Friday, May 17, 2013

वजूद की तलाश


तुम कहते हो
"यह नहीं होगा "
मैं कहती हूँ
"वो नहीं होगा "
जिदों की दीवारों से टकराते हैं
हम दोनों के "अहम् .."
कब तक खुद को
यूँ ही झुलझाए जलाएं
चलो एक फैसला कर लें
अपने अपने वजूद की तलाश में
इस ज़िन्दगी के
दो जुदा किनारे ढूंढ़ लें !!



आज का आस पास का माहौल बस कुछ यह है कहता दिखता है ..और ज़िन्दगी मिल कर फिर नदी के दो किनारों सी बहती चली जाती है ..रंजू भाटिया

8 comments:

दिगम्बर नासवा said...

कई बार दो किनारे बन के भी अलग कहां हो पाते हैं ...तरलता होती है पानी की जो जोड़े रखती है ...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

शायद दो किनारे बन कर ही मिल पाएँ ... बहुत खूब ।

प्रवीण पाण्डेय said...

दो किनारों के बीच भी जल तो बह सकता है।

Archana said...

शायद वजूद की तलाश में अलग-अलग किनारे पर रहकर भी एक ही मंजिल पर पहुँचे...

somali said...

do kinre alag alag hokar bhi saath hi chalte hain......

निवेदिता श्रीवास्तव said...

दोनों किनारों का पृथक होना ही नदी को बनाये रखता है .....

Poonam Misra said...

लघु पर प्रभावी .

ANAND SHARMA said...

vistaar ki awashyakta ke liye yogyata hi saarthakta ki janak hoti hai..!!