Monday, June 18, 2007

यह भीगा सा मौसम



सावन की यह भीगी सी बदरिया
बरसो जा के पिया की नगरिया

यहाँ ना आके हमको जलाओ
अपने बरसते पानी से यूँ शोले ना भड़काओ

उनके बिना मुझे कुछ नही भाये
सावन के झूले कौन झुलाये

बिजली चमक के हमे ना डराओ
बिन साजन के दिल मेरा कांप जाये

उलझा दिए हैं बरस के जो तुमने मेरे गेसू
उनको अब कौन अपने हाथो से सुलझाए

यह बिखरा सा काजल,यह चिपका सा आँचल
अब हम किसको अपनी आदओ से लुभायें

रुक जाओ आ बहती ठंडी हवाओं
तेरी चुभन से मेरा जिया और भी तड़प सा जाये

मत खनको बेरी कंगना,पायल
तुम्हारी खनक भी अब बिल्कुल ना सुहाये

सब कुछ सूना सूना है उनके बिना
मुझको यह बरसती बदरिया पिया के बिना बिल्कुल ना भाये!!
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