Friday, August 08, 2008

फ़िर क्यों दिखती प्रीत की छाया..!!!


कल कमरे की खुली खिड़की से
चाँद मुस्कराता नज़र आया
खुल गई भूली बिसरी
यादो की पिटारी...
हवा ने जब गालों को सहलाया,
उतरा नयनो में फ़िर कोई लम्हा
जीवन के उदास तपते पल को
मिली जैसे तरुवर की छाया..

कांटे बने फूल फ़िर राह के ..
दिल फ़िर से क्यों भरमाया..
हुई यह पदचाप फ़िर किसकी..
दिल के आँगन में गुलमोहर खिल आया..

कहा दिल ने कुछ तड़प कर
जो चाहा था ,वही तो पाया
वक्त ने कहा मुस्करा कर...
कहाँ परिणाम तुम्हे समझ में आया?
तब तो रखा बंद मन का हर झरोंखा
आज फ़िर क्यों गीत प्रीत का गुनगुनाया
भरे नैनों की बदरी बोली छलक कर
खोनी ही जब प्रीत तो....
फ़िर क्यों दिखती प्रीत की छाया..!!!
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