Monday, December 01, 2008

किसी के लिए महज खेल - तमाशा है यह शायद

पल भर में कैसे ज़िन्दगी बदल जाती है
किसी के एक इशारे से यह खेल खेल जाती है

सुबह निकलते हुए अब एक पल सोचता है मन
देखे हम आते हैं या कोई खबर घर भर को दहला जाती है

मुस्कराते चेहरे डूब जाते हैं आंसुओं में
इन्सान की जान कितनी सस्ती हो जाती है

किसी के लिए महज खेल - तमाशा है यह शायद
पर यहाँ पल भर में किसी की दुनिया बदल जाती है

रंजू

२६ नवम्बर को जो कुछ बीता वह कभी भुलाया नही जा सकता ..लगातार सब देखते देखते जैसे सब शून्य सा नजर आने लगा है अब तक क्या लिखे न कुछ दिमाग में आ रहा है न लिखा जा रहा है ..सब एक ही जैसी हालत से गुजर रहे हैं ..आक्रोश गुस्सा , बेबसी जैसे लफ्ज़ सबके लिखने में ,बोलने में झलक रहा है ...आतंकवादी हमला शायद दिलों में दर्द देने को कम था जो राजनेताओं के बयानों ने और बढ़ा दिया ..उनकी नजरों में यह सब छोटी छोटी बातें हैं जो अक्सर बड़े बड़े शहरों में होती रहती है ...इसी बीच दिल्ली में वोट भी शुरू हुए ..किसी को वोट देने का दिल नही हुआ पर फ़िर लगा कि इस अधिकार का प्रयोग कर के जिन्हें लाना चाहिए उन्हें तो लाये ..पर सच कहूँ तो एक भी ऐसा वोट देने वक्त नजर नही आया .वोट दे दिया पर उसके नतीजे से अधिक अब लगता है कि कुछ ऐसा होना चाहिए जो हालात बदल दे और हर इंसान को सिर्फ़ प्यार की भाषा सिखा दे ...पर इस के लिए सबको एक साथ होना होगा और उसके लिए किसी इस प्रकार की दुखद घटना की जरुरत न पड़े ..कभी गुलजार ने इसी तरह के हालत पर कहा था ...

एक ख्याल था ....इन्कलाब का
इक जज्बा था
सन अठारह सौ सत्तावन !
एक घुटन थी ,दर्द था ,वो अंगारा था जो फूटा था
डेड सौ साल हुए हैं उसकी
चुन चुन कर चिंगारियां हमने रोशन की हैं
कितनी बार और कितनी बीजी है चिंगारियां हमने
और उगाए हैं पौधे उस रोशनी के !
हिंसा और अहिंसा से
कितने सारे जले जलाव
कानपुर, झांसी ,लखनऊ, मेरठ ,रुड़की ,पटना
आजादी की पहली पहल ज़ंग तेवर दिखलाये थे
पहली बार लगा साँझा दर्द है बहता है
हाथ नही मिलते पर कोई उंगली पकड़े रहता है
पहली बार लगा था खून खोले तो रूह भी खौल उठती है
भूरे जिस्म की मिटटी में इस देश की मिटटी बोलती है

पहली बार हुआ था ऐसा ..
गांव गांव
रुखी रोटियाँ बटती थी
ठंडे तंदूर भड़क उठते थे !
चंद उड़ती हुई चिंगारियों से
सूरज का थाल बज उठा था जब ,
वो इन्कलाब का पहला गरज था !
गर्म हवा चलती थी तब
और बिया के घोंसलें जैसी
पेडों पर लाशें झूलती थी
बहुत दिनों तक महरौली में
आग धुएँ में लिपटी रूहें
दिल्ली का रास्ता पूछती थी

उस बार मगर कुछ ऐसा हुआ
क्रांति का अश्व तो निकला था
पर थामने वाला कोई न था
जाबांजों के लश्कर पहुंचें थे
मगर सलाराने वाला कोई न था

कुछ यूँ भी हुआ ............
अब तो सब कुछ अपना है
इस देश की सारी नदियों का अब सारा पानी मेरा है
लेकिन प्यास नही बुझती

न जाने मुझे क्यों लगता है
आकाश मेरा भर जाता है जब
कोई मेघ चुरा के ले जाता है
हर बार उगाता हूँ सूरज
और खेतों को ग्रहण लग जाता है

अब तो वतन आजाद है मेरा
चिंगारियां दो ....चिंगारियां दो ...
मैं फ़िर से बीजूं और उगाऊं धूप के पौधे
रोशनी छि ड़ कूं जा कर अपने लोगों पर
मिल कर आवाज़ लगाएं
इन्कलाब
इन्कलाब
इन्कलाब !
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