Tuesday, June 26, 2007

है बस यही लम्हे मेरे पास इस कुदरत की सोगात के



हमारा गेंग








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हमारा गेंग




जब घर से चले थे तो दिल्ली की गर्मी से निजात पाने की उम्मीद थी और दिल में था कुछ गुनगुनाता सा मीठा मीठा संगीत मंद बहती हवा का एहसास और ..आँखो में सपने थे ..पेडो से ढके पहाड़ की हरियाली और भी बहुत कुछ ...ख़ुद बा ख़ुद दिल किसी गीत की रचना करने लगा था

कल- कल बहती गंगा यही संदेश देती है
चलते चलो- चलते चलो !!
बहती मस्त बयार ,ठंडी जैसे कोई फुहार
लहराते डगमगाते पहाडी से रास्तेनयना ना जाने किसकी है राह तकते


सफ़र शुरू हुआ ... दिल्ली की गर्मी भी सफ़र में दूर दूर तक साथ चलती रही ... .शहर की भाग दौड़ से दूर दो पल शांत बिताने की चाहा हमे उतराँचल की गोद में ले गयी ... तेज़ गर्मी और लंबा सफ़र के बीच मोदी नगर की जैन शिकजी और चीतल रिसोर्ट ने हमारे सफ़र को कुछ मीठा सा बना दिया .... हरिद्वार और ऋषिकेश को पार करते हुए थोडा सा आगे हम कोडियल के गड़वाल रेस्ट हाउस तक जब पहुचे तो जैसे सफ़र की सारी थकावट गंगा के कल कल बहते पानी को देख कर उतरने लगी .. पर गरमी का असर यहाँ भी ख़ूब दिख रहा था .. हवा का एक झोंका नही ..

- ज़िंदगी जीने की चाहा में
सब कुछ अपना बनाने की राह में

यहाँ सब छूटा सा जाता है
जंगल से पेडो का ,
मंद बहती समीरो का
साथ अब रूठा जाता है

पर
चारो तरफ़ पहाड़ से घिरे और गंगा के किनारे बसे इस रेस्ट हाउस ने हमे जैसे अपने मोह में बाँध लिया .... अगले दिन रफ्टिंग का जोश सबके चेहरे पर दिख रहा था ...बहुत ही रोमांचक लगता है गंगा की शीतल बहाव और तेज़ धारा में कूदना ...

वहाँ
से मेरिन ड्राइव से शिवपुरी का रास्ता कई रॅपिड को पार करते हुए मेरे लिए तो बहुत ही नया और रोमांचक अनुभव रहा ..... उसके बाद भी कितनी देर हम यूँ ही गंगा की गोद में बैठे गर्मी को दूर करने में लगे रहे ....





हमारा अगला पडाव ओली था ..
सुबह
5 बजे पहाड़ के उगते सूरज की लालिमा
और कुछ हद तक ठंडी हवा में सफ़र शुरू हुआ ....

देवप्रयाग.श्रीनगर .. रुद्रप्रयाग और जोशीमठ तक कई सुंदर नज़ारे आँखो में बस गये
...
जोशीमठ से 14 किलोमेटर उँचाई पैर स्केटिंग के लिए मशहूर ओली इस मौसम में अपने में अदभुत सुंदरता समेटे हुए हैं ..वहाँ बनी हट्स और उस के सब तरफ़ खिले सफ़ेद फूल , आस पास विशाल पहाड़ दूर किसी किसी छोटी पर अभी भी कुछ बर्फ़ दिख रही थी . जैसे हम से कह रहे थे की आओ कुछ देर हमारे साए में अपनी ज़िंदगी की सारी भाग दौड और परेशानी भुला दो ..बस कुछ पल सिर्फ़ यहाँ सुंदरता में खो जाओ ..भर लो बहती ताज़ी हवा जो शायद कुछ समय बाद यहाँ भी नही मिलेगी ..... बादलो के बीच में ट्राली का सफ़र जैसे बादलो के संग ही उड़ता सा लगता है ...




चेहरे को छूते बादल जैसे अपने स्पर्श से बता देना चाहते हैं की जो ठंडक उन में है वो आज के चलते ए-सी में नही :) और यह पहाड़ जब सर्दी में सफ़ेद बर्फ़ से ढ़क जाते होंगे तो कितने सुंदर लगते होंगे इसका अंदाज़ा यहाँ पर बिखरी सुंदरता से आसानी से लगाया जा सकता है ....उपर कुछ पहाड़ो में लगे देवदार के पेड़ जैसे किसी समाधी में लीन लगे जो शायद यह तपस्या कर रहे थे की यूँ हमारी सुंदरता को बना रहने दो आओ ..कुछ पल सकुन की साँस लो और आने वाले कल के लिए यह सब रहने दो ....पर फिर भी जैसे कुदरत अंतिम सांसो तक कुछ ना कुछ मानव को देती लगती थी ..जैसे कह रही हो की देख लो मैं अभी भी तुम्हारे साथ अपने संपूर्ण सुंदरता के साथ रह सकती हूँ यदि तुम मुझे सहज कर संभाल कर रखो ..... यह सफ़र अभी आधा था क्यूँकी ............उतराखंड की वास्तिवक सुंदरता तो बदरीनाथ . केदार नाथ .. हेम कुंड साहिब और फूलो की घाटी में छिपी हुई है .. और मुझे वहाँ अभी जाना है जल्दी ही ...
पर जितना भी देखा वो ना भूलने वाले पल थे ...दिल जैसे कह उठा ..













सारी कायनत एक धुन्ध की चादर में खो रही है
एक कोहरा सा ओढ़े यह सारी वादी सो रही है

गूँज रहा है झरनो में कोई मीठा सा तराना
हर साँस महकती हुई इन की ख़ुश्बू को पी रही है

पिघल रहा है चाँद आसमान की बाहो में
सितारो की रोशनी में कोई मासूम सी कली सो रही है

रूह में बस गया है कुछ सरूर इस समा का
सादगी में डूबी यहाँ ज़िंदगी तस्वीर हो रही है

है बस यही लम्हे मेरे पास इस कुदरत की सोगात के
कुछ पल ही सही मेरी रूह एक सकुन में खो रही है !!



मुस्कानसुंदरता यूँ ही रहने देन













हमारे दल का नन्हा यात्री मुस्कान ..इसके चेहरे की मुस्कान यही कहती है की
मेरे बड़े होने तक यह सुंदरता यूँ ही रहने देना :):)





11 comments:

Sanjeet Tripathi said...

बहुत खूब!
शीतलता की तलाश कहां से कहां पहुंचा देती है हमें!!
सुंदर!
फोटो के लिए शुक्रिया( गैंग के परिचय की कमी खली फोटो में)
लेखन आपका बता रहा है कि आप दिखते दृश्य में कुछ तलाशने की कोशिशों में लगी थी!साथ ही यह भी मालूम चल रहा है कि ऐसी जगहों से कुछ ज्यादा ही लगाव है आपको!!
मुस्कान की कामना के लिए आमीन!!
शुक्रिया

Nishant Ashree said...

her shabd mai jaan fukne ho to ranjana ji can help you ..........
you write well..never stop writing ....keep it up....

aks69 said...

Sabse pahle aapki sakushal aur mazedaar yatra ke liye aapko hamaari taraf se badhayee...!!Chote chote Chhando me jo aapne sawanra hai....wo behad khoobsurat ban pada hai...!!Basically iss baar aap complete package lekar aayee hain....aur bilkul hi naya andaaz hai prakriti ki rachna aur sanrachna ki prastuti ka...!!Aasha hai...ki aapse aur log bhi prerit honge aur aisa kuch naya hame aage bhi dekhne ke liye mileaga..!!

शैलेश भारतवासी said...

हिन्दी-साहित्य में यात्रा-संस्मरण लिखनेवालों में मात्र राहुल सांकृत्यायन का नाम आता है। मगर यदि आज आपका यह आलेख वो भी पढ़े होते तो पक्का कहते कि मैं संस्मरण इससे बेहतर भले लिख लूँ इससे बेहतर रूप से प्रदर्शित नहीं कर सकता।

आप अपने पाँव कविता से अलग हिन्दी की अन्य विधाओं में बढ़ा सकती हैं।

Udan Tashtari said...

वाह, मजा आ गया यात्रा वृतांत पढ़कर. बहुत जीवंत चित्रण है लगा कि हम खुद साथ साथ घूम रहे हैं. बहुत बधाई इतनी सुन्दर प्रदर्शनी के लिये.

मोहिन्दर कुमार said...

रंजना जी,
मुझे शैलेश जी की टिप्पंणी से इत्तेफ़ाक है.. उन्होंने बिलकुल सही लिखा है.. जीवन्त यात्रा विवरण पढ कर मजा आ गया.

घूमते रहिये लिखते रहिये

Divine India said...

कवि के लिए प्रत्येक मंजर भाव की लढियाँ होती हैं और जहाँ तक उसके मन के हाथ पहुंचते हैं वह उसे तोड़ लेता है और पन्नों पर बिखेर देता है… कविता तो शब्द -मूर्ति है और आपने सच में इसे संपूर्णता के साथ उतारा है…।
"निकले थे अपने रोम-2 को कुछ चैन देने सफर पर…
पर जानते हुए भी अंजान थे कि बैचैन हुआ था भाव मगर।"

mukesh said...

bahut khub dirishya hai ye jese ki hum khd hi aap ke sath sher kar rahe hai par aapne yaha par bataya nahi kon -kon sath hai aapke.or mujhe lagta hai ki aapko jis chij ki talash thi aap hume usko bhi apni kavita ke jariye batane ke liye utshuk hogi.

sunita (shanoo) said...

क्या दी अकेले-अकेले आप चली गईम हम साथ होते तो और मजा आता...वैसे बहुत अच्छा लगा बहुत सुन्दर विवरण लगा जैसे की हम खुद आपके साथ ही थे यात्रा में...

शानू

रंजू said...

"निकले थे अपने रोम-2 को कुछ चैन देने सफर पर…
पर जानते हुए भी अंजान थे कि बैचैन हुआ था भाव मगर।"

बहुत ही सुंदर दिव्याभ...... शुक्रिया आपका ..जो दिल की बात इतने सुंदर ढंग से कह डाली ...शुक्रिया शैलेश आप आए और यह पढ़ा ..शुक्रिया मोहिंदेर जी ...शुक्रिया समीर जी ..आलोक जी ..निशांत ...सुनीता ..मुकेश

जगदीश भाटिया said...

इस पोस्ट के बारे में पहले नहीं पता तो आज पढ़ा।
बहुत अच्छा विवरण और बहुत अच्छे फोटॊ।
गैंग के फोटो उतार कर कंप्यूटर पर सेव कर लिये हैं :)
खास कर गुलू जी का फोटो बहुत अच्छा लगा:)