Tuesday, November 19, 2013

बिखराव


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बिखराव

समेट रही हूँ
सहज रही हूँ
घर की हर बिखरी चीज को
पुराने फोटो
पुराना ,पर महंगा फर्नीचर
कभी घर के पूर्वजों को मिले
कई अवसरों पर मिले उपहार
यूँ ही बनी रहे इनकी चमक
साल दर साल
और गर्व करे आने वाली पीढ़ी
और घर में आया हर मेहमान
इस की चमक को खोना नही है
इस लिए लिए हर पहर इनको झाड़ पौंछ के
घर के हर कोने में सज़ा रही हूँ
यह चीजे चमक खो के भी
अपने अस्तित्व का एहसास करवा देती हैं
पर नही सहज पाती मैं
उन पुरानी किताबों से
वह धूमिल होते अक्षर
वह अमूल्य हमारी धरोहर
वो शब्द जो पहचान थे हमारी
सत्य ,प्रेम .उदारता और संवेदना
जैसे मेरे हाथो से सहजने की कोशिश में
पल दर पल दूर हुए जा रहे हैं
अपनी चमक खोये जा रहे हैं !!

7 comments:

sushma 'आहुति' said...

खुबसूरत अभिवयक्ति.....

expression said...

वाह...
बधाई.....
gift भी सुन्दर है...रचनाएं तो खैर लाजवाब होनी ही हुईं.

शुभकामनाएं..

अनु

सदा said...

वाह ... बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ...

Sunil Kumar said...

sundar atisundar, badhai ...

PoeticRebellion said...

Bahut Bahut Khoob

rahul misra said...

काफी सुंदर चित्रण ..... !!!
कभी हमारे ब्लॉग पर भी पधारे.....!!!

खामोशियाँ

मदन मोहन सक्सेना said...

बहुत सुन्दर पंक्तियाँ,ह्रदयस्पर्शी.आभार