Monday, May 12, 2008

विज्ञापन का असर कहानी से ज्यादा ?

सिनेमा हमेशा से ही समाज पर अपना प्रभाव छोडती है ..और सबसे अधिक इस से परभावित होता है युवा वर्ग .हर फ़िल्म का इस में काम करने वालों का देखने वालों पर के असर होता है यह बात अब कहने की नहीं रह गई है ...युवा वर्ग अपना हीरो जिस को मान लेते हैं उसी के अनुसार उनकी चाल ढाल ढल जाती है ..बबिता कट बालों से ले कर बाबी ड्रेस तक धोनी के बालों से ले कर शाहरुख़ के सिक्स एप्स तक ..कौन अछुता रहा है इन सब से उनके हाव भाव उनकी उपयोग की गई चीजों की भी जबरदस्त मांग मार्केट में बढ़ जाती है ..और जाने अनजाने फ़िल्म और हीरो व्यवसायिक वस्तुओं के विज्ञापन की भूमिका निभाते रहते हैं .ताल में सुभाष घई ने जिस खूबसूरती से कोका कोला बेचने की शुरुआत की थी वह आज तक कायम है उस फ़िल्म में भारतीय संगीत भी इस की बिक्री के आगे फीका सा नज़र आने लगा था ...लक्स का विज्ञापन तो इस बारे में एक रेकॉर्ड ही माना जा सकता है की कोई हिरोइन सुंदर है तो वह लक्स का ही कमाल है ..हर चीज अब विज्ञापन बनती जा रही है जिस से न केवल युवा वर्ग बलिक आज की नई पौध भी अच्छी खासी प्रभावित है ...बिना उसका नुकसान जाने पहचाने बस लेने की जिद है .अब अभिताभ बच्चन डाबर गुलोकोज पी के ताक़तवर हो रहे हैं या वह चाकलेट खा रहे हैं तो उनको मानने वाले कैसे इन चीजों नही अपनाएंगे ..विज्ञापन बनाने वाले या फ़िल्म में इसका इस्तेमाल करने वाले जिस खूबसूरती से भावनाओं से जुड़ कर इस से आम जनता को जोड़ देते हैं वह काबिले तारीफ है ..याद करे ताल का कोका कोला का वह सीन जहाँ हीरो हिरोइन में कोई स्पर्श नही हुआ पर एक दूसरे का झूठा पीने का वह सीन कितनी देर तक परदे पर छाया रहा जो प्रेम का स्वीकृत रूप बना ..चिट्ठी पत्री , दोस्त सखी या कोई और अन्य साधन अब बीते वक्त की बात हो चुकी हैं ... आज सब बिकता है साबुन से लेकर फेयर एंड लवली तक ..बस बेचना आना चाहिए आख़िर बाज़ार की संस्कृति ने हमे हर चीज को बेचना सिखा ही दिया है ....टीवी पर आने वाले हर प्रोग्राम का यही हाल है आधे घंटे का प्रोग्राम नही की ५० तरह के विज्ञापन हर प्रकार के विज्ञापन से भरा पढ़ा है शायद इन में आने वाले सीरियल की कहानी लिखने वालों को पता है की यह दर्शकों को बाँध सके न सके पर शायद यह विज्ञापन तो कुछ ऐसे मजेदार बनाए जाए कि लोग देखते रहे ....कई बार कोई पुरानी फ़िल्म देखने को मिले तो उस में एक ख़ास बात नोट की मैंने कि नायक या नायिका के हाथ में कभी कभी अंग्रेजी लेखक या हिन्दी कवि की कोई किताब होती है जिस से उस किताब को पढने की इच्छा होती है पर आज की नई पीढ़ी शायद यही विज्ञापन देख के ही बेचैन रहेगी और इसी तरह हमारी फिल्म सीरीयल कहानी कम और विज्ञापन ज्यादा नजर आते रहेंगे !!
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