Friday, June 22, 2007

नारी एक प्रेम-व्यंजना




नारी है एक प्रेम-व्यंजना
उढ़ेलती जाती प्रेम रस को…
चढ़ा देती है अपने प्यार के पुष्प वो
देवता और इन्सान के चरणो में
छू लेती है जब वो कलम को
बन के सुंदर गीत प्रेम के,
विरह के निकल आते हैं
कविता में ढल के उस के बोल
बस प्रेम मय हो जाते हैं

चुनती है वह घर का आँगन
जहाँ सिर्फ़ प्रेम के बाग लहराते हैं
उड़ने के लिए चुनती है सिर्फ़ वही आकाश
जहाँ सिर्फ़ उसके सपने सज जाते हैं

गीत लिखती है वो वही सिर्फ़
जिसके बोल उसके पिया मन भाते हैं
प्रेम में स्त्री के दोनो जहाँ सिमट आते हैं
प्रेम में डूब कर कब रहता है उस को भान समय का
उसके शब्दकोष में बस प्यार के रहस्य ही समाते हैं
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