Friday, March 14, 2008

सिर्फ़ कुछ नज्म हैं --अमृता प्रीतम

अमृता बचपन से अकेली पली बड़ी है ...जब वह मात्र दस साल की थी उनकी माँ का स्वर्गवास हो गया !उनका बचपन वैसा नही था जैसा एक आम बच्चे का होता है ....उनके पिता लेखक थे जो रात में लिखते और दिन में सोया करते थे ....घर में सिर्फ़ किताबे और किताबे ही थी जिनमें वह दब कर रह गई थी! कई बार उन्हें लगता था कि वह ख़ुद एक किताब है मगर कोरी किताब सो उन्होंने उसी कोरी किताब में लिखना शुरू कर दिया !

तब उनके पिता ने उनकी प्रतिभा को पहचाना उसको संवारा तुक और छन्द का ज्ञान करवाया उन्हें भगवान की प्रशंसा के गीत और इन्सान के दुःख दर्द की कहानी लिखने को प्रेरित किया वह चाहते थे कि अमृता मीरा बाई की तरह लिखे पर यह नही हो सका !

अमृता ने चाँद की परछाई में से निकल कर अपने लिए एक काल्पनिक प्रतिमा बना ली थी जिसे वह घंटो चाँद की परछाई में देखा करती थी उसका काल्पनिक नाम उन्होंने राजन रखा था ....ग्यारह साल की अमृता ने अपनी पहली प्रेम कविता उसी राजन के नाम लिखी जो उनेक पिता ने उनकी जेब में देख ली थी ,अमृता डर गई थी और यह नही कह पायी की कविता उन्होंने ही लिखी है ......पिता ने उनके मुहं पर थप्पड़ मारा इसलिए नही कि उन्होंने कविता लिखी इस लिए कि उन्होंने झूठ बोला था !

पर उनकी कविता कोई दोष न ले सकी कि उसने झूठ बोला और बिना रोक टोक के कविता उमड़ पड़ी और बहने लगी ....

पंजाब सरकार ने अमृता को लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से समानित किया !पंजाब प्रदेश के मुख्यमंत्री ख़ुद अमृता के घर उन्हें सम्मानित करने उनके घर पहुंचे...... अमृता अपने पीहर [पिता के घर से मिले ] सम्मान से बहुत भावुक हो गई थी और बहुत जज्बाती हो कर उन्होंने कहा कि बहूत साल बाद मेरे मायके वालों ने मुझे याद किया है पर इतनी देर कर दी कि अब मैं अपने पैरों पर खड़ी भी नही हो सकती ....इसका इस्तकबाल भी नही कर सकती हूँ ....

पीहर की याद उनके जहाँ में एक साथ उमड़ आई थी वह कुछ बोल नही पा रहीं थी उनके शब्दों में एक शिकायत थी कि उनके पिता के प्रदेश से उन्हें इतनी देर बाद पहचाना गया !!


अमृता प्रीतम
एक दर्द था -
जो सिगरेट की तरह
मैंने चुपचाप पिया है
सिर्फ़ कुछ नज्म हैं --
जो सिगरेट से मैंने
राख की तरह झाड़ी हैं !!

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मुद्दत से एक बात चली आती थी
कि वक्त की ताक़त रिश्वत देती
इतिहास से चोरी
इतिहास के पन्नों की खरीदती

वह जब भी चाहती रही
कुछ पंक्तियाँ बदलती
और कुछ मिटाती रहीं ,

इतिहास हँसता रहा
खीझता रहा ,
और हर इतिहास कार को
वह माफ़ करता रहा !

पर आज शायद
बहुत ही उदास है -----
एक हाथ उसकी जिल्द को उठा कर
कुछ पन्नों को फाड़ता
और उनकी जगह
कुछ और पन्ने सी रहा है
और इतिहास ---
चुपके से पन्नों से निकल कर
एक पेड़ के नीचे खड़ा
एक सिगरेट पी रहा है........

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