Monday, January 27, 2014

कौन बदलेगा इस सोच को??

 गर्भ गुहा के भीतर  एक ज़िंदगी मुस्कराई ,
नन्हे नन्हे हाथ पांव  पसारे..........
और फिर नन्हे होठों  से मुस्कराई  ,
लगी सोचने  कि " मैं बाहर कब आऊँगी , "
जिसके अंदर मैं रहती हूँ, उसको कब"माँ " कह कर बुला ऊँगी    ,
कुछ बड़ी होकर उसके सुख -दुख की साथी बन जाऊँगी..
कभी "पिता" के कंधो पर झुमूंगी  
कभी "दादा" की बाहों में झूल जाऊँगी 
अपनी नन्ही नन्ही बातो से सबका मन बहलाऊँगी  .......

नानी मुझसे कहानी कहेगी , दादी लोरी सुनाएगी,
बुआ, मासी तो मुझपे जैसे बलिहारी ही जाएँगी......
बेटी हूँ तो क्या हुआ काम वो कर जाऊँगी ,
सबका नाम रोशन करूंगी, घर का गौरव कहलाऊँगी  ,

पर............................
...........................................
यह क्या सुन कर मेरा नन्हा ह्रदय   कंपकपाया,
माँ का दिल  कठोर हुआ कैसे,एक पिता यह फ़ैसला कैसे कर पाया,
"लड़की "हूँ ना इस लिए जन्म लेने से पहले  ही नन्हा फूल मुरझाया ..!!!!!!!!!

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नन्ही  सी कली
खिली है
अभी अभी
बिखरेगी रंग
ज़िंदगी के कॅन्वस पर
और फिर
जीवन के नग्न  रहस्य
पहचान  कर
अंगारो पर चलने की कला
सीख  ही जायेगी  !!
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कई घंटे
प्रसव  पीड़ा सहने के बाद
बेटे  को जन्म दे के
माँ  ने ली
सुख की साँस
कही हो जाती बेटी  तो
ज़िंदगी भर ना जाने
कितनी बार सहनी पड़ती
प्रसव  पीड़ा के साथ
तानो की पीड़ा !! 


क्यों याद आयी मुझे अपनी लिखी यह रचनाये जो मैंने अपने लेखन के शुरू में लगभग बीस साल पहले लिखी थी क्यों कि यह सोच आज भी नहीं बदली है अफ़सोस आज भी लड़की  का जन्म लेना बहुत ख़ुशी नहीं देता आज भी लड़के और लड़की का फर्क जारी है । बहुत दुःख होता है आज भी यह सोच जारी है और न जाने क्यों कब तक जारी रहेगी । कौन बदलेगा इस सोच को और कब लड़की का जन्म लेना एक ख़ुशी का अवसर बनेगा ?सवाल जारी है जवाब मिलते नहीं  बस मिलती है तो यह सोच ओह!! लड़की हुई है :( 
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