Monday, March 24, 2014

चार पहर की बात ........

चार पहर की बात ........

सुबह ....

रोज़ होती सुबह
आँख खोलते ही
सामने आ कर मुस्कराती है
पकड़ा देती है
चाय की प्याली हाथ में
और नए अखबार की
बासी खबरों में गुम हो जाती है !!
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दोपहर

भरी उमंगों सी
ऊपर से जवान
अन्दर से बच्ची सी लगती है
सर्दी में भाये इसकी गर्माहट
गर्मी में यह आग उगलती
फेक्ट्री सी लगती है !!
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शाम
ढला सूरज
गोधुली का साया
दुनिया हुई उधर से इधर
आसमान को जैसे
किसी ने घूंट कोई
नशे का पिलाया !!
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रात
कभी काली
कभी मतवाली
कभी तन्हाई बेहिसाब
चाँद तारों की गिरह खोले
करके  दिल की हर बात !!

@ रंजू भाटिया
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