Tuesday, January 19, 2010

तलाश


बसंती ब्यार सा,
खिले पुष्प सा,
उस अनदेखे साए ने..
भरा दिल को..
प्रीत की गहराई से,

खाली सा मेरा मन,
गुम हुआ हर पल उस में
और झूठे भ्रम को
सच समझता रहा ..

मृगतृष्णा बना यह जीवन
भटकता रहा जाने किन राहों पर
ह्रदय में लिए झरना अपार स्नेह का
यूं ही निर्झर बहता रहा,

प्यास बुझ सकी दिल की
जाने ....
किस थाह को
पाने की विकलता में
गहराई में उतरता रहा,

प्यासा मनवा खिंचता रहा
उस और ही...
जिस ओर मरीचका
पुकारती रही,
पानी के छदम वेश में
किया भरोसा जिस भ्रम पर
वही जीवन को छलती रही
फ़िर भी पागल मनवा
लिए खाली पात्र अपना
प्रेम के उस अखंड सच को
सदियों तक ........
ढूढता रहा !! ढूढता रहा !!
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