प्रेम के ढाई आखर
कभी लिखे कविता में
कभी आँखों से कहे गए
कभी सिमट के कह गए
बात अपनी धडकनों से
तो कभी पलकों के कोरों से
आंसू बन पिघल गए
यूँ ही हाथ में लिए हाथ
कहते हुए अपनी बात
फूल की तरह ज़िन्दगी जी कर
यह किताबो के कोरे सफहों में
दम तोड़ गए ..
और जो रह गया
कहाँ तलाश करे उसको
उसको अब किस किताब के
लफ्जों में तलाश करे
प्यार हो जो उम्र भर का
उन लम्हों की कहाँ बात करे ?
डायरी के पुराने पन्नो से
