Tuesday, August 21, 2007

प्रतीक्षा


छलकता रहा उनके अधरो पर एक प्यार का सागर
नज़रों में प्यास भर के हम बस उन्हे देखते रहे

तड़पता रहा दिल कोई फ़रियाद लिए मासूम सी
एक आचमन को बस लब मेरे तरसते ही रहे

खिल के बिखरती रही चाँदनी सब तरफ़ फिजा में
हम नजरों में उनकी प्यार की किरण तो तक़ते रहे

बूँदे स्वाती की सीपी में जा के मोती बनी
हम भी उनसे ऐसे मिलन को तरसते रहे

जलाते रहे दिल में प्यार की रोशनी
अपने तक़दीर के अंधेरो से यूँ लड़ते रहे

कई ख़वाब सजते रहे इन बंद पलको में मेरी
हम हर ख्वाब में उनसे मिलने को भटकते रहे

छलकता रहा उनके अधरो पर एक प्यार का सागर
और हम बस एक आचमन को तरसते ही रहे !!


रंजना
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