Wednesday, June 25, 2008

सच के रंग अलग अलग

जिंदगी कई रंग से में ढली है और दिल न जाने क्या क्या ख्याल बुनता रहता है ..वही ख्याल हैं यह कुछ लफ्जों की जुबान

सच के रंग


कभी उतार कर
अपने चेहरे से नकाब
ज़िंदगी को जीना सीखो
मिल जायेगी राह
किसी मंजिल की
बस सच से जुड़ना सीखो..



चेहरे का नूर
छलक उठा
जब भी याद आया
तेरे होंठों की मोहर का
अपनी गर्दन पर लगना ..


जुस्तजू
तेरे मीठे बोलो
तेरी प्यारी सी छवि
अपन वजूद पर
फैली हुई तेरी खुशबु
बस एक ओक में भरूँ
और चुपके से पी जाऊं ..


खामोशी

तेरे दिल की अन्तर गहराई से
मेरी नज़रों से दिल में उतरती ..


आदत
साँस लेने की
टुकडों में जीने की
वक्त बीतने की
टूट कर फ़िर से जुड़ने की
शायद जिंदगी कहलाती है ..

तेरा साथ
झूठे रेशमी धागों में
कसा हुआ एक रिश्ता
उपर से हँसता हुआ
अन्दर ही अन्दर दम तोड़ रहा है !!
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