Saturday, May 24, 2008

जरा यूं भी सोचिये ...

अमित जी आपकी पोस्ट के जवाब में मैं यही कह सकती हूँ ..

बच्चे घर मे दोनों के प्यार के लिए तरसते रह जातें हैं नई पीढ़ी माँ बाप के प्रेम से वंचित है आरुषी का केस इसलिए (खास तौर से समूची नारी जाति के लिए एक आई ओपनर है यही घड़ी है नारी समाज अब समाज राष्ट्र भावी पीढ़ी के हित में घरो की ओर अपना रुख कर ले


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सवाल कई है और जवाब भी कई ...? पर क्या यह सचमुच इतना आसान है ...परिवार टूटने लगे हैं बिखरने लगे हैं ..? और एक महिला घर पर रहे .क्या आपको लगता है की इस से समस्या सुलझ जायेगी ..."?महिला कभी कोई भी काम करे अपने परिवार को भूल नही पाती है ...पर जो हालत आज कल पैदा हो रहे हैं उस में उसका नौकरी करना भी उतना ही जरुरी है जितना परिवार को वक्त देना .और ना सिर्फ़ वक्त बेवक्त की मुसीबत के लिए उसके अपने लिए भी अपने पेरों पर खड़ा होना सवालंबी होना जरुरी है यही वक्त की मांग है ....पर इस में सबका सहयोग चाहिए ...बढ़ती महंगाई , बदलता समाज हमारे रहने सहने का ढंग सब इतने ऊँचे होते जा रहे हैं कि एक की कमाई से घर नहीं चलता है .. और यह सब सुख सुविधाये अपने साथ साथ बच्चो के लिए भी है ..बात महिला के घर पर रहने की या न रहने की नही है असल में बात है माता पिता दोनों को वक्त देने की अपने बच्चो को अपने बच्चो से निरन्तर बात करने की ..और उन को यह बताने की हम हर पल आपके साथ है ..आप क्या समझते हैं जिन घरों में महिलाए रहती है वहाँ बच्चे नही बिगड़ते हैं ..??आज का माहोल जिम्मेवार है इस के लिए ..अपने आस पास नज़र डालें जरा ..दिन भर चलता टीवी उस पर चलते बेसिरपैर के सीरियल अधनंगे कपड़ो के नाच ,माल संस्कृति ,और लगातार बढ़ती हिंसा .. जिन्हें आज कल बच्चे दिन रात देखते हैं इंटरनेट का बढता दुरूपयोग ...मोबाइल का बच्चे बच्चे के हाथ में होना ..क्या आप रोक पायेंगे या एक माँ घर पर रहेगी तो क्या यह सब रुक जायेगा ..नही ..यह आज के वक्त की मांग है और माता पिता यह सुविधा ख़ुद ही बच्चो को जुटा के देते हैं .ताकि उनका बच्चा किसी से ख़ुद को कम महसूस न करे और यही सब उनके दिमाग में बचपन से बैठता जाता है और तो और उनके कार्टून चेनल तक इस से इस से बच नही पाये हैं ..अब घर पर माँ है तब भी बच्चे टीवी देखेंगे और नही है तब भी देखेंगे ..इन में बढती हिंसा और हमारा इस पर लगातार पड़ता असर इन सब बातो को बढावा दे रहा है ..नेतिकता का पतन उतनी ही तेजी से हो रहा है जितनी तेजी से हम तरक्की की सीढियाँ चढ़ रहे हैं ..हर कोई अब सिर्फ़ अपने बारे में सोचता है...और जब उस राह पर मिलने वाली खुशी में कोई भी रोड अटकाता है तो बस उसको मिटाना है हटाना है अपने रास्ते से यही दिमाग में रहता है ....संस्कार माँ बाप दोनों मिल कर बच्चे को देते हैं ..शिक्षा का मध्याम ज्ञान को बढाता है और यही नए रास्ते भी सुझाता है .. पर जीवन के इस अंधाधुंध बढ़ते कदमों में जरुरत है सही दिशा की सही संस्कारों की ...और सही नेतिक मूल्यों को बताने की ...सिर्फ़ माँ की जिम्मेवारी कह कर पुरूष अपनी जिम्मेवारी से मुक्त नही हो सकता वह भी घर की हर बात के लिए हर माहोल के उतना ही जिम्मेवार है जितना घर की स्त्री ..यदि वह अपना आचरण सही नही रख पाता है तो एक औरत माँ कितना संभाल लेगी बच्चे को आखिर वह सब देखता है अपने जीवन का पहला पाठ वह घर से ही सिखाता है हर अच्छे बुरे की पहचान पहले उसको अपने माँ बाप दोनों के आचरण से होती है वही उसके जीवन के पहले मॉडल रोल होते हैं ...मैं तो यही कहूँगी कि आज के बदलते हालात का मुकाबला माता पिता दोनों को करना है और अपने बच्चो को देने हैं उचित सही संस्कार ..बबूल का पेड़ बो कर आम की आशा करना व्यर्थ है ..और नारी को सिर्फ़ घर पर बिठा कर आप इन बिगड़ते हालात को नही सुधार सकते ..यह हालात हम लोगो के ख़ुद के ही बनाए हुए हैं तो अब इनका मुकाबला भी मिल के ही करना होगा ..नही तो यूं ही अरुशी केस होते रहेंगे और इंसानियत शर्मसार होती रहेगी ...आप इसको जरा यूं भी सोचिये ..

10 comments:

Anonymous said...

ranjana
amit mujeh bilkul apripakv lakeh lagey haen . mujeh woh media sae judaey lagety haen
arushi ki maut tamaacha haen bhartiyae samaj per bus iskae aagey kuch nahin kyoki samaj mae sab aatey haen ham bhi

डॉ .अनुराग said...

मैंने अमित जी का लेख नही पढ़ा है पर आपकी बातो से कुछ कुछ अंदाजा लगा सकता हूँ दरअसल इस घटना मे माँ का बाहर कम करना या नही करना उत्तरदायी नही है....कई पहलू है मैंने अपनी आंखो के सामने एक ऐसा केस देखा है जहाँ माँ घरलू थी लेकिन बच्ची को स्कूल लेने जाने के लिए २२ साल का drivar था ,तो लड़की इस उम्र मे बहक गई ,नादान थी ,दरअसल हमारे सामाजिक के नैतिक मूल्य गिर रहे है ,आम व्यक्ति का चरित्र पतन पर है .....M.टी.वी RODDIE मे वो विजेता होता है जो बड़ा कमीना ,चालबाज है ,लड़किया flirt कर रही है ,महज एक टी.वी शो जीतने के लिए ......लोग कतार मे खड़े रहते है किसी टी.वी शो के औदिशन पर बावलो की तरह खड़े है .....सुखदेव को -बिस्मिल को को लोग रंग दे बसंती देखने के बाद जानने लगे है......लेकिन अभिषेक कहाँ बाल कटाता है . ये बता देगे....सब जिम्मेदार है मीडिया ,अखबार ,किताबे ,आप ओर मैं........लम्बी बहस है.......

कुश said...

माँ अगर घर में रहे तो बच्चे एम टी वी रोडीज में जाकर खुले आम गालिया निकलते है.. नेतिकता मर रही है..

Amit K Sagar said...
This comment has been removed by the author.
Amit K Sagar said...

आदरणीय रंजू जी ,
सर्वप्रथम उल्टा तीर पर जारी बहस में शामिल होने के लिए आपका ह्रदय से आभारी हूँ !! बहस का धेय्य यही है कि इसमें ज्यादा ज्यादा से लोगो की सहभागिता बढे ...साथ ही आपने इस बहस के बारे में अपने ब्लोग पर जो लेख पब्लिश किया है उसे मैं आपकी अनुमति से "उल्टा तीर" में प्रकाशित करना चाहता हूँ !!सहयोग की अपेक्षा है !
विनम्र!
अमित के सागर
http://ultateer.blogspot.com

आलोक साहिल said...

बिल्कुल सही बात करी आपने.
आलोक सिंह "साहिल"

बालकिशन said...

अभी तो मैं सिर्फ़ यही कह सकता हूँ कि एक सार्थक बहस है. और जितनी बढे उतना ही सबके लिए अच्छा है आख़िर हम सब इन मुद्दों से किसी ना किसी रूप मे जुड़े हैं.

शोभा said...

मैं रंजना जी आपसे पूरी तरह सहमत हूँ। नारी का नौकरी करना और ना करना इस तरह की समस्याओं का कारण नहीं है। आज के युग में नारी का नौकरी करना युग की आवश्यकता है। किसी भी घटना के लिए किसी एक को दोष देना मूर्खता है। मुझे अमित जी की सोच बहुत बचकानी लगी या ये भी हो सकता है कि अमित जी इस तरह अपने ब्लाग को लोकप्रिय बना रहे हों।

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल said...

अमित जी और रंजू जी की टिप्पणियां पढीं. दोनों ही ने अपनी अपनी तरह से इस दुखद प्रकरण पर अप्नी चिंताएं ज़ाहिर की हैं. यह शुभ है. मुझे लगता है कि सबसे बडी गडबड तो यह हो रही है कि पुलिस ने हो कथा का वितान खडा किया है, और दृश्य मीडिया जिसे जोर-शोर से प्रचारित कर रहा है, उसे ध्रुव सत्य मानकर हम सारी टिप्पणियां कर रहे हैं. स्वयं पुलिस ने जो वृत्तांत गढा है वह अभी सन्देह से परे नहीं है. ऐसे में आरुषी, हेमराज, तलवार दम्पती और उनके मित्रों किसी को भी दोषी मानकर बात करना उचित नहीं. दूसरी बात, ज़माना बदलता है, पुराना बहुत कुछ जाता है, नया आता है. हर नया सदा खराब नहीं होता और न सारा पुराना अच्छा ही था. दर असल महत्वपूर्ण यह है कि हम जिसे अपनाते हैं, उसका उपयोग करते हैं या दुरुपयोग. स्त्री का नौकरी करना, तकनीक, आधुनिकता, समृद्धि इन सब पर ये बात लागू होती है. सरलीकरण से बात बनती नहीं बिगडती है.

आशीष कुमार 'अंशु' said...

बहस जारी रखें