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Friday, April 12, 2013

कुछ यूँ ही .........

जाने ये कैसे ख्याल  आते हैं ...
जो थाम नहीं पाते
खुशनुमा वक़्त
के सिरे को
और
दर्द के हर पल को
एक कसक ....
न बीतने की दे जाते हैं ..........
आँखों में ठिठकी रह जाती है
ख्वाबो के देखने की चाहत
और
नींद अब बिकती है
चंद गोलियों की शकल में
जो कहीं गहरे नशे में
बिना ख्वाब के डूबी जाती है
सही में
बातें बेवजह हैं और बहुत सी हैं

Monday, January 04, 2010

एहसास (कुछ यूँ ही )



सर्दी का ...
घना
कोहरा..
उसमें..
डूबा हुआ मन..
एक अनदेखी सी
चादर में लिपटा हुआ
और तेरी याद उस में
आहिस्ता से ,धीरे से
उस कोहरे को चीरती
यूँ मन पर छा रही है
जैसे कोई कंवल
खिलने लगा है धीरे धीरे
और आँखों में
एक चाँद...
मुस्कराने लगा है ...

रंजना (रंजू )भाटिया


"सन्डे विदआउट सन शाइन "..इंडिया गेट का नजारा ३ जनवरी २०१० को मेरे कैमरे की नजर से ..दिल्ली की सर्दी ....

रंजना (रंजू )भाटिया
३ जनवरी २०१०

Monday, November 02, 2009

बदली हुई फ़िज़ा


बदली हुई रुत ..
बदली हुई फिजा ..
जाग रही है ...
दो रूहों की
एक ही हलचल
मद्धम मद्धम ..

रात की गहरी चुनरी ओढे
चाँद भी मुस्कराया ..
और .............
लबों पर तैरता
चाँदनी के मुख पर
वो हल्का सा तब्बसुम
या फ़िर रुकी हुई है
कोई शबनम की बूंद ..

परियों के अफ़साने हैं
या फ़िर से कोई सपना
उतर आया है ..
मेरी आँखों में ..
वह खामोशी ...
अब फ़िर से
जागने लगी है
जिसे बरसों पहले
थपकी दे के सुलाया था !!

रंजना (रंजू ) भाटिया

Wednesday, October 21, 2009

कोई तो होता .....


कोई तो होता ......
दिल की बात समझने वाला
सुबह के आगोश से उभरा
सूरज सा दहकता
रात भर चाँद सा चमकने वाला

पनीली आखों में है
खवाब कई ...
कोई संजो लेता ..
इन में संवरने वाला
थरथराते लबों पर
ठहरा है लफ्जों का सावन
कोई तो होता ..
इनमें भीगने वाला

दिल की धडकनों में
कांपते हैं कितने ही एहसास
कोई तो होता ..
इन एहसासों को परखने वाला
इक नाम बसा है
अरमानों के खंडहर पर
कहाँ लौट के आता है
फ़िर जाने वाला ...!!!!

रंजू भाटिया

Tuesday, April 07, 2009

गूंजता सन्नाटा


फैली है खामोशी
सब तरफ़ छाया है
एक गहरा सन्नाटा ....
हवा भी जैसे ...
भूल गयी है लहराना
कुदरत पर ठहरा हुआ
है वक्त का कोई साया ..

मेरे सब लफ्ज़
तेरे हर चित्र भी ,
आज जैसे ...
खामोश हो कर
गुम हो गये हैं
दिल के पुराने पन्नो में ..

टूट गयी है कलम
सूख गये हैं रंग
पर ...
दिल में
थरथराता
यह सन्नाटा
कह रहा है कि
कल यह ....
ज़रूर आग बन कर
काग़ज़ पर बहेगा .............

Tuesday, March 24, 2009

तुम ही तो हो ..


जीवन के हर पल में
बारिश की रिमझिम में ,
चहचहाते परिंदों के सुर में ,
सर्दी की गुनगुनी धूप में ,
हवाओं की मीठी गंध में
तुम ही तुम हो ....


दिल में बसी आकृति में
फूलों की सुगन्ध में ....
दीपक की टिम -टिम करती लौ में
मेरे इस फैले सपनो के आकाश में
बस तुम ही तुम हो .....

पर.....
नहीं दिखा पाती हूँ
तुम्हे वह रूप मैं तुम्हारा
जैसे संगम पर दिखती नहीं
सरस्वती की बहती धारा॥

सच तो यह है ....
ज़िंदगी की उलझनों में
मेरे दिल की हर तह में
बन के मंद बयार से
तुम यूं धीरे धीरे बहते हो
मिलते ही नजर से नजर
शब्दों के यह मौन स्वर
तुम ही तो हो जो ......
मेरी कविता में कहते हो !!

रंजना ( रंजू ) भाटिया