Tuesday, January 12, 2010

धोखा


एक साँस .....
जाने किस आस पर
दिन गुजारती है..
निरीह सी आंखो से
अपने ही दिए जीवन को,
पल -पल निहारती है
पुचकारती है, दुलारती है

अपने अंतिम लम्हे तक
उसी को ...
जीने का सहारा मानती है

सच है ...
जीने की वजह
कोई बनाने के लिए
इस तरह ..
एक धोखा होना जरुरी है
और दिल के किसी कोने को
यूं ही....
सच से परे होना भी जरुरी है॥

रंजना (रंजू) भाटिया
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