Monday, January 07, 2013

सर्द ठंडी रातों में

सर्द ठंडी रातों में
 नग्न अँधेरा
एक भिखारी सा
यूं ही इधर उधर डोलता है
 तलाशता है
एक गर्माहट
 कभी बुझते दिए की रौशनी में
कभी कांपते पेडों के पत्तों में
 कभी खोजता है
 कोई सहारा टूटे हुए खंडहरों में ,
या फ़िर टूटे दिलों में
 कुछ सुगबुगा के
 अपनी ज़िंदगी गुजार देता है
यह अँधेरा कितना बेबस सा
यूं थरथराते ठंड के साए में
बन के याचक सा वस्त्रों से हीन राते काट लेता है !!

#रंजू
Post a Comment