Wednesday, November 27, 2013

मुड़े हुए पन्ने

ज़िन्दगी
जैसे एक "नज्म की किताब "
साथ साथ बैठे हुए
पढ़े लफ्ज़ बेहिसाब
और फिर ...
न जाने क्यों तुम
उसको अधूरा छोड़ के
चल दिए कहाँ ?
पर ...
उस नज्म के लफ्ज़
अभी भी पढ़े जाने की राह में
उसी मुड़े हुए पन्ने पर
अटके हुए  भटक रहे हैं ............

दर्द दे कर बिछुड़ते रहे हैं कुछ लोग ज़िन्दगी के इस सफ़र में ...पर यही लोग फिर ज़िन्दगी को सही मायनों में जीने के फलसफे भी समझा गए ....#रंजू भाटिया
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