Friday, May 31, 2013

नार्वे सपनो का देश |

सचमुच ज़िंदगी कैसी होती है होगी दुनिया के दूसरे हिस्सों में? कि ज़िंदगी का एक पल, एक घंटा, एक दिन वहाँ के माहौल में किस कद्र  बदल जाता होगा?...यह सोचने वाली बात है न ...पर आप हर जगह तो नहीं जा सकते इस उत्सुकता को बनाए रखती है पढ़ी गयी किताबें .मुझे यात्रा पर लिखी किताबें  व उस पर लिखे संस्मरण बहुत ही अधिक पसंद है और कुछ डूब कर उन को इस तरह से पढ़ती हूँ कि यदि वहां जा नहीं सकती तो उस जगह  पर खुद को मौजूद कर सकूं | ..नार्वे ..कुछ समय पहले पढ़ी गयी एक यात्रा पर किताब ..जिस में नार्वे के बारे में इतना कुछ लिखा था कि मुझे कुछ ऐसा लगा कि जैसे मैं वहां पर खुद ही मौजूद हूँ ...इस तरह से घूमने का यह शौक बहुत से लोगों को रहता है ..बहुत से लोग घर छोड़ कर घूमने निकल पड़ते हैं कुछ घर पर रह कर ही इस शौक को पूरा करते हैं और कुछ मेरी तरह है जो यूँ किताबों से या डिस्कवरी चेनल से दिखाए गए स्थानों पर घूम लेते हैं ...घूमने फिरने की इच्छा सभी में होती है..बस इस इच्छा को कैसे जगाये रखना है यह व्यक्ति पर खुद पर निर्भर है |क्या पता कब वहां  जाने का सपना सच हो  जाए |

             नार्वे का अर्थ होता है "नार्थ वे "यानी "उत्तरी  रास्ता "...जहाँ सफ़ेद भालू ,कुत्तो द्वारा खेंची जाने वाली स्लेज गाड़ियां | मैंने तो इतना पढा है नार्वे के बारे में कि मानसिक रूप से वहां हो आई हूँ लगता है ..जाने कब सच में जाना हो पर ज़िन्दगी में एक बार वहां जरुर जाना चाहूंगी स्पेशल "ओस्लो ."शायद पिछले जन्म का कोई नाता हो वहां से ...यहाँ एक विषय में पढ़ी गयी जानकारी के अनुसार दस हजार वर्ष पूर्व आदमी के पांव नार्वे की धरती पर पड़े थे | यहाँ के निवासी उदार स्वभाव के हैं सबकी सहायता में विश्वास रखते हैं |कुदरत ने यहाँ अदभुत व्यवस्था कर रखी है नार्वे में जहाँ इतनी सर्दी पड़ती है वहां नार्वे के सागर तटों में "गल्फ स्ट्रीम की धारा "भी बहती है जिस से किनारे का सागर जल जमता नहीं है और हर वक़्त यहाँ यातायात चलता रहता है |
                   नार्वे पर पढ़ी गयी जानकारी के अनुसार सबसे पहले जो स्थान मुझे पता चला वह था" टॉम्सो"..आकर्टिक सर्किल से सेंकडों मील अन्दर की तरह ..और जिसको "दुनिया की छत "भी कहा जाता है यही सुना है इस के बारे में ...कि यही से लैपलैंड शुरू होता है ..हमेशा बर्फ पर रहने वाले रेनडियर को पालने वाले घुमंतू का देश .यह उत्तरी नार्वे की  राजधानी है और यहाँ का विश्व विद्यालय दुनिया का एकमात्र विश्वविधालय है जो इतने धुर उत्तर में हैं | नार्वे में मछली पकड़ने का भी सबसे बड़ा केंद्र यहीं हैं | इस के आस पास के क्षेत्रों में आज भी आदिवासी लैप रहते हैं जो आज भी अपनी पुरानी परम्पराएं अब तक उसी तरह से निभा रहे हैं जैसे उनके पूर्वज निभाया करते थे | आज भी उनके कपडे वैसे ही रंग बिरंगे हैं जैसे सदियों पहले होते थे हाँ अब उनके घर यहाँ की सरकार ने बनवा दिए हैं वह अब तम्बू या बर्फ के घरों  में नहीं रहते हैं | यहाँ के बच्चे अब स्कूल जाते हैं| इनकी अपनी लैप भाषा है |यह लोग बहुत मेहनती ,सहनशील और मिलनसार होते हैं |
              फिर जाना "लिली हामेर" के बारे में जो लेखिका "सिगरी उनसत" की तपोभूमि रही है ..वहां पर कैसे कहाँ वह रहती थी उस के जानने के साथ जाना कि यहाँ का मौसम माहौल  उस वक़्त कैसा था और अब कैसा है पढ़ते ही वहां का मन हो कर उड़ने लगता है ...".हलके हलके सुरमई बादल .ठन्डी हवा .सूरज की पीली किरणें ,पीला प्रकाश ,पर कही गर्मी झलकती नहीं रात के दस बजे ,ग्यारह बजे भी सूरज ऐसे चमकता है बिना किसी गर्मी के ...यहाँ अँधेरा धुर्व प्रदेश के निकट होने के कारण बहुत कम दिखाई देता है दिन का दायरा इतना बड़ा हो जाता है कि रात सिमट कर बहुत छोटी हो जाती है ..न रात जैसी रात ..न दिन जैसा दिन ..यही यहाँ घूमने वालो के दिल में एक जनून जगा देता है घूमने का ..सारी सारी रात सारे सारे दिन यहाँ घूमा  जा सकता है ..".सिगरी उनसत "जिसे १९२८ में नोबल पुरस्कार मिला | उस ने नार्वे के मध्ययुगीन इतिहास का इतना गहरा अध्ययन किया था कि वह आसानी से बात सकती थी कि १३०० के आस पास किस तरह घास की मेजें साफ़ की जाती थी |.बर्फीली धरती पर लोग टूटी गाड़ियों की मरमम्त कैसे करते थे .अपनी रचनाओं में उसने इतना सजीव वर्णन किया है कि पढने वाला पाठक इस वक़्त को आसानी से पढ़ कर उस वक़्त में जी सकता है | ओस्लो के जीवन से निराश हो कर सिगरी उनसत किसी शांतिपूर्ण स्थान की तलाश में लिली हामेर पहुंची थी और उस वक़्त लिली हामेर ने सिगरी को शान्ति शक्ति ही नहीं बल्कि खूब लिखने की प्रेरणा भी दी थी |उत्तरी नार्वे के पर्वत देश के रहने वाले लोग जब भी दूसरे विश्वयुद्ध और १९४० के नाजी हमले को याद करते हैं तो इस महिला को जरुर याद करते हैं |नोबेल पुरस्कार से सम्मानित ,यह महिला नार्वे सरकार के सूचना विभाग में न्यूयार्क में कई वर्षों तक काम करती रही अपनी लिखी रचनाओं से इस ने नाजियों के विरुद्ध अपना संघर्ष जारी रखा और "नार्वे में बिताये स्वर्णिम दिन " भविष्य की  और वापसी "जैसी किताबे लिखी | पांच वर्ष बाद वह वापस लिली हामेर स्वाधीन नार्वे लौटी |आज भी उनका घर वैसे ही रखा गया है उनके कपडे ,उनकी पुस्तकें और उनकी दैनिक उपयोग की चीजें आज भी वैसे ही सरंक्षित रखी गयी है |
              नार्वे की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील" म्योसा "को देखने का दिल करता है ..जिसका पानी दर्पण की तरह साफ़ है और इसके अंत और छोर का कहीं पता नहीं चलता है ..नार्वे के वह घर देखने का दिल करता है जो पूरे के पूरे लकड़ी के बने होते हैं और यह घर सदियों तक साथ निभाते हैं ..यहाँ लकड़ी के तख्तों को जोड़ कर घर की दीवारे बनायी जाती है बीच बीच में सफ़ेद खिड़कियाँ ..और घरों के आगे झंडा फहराने के एक परम्परा दिखाई देती है यह लहराते झंडे दूर से ही एहसास करवाने लगते हैं कि यहाँ घर है और कोई रहता है ..यह लिली हामेर के बारे में पढ़ के घुमा गया जीवंत दृश्य है जो मेरी दिलो दिमाग में इसी तरह से छाया हुआ है|
              इस के बाद की मानसिक यात्रा "ओस्लो "..भू वैज्ञानिकों का कहना है कि लाखों वर्ष पहले ओस्लो ज्वालमुखी क्षेत्र था फिर बाद में वह धंस गया उस से ही बना फीयोर्ड यहाँ यह बहुत है |..यही के पास शहर है सीयन ...यह शहर बिखरा हुआ सा शहर दिखायी देता है आस पास बड़े बड़े चरागाह , दूर दूर तक फैली छिटकी हुई बस्तियां और हरे भरे वृक्षों से घिरे घर ..वाकई क्या सुन्दर दीखते होंगे | सीयन का अर्थ होता है वह स्थान जहाँ पानी बिखरा रहता है ..सागर का तट ..यानी फीयोर्ड बहुत से झरने ..यही है सीयन यही पर नाटककार हेनरिक  इब्सन का जन्म २० मार्च १८२८ को  हुआ था और नार्वे निवासी इस  पर गर्व करते हैं | वहाँ के सबसे बड़े नोट यानी एक हजार के क्रोनर के नोट पर किसी वहां के राजा या अन्य किसी विशेष स्मारक की फोटो नहीं है इब्सन की आकृति का रेखांकन है |इब्सन के जीवन के शुरूआती दिन सुनहरे दिन इसी शहर में बीते थे जब इब्सन की  ख्याति सारी दुनिया में फ़ैल गयी तो नार्वे निवासियों ने इब्सन के सम्मान में अनेक स्मारक बनाए वह आज भी वहां देखें जा सकते हैं उनका घर आज भी दुनिया के लिए एक धरोहर है जो आज भी उसी तरह रखा गया है जैसे उनके जीवन काल में था |
                  ओस्लो नार्वे की राजधानी और सबसे बड़ा शहर है,.इसे सन १६२४ से १८७९ तक क्रिस्टैनिया के नाम से जाना जाता था। इस के बारे में कहा जाता है कि जब भी ओस्लो आना हो तो छतरी और गम बूट जरुर लायें किन्तु उनको अपने साथ ही रखे कहीं होटल या कहीं भूले नहीं यहाँ का मौसम अपने रंग ढंग दिखाता रहता है ..बरसात शुरू होती है पर हमारे देश की तरह नहीं कि बरसती चली जा रही है ..बीच में सूरज निकल आएगा और फिर सहसा ठण्ड का एहसास होने लगता है ..यहाँ के लोगो के बारे में पढा है कि यहाँ के लोग आज के वर्तमान में जीते हैं |यहाँ पर जनसंख्या कम है जिस से हर तरफ एक शान्ति सी रहती है .स्टेशन पर सडको पर न कोई शोर न कोई भीड़ भाड़,,हाँ यहाँ भाषा को ले कर थोड़ी परेशानी जरुर रहती है सिर्फ अंग्रेजी जानना यहाँ के लिए काफी नहीं है |.खाने में कुछ समस्या हो सकती है यदि आप शुद्ध शाकाहारी है तो ..यहाँ मुख्यता गोमांस ही खाया जाता है |ऐसा नहीं है कि यहाँ सब्जियां नहीं होती है .यहाँ के लोग सड़क के किनारे खेतों में कांच और पालिथीन के घरों में टमाटर ,भिन्डी ,पालक और कद्दू उगाते हैं |बहुत सर्दी होने के कारण यहाँ खेती की  ऐसी ही व्यवस्था है परन्तु यहाँ इस तरह सब्जियां उगाना बहुत मुश्किल होता होगा न ?स्ट्राबेरी और आलू की खेती भी यहाँ खूब की जाती है सिचाई के लिए यहाँ फव्वारे लगे हुए हैं पानी यहाँ व्यर्थ नहीं किया जाता है |
              नार्वे में सतरह सौ ग्लेशियर ,पचास हजार द्वीप हैं और पंद्रह सौ से अधिक झीलें ...सप्ताह के अंत में यहाँ लोग अपने परिवार के साथ कारों के पीछे लगे ट्रेलर में जिस में एक कमरा फ्रिज ,चूल्हा और रसोई का समान है ले कर चल पड़ते हैं किसी भी सैरगाह की तरफ या सागर तट की और ,जहाँ मन हुआ जब तक मन हुआ रुक लिए नहीं तो आगे चल पड़े ...सागर के किनारे ऐसी नावों का जमघट लगा रहता है प्लास्टिक की छोटी छोटी नावें भी यह लोग कार की छत पर ही बांध लेते हैं सही में पांच दिन के कठिन परिश्रम के बाद अंत के यह दो दिन मौज मस्ती में बिताना  और फिर से उत्साह पूर्वक अपने काम पर लौटना बहुत अच्छे से जानते हैं यह नार्वे के लोग |यहाँ न पसीना आता है , न मिटटी न धूल इत्यादि |जमीन का असली  रंग तो दिखता ही नहीं यह तो बर्फ या पानी और घास .ठन्डे प्रदेशों में क्या वाकई ऐसा होता है ?
         यहाँ ओस्लो के पास ही चांदी की खाने भी है .."कोंग्स्बर्ग सिल्वर माइनस "..कभी यह नार्वे की अर्थव्यवस्था की नीवं थी| नार्वे की समृद्धि में इनका बहुत योगदान रहा है यह तीन सौ सालों तक नार्वे की सबसे बड़ी खानें  रही है सन १६२३ में इन खानों का पता चला पर इनसे चांदी निकालने का काम १६४२ में शुरू हुआ और १९५६ में इसको बंद कर दिया गया ...पर आज भी घूमने वाले वहां पर एक छोटी सी रेलगाड़ी से इन खानों को भीतर से देखने जाते हैं |यहाँ अन्दर तापमान बहुत नीचे रहता है और बहुत देर तक अन्दर रुका नहीं जा सकता है ..पता नहीं कैसे वहां जब काम होता होगा तो रुका जाता होगा .तब तो सुविधाएं भी अधिक नहीं रही होंगी और तकनीकी ज्ञान भी कम होगा पर फिर भी वह लोग नीचे उतर कर चांदी मिली मिटटी लाते और चांदी अलग करते होंगे ....और अब इन्हें देखना कितना मनमोहक लगता होगा |
              नार्वे में सड़कों का रखरखाव बहुत अच्छे से होता है स्वस्थ .सफाई इत्यादि पर बहुत ध्यान दिया जाता है .|यहाँ जंगलों में दूर दूर  तक छितरे हुए समर हाउस बने हुए हैं छोटे छोटे लकड़ी के घर ,जिस में सब साजो समान है पर सब ऐसे ही रहते हैं कोई चोरी चकारी का डर नहीं यहाँ यह शब्द का  मतलब लोग जानते ही नहीं | नार्वे के लोग पिछले कुछ वर्षों से कुदरत पर बहुत विश्वास करने लगे हैं ..यहाँ शोर शराबा पसंद नहीं किए जाता है |यहाँ न आप बेवजह गाडी का होर्न सुनेंगे न ही ड्राइवर को गाडी चलाते समय किसी से बाते करते ही देखेंगे |हमारे देश भारत में कीप लेफ्ट का नियम माना जाता है उसी तरह यहाँ कीप राईट का नियम माना जाता है | सुरंगे बनाने में यहाँ के लोगों का नार्वे निवासियों का कोई जवाब नहीं कठोर चट्टानी पर्वतों को छेद कर यह लोग लम्बी सुरंगे बना लेते हैं न तो यह टूटती हैं न ही धंसती है जैसी बनी वैसी ही सदा बनी रहती है |
              नार्वे के लोग इसाई धर्म के अनुयाई हैं |यहाँ का सबसे पुराना चर्च "हेदल स्टेव चर्च" है ...यह सन १२५० में बना था और यह पूरा लकड़ी से बना हुआ है सदियों से यह आज भी उसी तरह से खड़ा हुआ है दीवारों पर रंग बिरंगे चित्र हैं जो सन १६६८ में बनाए गए थे |यहाँ हर शनिवार को इस गिरिजा घर में विवाह होते हैं |रात का भोजन अक्सर नार्वेजियन शाम को ही ख़त्म कर देते हैं और फिर घूमने निकल पड़ते हैं अपने अपने दोस्तों के साथ कुदरत के नज़ारे देखने |यहाँ पर सूर्य उत्सव मनाया जाता है जब बहुत महीनो बाद सूरज के दर्शन होते हैं |
             
    ...यह तो थी मेरी मानसिक यात्रा .मैं सचमुच में इस देश को अपनी नजरों से देखना चाहती हूँ ,यहाँ की हवा को महसूस करना चाहती हूँ ..और यदि हो सके तो यही की हो कर रहना चाहती हूँ |बहुत ही अनोखा देश है यह .अदभुत सुन्दरता और साहित्य से भरपूर ....नार्वे मेरे सपनो का देश |

(यह जानकारी कई पुस्तकों में पढ़ी गयी और डिस्कवरी चेनल पर देखे गए प्रोग्राम पर आधारित है ...)
   
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