Wednesday, January 16, 2008

रेत से गीले पल


ज़िंदगी तो मिल जाती हैं सबको चाही या अनचाही
बीच में मिल जाते हैं ना जाने कितने अनजान राही

बिताते हैं कुछ पल वोह ज़िंदगी के साथ साथ
कुछ मीठे- कड़वे पलो की सौगाते दे जाते हैं

यह ज़िंदगी का खेल बस वक़्त के साथ यूँ ही चलता जाता है
बचपन जवानी में ,जवानी को बुढ़ापे में तब्दील कर जाता है

सब अपने सुख दुख समेटे इस ज़िंदगी को बस जीते जाते हैं
बह जाते हैं यह रेत से गीले पल फिर कब हाथ आते हैं !!
रंजू

2 comments:

राज भाटिय़ा said...

रंजु जी फ़िर यादे रह जाती हे,बहुत अच्छी कविता कही हे आप ने.

Asha Joglekar said...

रंजू जी, बहुत अचछी कविता पर हाथ से तो सूखी रेत फिसलती है न, गीली रेत तो फिर भी हाथ में चिपकी रह जाती है या आप शायद पाँव के नीचे से फिसलती हुई रेत का जिक्र कर रही हैं । पर बात आपकी सही है यह जिंदगी एक खेल ही तो है ।