Wednesday, September 21, 2022

ढाई आखर

 



प्रेम के ढाई आखर

कभी लिखे कविता में

कभी आँखों से कहे गए

कभी सिमट के कह गए

बात अपनी धडकनों से

तो कभी पलकों के कोरों से

आंसू बन पिघल गए


यूँ ही हाथ में लिए हाथ

कहते हुए अपनी बात

फूल की तरह ज़िन्दगी जी कर

यह किताबो के कोरे सफहों में

दम तोड़ गए ..


और जो रह गया

कहाँ तलाश करे उसको

उसको अब किस किताब के

लफ्जों में तलाश करे

प्यार हो जो उम्र भर का

उन लम्हों की कहाँ बात करे ?


डायरी के पुराने पन्नो से 

काल का पंछी उड़ता re

5 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

कहाँ बात करें , कहाँ तलाश करें .... ढाई अक्षरों ने भटका रखा है 😆

Anonymous said...

कहां तलाश करें

प्रेम को समझ पाने की पड़ताल करती बहुत सुंदर रचना
बधाई

मन की वीणा said...

हृदय को कोमलता से छू गई आपकी रचना।
सस्नेह साधुवाद।
सुंदर सृजन।

Jyoti khare said...

प्रेम बहुत सुंदर रचना

Onkar said...

सुंदर रचना