Monday, March 12, 2012

शिकवा

जब कहा मैंने उस से
कि मैं तो  हूँ
बहती नदिया
एक निरतंर बहती धारा
लम्हों से टकराती
बल खाती
इठलाती
अपनी मंजिल
सागर से मिलने चलती जाती हूँ

सुन कर वो हंसा
और बोला .
कि कैसे मानूँ  ..?
खड़ा था मैं भी वहीँ  किनारे
अपनी दोनों बाहें  पसारे
चला भी था साथ तुम्हारे
चाहे वह दो ही कदम थे
पर तुमने न दी एक बूंद भी
और न ही साथ बहने का किया इशारा
अब कैसे कहूँ कि "तुम नदी हो "शिकवा
सागर संग मिलेगी कैसे धारा ...?????
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