blogspot.com पर है.

Mera man vichar saghan said...

Ranjanaji,
Aap ki pichale varsh ki mahila divas par likhi kuch rachanaye padi jo aaj bhi prasangik he.Badlav ke liye kya prayas kiye jaye in par vichar karna hoga

Amita jain
Bhopal

Mera man vichar saghan said...

Ranjanaji,
Aap ki pichale varsh ki mahila divas par likhi kuch rachanaye padi jo aaj bhi prasangik he.Badlav ke liye kya prayas kiye jaye in par vichar karna hoga

Amita jain
Bhopal