Tuesday, May 13, 2008

न जाने कौन सी उम्मीद पर दिल ठहरा है [मीना कुमारी]

मीना कुमारी की एक आदत थी पत्थर के टुकडे जमा करने की .जब भी वह आउटडोर शुटिंग पर जाती या पहाड़ पर जाती तो टेढे मेढे , गोल -मटोल पत्थर उठा के ले आती उन पत्थरों को वह अपने पलंग के पास रखती थी और उनसे घंटो बात करती या घर वालों को दिखा के कहती कि देखो यह पत्थर कितना उदास है ,चमचमाता पत्थर देखती तो कहती कि यह प्रेम में डूबा हुआ है इसलिए चमक रहा है ....एक बार उन्होंने एक व्यक्ति के हाथ में एक पत्थर का छोटा सा टुकडा दिया और कहा कि "'इसको ले जाओ और अपने पास रखना तुम्हारा दिल भी पत्थर की तरह है और यह पत्थर का टुकडा मोम की तरह जो मेरे प्रेम में पिघल कर छोटा सा हो गया है अब इसको यहाँ वापस नही रखना ..."" पता नही उस व्यक्ति ने उस पत्थर के टुकड़े का फ़िर क्या किया पर उसका पत्थर दिल मोम हो गया और वह मीना जी से बेहद प्रेम करने लगा ..फूल और पत्थर नाम भी उन्ही का दिया था धर्मेन्द्र इस फ़िल्म के नायक थे
यह फ़िल्म बहुत कामयाब रही और धर्मेन्द्र का केरियर इस से संवर गया उनका कहना था कि "हर नए आने वाले को सहारे की जरुरत होती है ,इस फ़िल्म इंडस्ट्री में आने वाला हर नया फनकार उस बच्चे की तरह होता है जो किसी का सहारा चाहता है और जब कोई उसकी तरफ़ हाथ बढ़ा देता है तो वह यहाँ टिक जाता है उसके पांव यहाँ जम जाते हैं ...आज हमारे मजबूत क़दमों के नीचे सहारा देने वालों की बुनियाद रखी ह्युई है ...एक मीना कुमारी बनने से यह इंडस्ट्री किसी और को मीना कुमारी बन जाने से नही रोक सकती न ही इन्कार कर सकती है मदद करने से हम किसी का मुकद्दर तो नही बदल सकते हैं पर उसकी मदद कर सकते हैं मुकद्दर बनाने में तो उसकी मेहनत और लगन ही काम आएगी ''..कितना सही कहा था मीना जी ने

कहते हैं की पाकीजा के बनने के दिनों में मीना जी के चेहरे पर एक अजब सी चमक थी और एक अनोखा संतोष कमाल अमरोही ने पाकीजा शुरू तो बहुत पहले की थी लेकिन बाद में मत भेदों के कारण इसका काम रुक गया इसकी प्लानिंग पहले १९५८ में की गई थी जब दोनों साथ थे महल स्टूडियो तब किराए पर लिया गया था और कई भव्य सेट लगाए गए थे ...तब इस में मीना कुमारी के साथ अशोक कुमार और धर्मेन्द्र थे फ़िर मीना कुमारी सफलता अकेलेपन और शराब के दौर से गुजरती हुई अस्पताल तक पहुँच गई ...कभी ठीक तो कभी बीमार होने का सिलसिला चल पड़ा और तब उन्होंने फ़िर से इस फ़िल्म को शुरू करने की जिद की फ़िर मीना जी के ही पहल करने पर दुबारा इस फ़िल्म को शुरू किया गया और बहुत जोश के साथ उन्होंने इस में सहयोग दिया पर धर्मेन्द्र की जगह राजकुमार को लाया गया कई बार वह बीमारी के कारण सेट पर काम नही कर पाती थी मगर कमाल अमरोही ने उनकी बीमारी को ध्यान में रखते हुए ऐसी तरकीबें अजमाई की काम भी हो गया और कोई फ़िल्म का दृश्य कमजोर भी नजर नही आया ... उदाहरण के लिए यह गाना चलते चलते मुझे यूं ही कोई मिल गया था ..के फिल्माकन के दौरान उनसे खडा भी नही हुआ जा रहा था ऐसे में कमाल अमरोही जी ने उन्हें बिठा कर उनके चेहरे की सिर्फ़ भाव कैमरे में कैद कर लिए थे और डांस का बाकी हिस्सा अन्य नर्तकियों पर फिल्माया था वह भी इस खूबी के साथ यह गीत एक अमर क्लासिक गीत बन गया जब यह फ़िल्म रिलीज़ हुई थी उसका हर दृश्य ही क्लासिक था आज भी यह फ़िल्म उतने ही शौक से देखी जाती है ...गुलाम मोहम्मद द्वारा संगीत बद्ध गाने सभी सुपर हिट थे .....यह फ़िल्म शुरू में हिट नही हुई मगर बाद में यह सुपर डुपर हिट साबित हुई और मीना जी इस सफलता को नही देख पायी न ही गुलाम मोहम्मद साहब अपन संगीत की लोकप्रियता देख पाये से उस वक्त उन्होंने उस वक्त कहा था कि शायद यह ज़िंदगी का आखरी पड़ाव है मेरा सब हिसाब चुकता कर के ही खुदा के पास जाऊँगी और एक शेर अपनी दर्द भरी आवाज़ में सुनाया था ...

हर नए जख्म पर अब रूह बिलख उठती है
होंठ गर हंस भी पड़े तो आँख छलक उठती है

ज़िंदगी एक बिखरता हुआ दर्दाना है
ऐसा लगता है अब खत्म हुआ अफसाना है ..


मीना जी को को अपनी मौत का शायद पहले ही एहसास हो गया था तभी तो उन्होंने अपना यह आखरी हिसाब भी चुकता कर दिया था और जाते मीना कुमारी ख़ुद को ,पाकीजा को ,कमाल अमरोही को फिल्मी इतिहास के पन्नों में अमर कर गई वह वह फिल्मों के चमन का नायाब फूल थी जो बरसों बहुत इंतज़ार के बाद खिलता है और अपनी खुशबु से सारे चमन को महका देता है

मसरत पे रिवाजों का पहरा है
न जाने कौन सी उम्मीद पर दिल ठहरा है

तेरी आँख में झलकते हुए इस उम्र की कसम ,

ऐ दोस्त !दर्द से रिश्ता बहुत ही गहरा है ..
मीना कुमारी


पढी गए लेखो और किताबों के आधार पर है यह सब जानकारी ...अभी बहुत कुछ बाकी है वह अगले अंक में
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