Wednesday, December 03, 2008

इबारत

बच्चों सा मन और बच्चों सी इबारत
लिखना सरल नहीं होता
कितनी आसानी से वह
लिखते हैं और .......
फ़िर उसको मिटा देते हैं

पर बड़े होने पर हम
सही ग़लत के गणित में उलझे
अपनी ही लिखी ....
इबारतों को नही मिटा पाते ..
खरोच सी लगती है वह इबारते
और हम उस से ....
रिस्ते लहू को पौंछ भी नही पाते हैं ....

रंजना [रंजू ] भाटिया

19 comments:

Manvinder said...

इबारतों को नही मिटा पाते ..
खरोच सी लगती है वह इबारते
और हम उस से ....
रिस्ते लहू को पौंछ भी नही पाते हैं
sunder bhaaw hai.....

Anonymous said...

पर बड़े होने पर हम
सही ग़लत के गणित में उलझे
अपनी ही लिखी ....
इबारतों को नही मिटा पाते ..
खरोच सी लगती है वह इबारते
और हम उस से ....
रिस्ते लहू को पौंछ भी नही पाते हैं
bahut sahi kaha ranju ji ,kaas hum bachhon ki tarah apnalikha mita sakte aur phir se ek naya aayam likh pate,magaraisa nahi hota aur wo likhawat nasoor sichubti hai,bahut gehre bhav chupe hai kavita mein,badhai.

Anonymous said...

बहुत ही शानदार अभिव्यक्ति.. काश बड़े होने के बाद भी हम जिंदगी के खिलौने बदलने को स्वतंत्र होते..

Abhishek Ojha said...

वो सहज बालमन अब कहाँ सम्भव है ! सुंदर लगी ये कविता.

Alpana Verma said...

खरोच सी लगती है वह इबारते
और हम उस से ....
रिस्ते लहू को पौंछ भी नही पाते हैं ....

एक कड़वा सच लिखा है.
इस इबारत का कोई अक्षरकभी खरोंच ना दे बस यही कोशिश करनी चाहिये.

शोभा said...

बिल्कुल सही लिखा है। बचपन सरल होता है।

कुश said...

हम बड़े होते ही क्यो है.. ?

Udan Tashtari said...

बड़ी गहरी बात-बेहतरीन अभिव्यक्ति!!

डॉ .अनुराग said...

खरोच सी लगती है वह इबारते
और हम उस से ....
रिस्ते लहू को पौंछ भी नही पाते हैं ....


कड़वा सच है ये भी !

रश्मि प्रभा... said...

itna kuch isme kaha hai ki main mugdh ho gai........badee bhawnaaon ko saral bachchon ki ibaarat sa samjha diya

आलोक साहिल said...

yadon ke nashtar ne jawani ke pathrile seene ko lahu se geela kar diya.....
ALOK SINGH "SAHIL"

Anonymous said...

सुंदर अभिव्यक्ती!सच में हम बडे होते ही क्यों है?

सुशील छौक्कर said...

बहुत गहरी बात कह गई आप इस रचना में।

पर बड़े होने पर हम
सही ग़लत के गणित में उलझे
अपनी ही लिखी ....
इबारतों को नही मिटा पाते ..
खरोच सी लगती है वह इबारते
और हम उस से ....
रिस्ते लहू को पौंछ भी नही पाते हैं .

बहुत खूब।

राज भाटिय़ा said...

तभी तो कहते है बच्चा राजा होता है, लेकिन क्या हमारे यहां सच मै बच्चा राजा होता है???
बहुत ही उम्दा कविता.
धन्यवाद

नीरज गोस्वामी said...

क्या बात कही है आपने...वाह...सच है बच्चों जैसी निश्चलता जीवन फ़िर से लौट कर नहीं आती...हम बड़े हो कर क्यूँ इतने समझदार हो जाते हैं?
नीरज

सतीश पंचम said...

काफी गहरी बात लिखी है आपने। फिल्म गीत गाता चल का किशोर कुमार का वो गीत याद आ रहा है कि

बचपन हर गम से बेगाना होता है......
हो बचपन....
हम ढूँढते हैं जीवन भर वो ख़ुशियाँ
बचपन में जो पाते हैं

वो हँसते हुए दिन गाती वो रातें
लौट कर फिर नहीं आते हैं

बैहद उम्दा पोस्ट।

Mohinder56 said...

आप की रचना पढ कर गीत याद आ गया...
कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन... वो बचपन ही ठीक था.. अब तो बस उलझने और टकराव ही है... वो भी अधिकतर बिना किसी कारण

Arvind Mishra said...

अर्थ गाम्भीर्य ! वे रिसते जख्म भी कई मायनों में दूसरे जख्मों से अच्छे होते हैं जो किसी की याद दिलाते रहते हैं !

रंजना said...

सुंदर अभिव्यक्ती!सच kaha.