Monday, November 11, 2013

कवितायें कभी लिखी नहीं जाती

कवितायें कभी लिखी नहीं जाती
वह तो जन्म लेतीं हैं
उस भूख से
जो मन के किसी
कोने में दबी हुई
कोई अतृप्त 
इच्छा है
या यह कोई
ऐसी भूख है जो
कहीं पनप रही है
आहिस्ता आहिस्ता
और उनको शांत  करने का
कोई माध्यम
 कहीं कोई
  नजर नहीं आता
वह फिर कलम से
बहती है आतुरता से
और  कहती अपनी बात
उन अनकही 
इच्छाओं से जो
अपनी बात कहने का
स्खलित होने का माध्यम        
तलाश कर लेती हैं
अपने ही किसी मन के द्वार से
पर रह जाती हैं
फिर भी अतृप्त  सी
और फिर उसको
कोई  शैतान  कोई खुराफात
कोई प्रेम आदि आदि
के लफ़्ज़ों में ढाल कर
अपनी बात कह देते हैं
 और..........
वही लिखा  हुआ
फिर कविता कहलाता है
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