Sunday, May 07, 2017

इश्क़ की इंतहा


आज की बात अमृता के अपने लफ्जों में ..क्यूंकि मैं इसको पढ़ कर कितनी देर तक खामोश बैठी    रह जाती हूँ ..कुछ कहने को बोलने को दिल नही चाहता है बस यही ख्याल कि रब्बा यह "इश्क की वो इन्तहा है "जो खुदा से मिला देती है ..

कोरा कागज .

पच्चीस और छब्बीस अक्तूबर की रात २ बजे जब फ़ोन आया की सहिर नही रहे तो पूरे बीस दिन पहले की वह रात उस रात में मिल गई जब मैं बल्गारिया में थी ,डाक्टर ने कहा था कि दिल की तरफ़ मुझे खतरा है ,और उस रात मैएँ नज्म लिखी थी अज्ज आपणे दिल दरिया दे विच्च मैं आपणे फुल्ल प्रवाहे...."" अचानक मैं अपने हाथो की तरफ़ देखने लगी कि इन हाथों से मैंने अपन दिल के दरिया में अपनी हड्डियाँ प्रवाहित की थी .पर हड्डियां बदल कैसे गई ? यह भुलावा मौत को लग गया की हाथो को ?  
साथ ही वह समय सामने आ गया ,जब दिल्ली में पहली एशियन राइटर्स कांफ्रेंस हुई थी ,शायरों -आदबों को उनके नाम के बैज मिले थे .जो सबने अपने कोटों में लगाए थे ,और सहिर ने अपने कोट पर से अपना नामा का बैज उतार कर मेरे कोट पर लगा दिया था  और मेरे कोट से मेरे नाम का बैज उतार कर अपन कोट पर लगा लिया था उस समय किसी की नज़र पड़ी ,उसने कहा था की हमने बैज ग़लत लगा रखे हैं .तो साहिर हंस पड़ा था की बैज देने वाले से गलती हो गई होगी ,पर इस गलती को हमें न दुरुस्त करना न हमने किया ....अब बरसों बाद जब रात को दो बजे ख़बर सुनी कि साहिर नही रहे तो लगा जैसे मौत ने अपना फ़ैसला उसी बैज को पढ़ कर किया है ,जो मेरे नाम का था ,पर साहिर के कोट पर लगा हुआ था ...."'

मेरी और साहिर की दोस्ती में कभी भी लफ्ज़ हायल नही हुए थे यह खामोशी का हसीं रिश्ता था मआइने जो नज्में लिखी तो उस मजमुए को जब अवार्ड मिला तो प्रेस रिपोटर ने मेरी तस्वीर लेते हुए चाहा की मैं कुछ कागज़ पर लिख रही हूँ वैसे तस्वीर ले वह .तस्वीर ले कर जब वह प्रेस वाले चले गए तो मैंने उस कागज को देखा की मैंने उस पर बार बार एक ही लफ्ज़ लिखा था साहिर साहिर साहिर इस दीवानगी के आलम के बाद घबराहट हुई कि सवेरे जब यह तस्वीर अखबार में छपेगी तो तस्वीर वाले कागज पर यह नाम पढ़ा जायेगा तो न जाने कैसी कयामत आ जायेगी .? पर कयामत नही आई तस्वीर छापी पर वह कागज कोरा ही नजर आया वहां

यह और बात है कि बाद में यह हसरत आई दिल में कि ओ   खुदाया! जो कागज कोरा दिखायी दे रहा था वह कोरा नही था 
कोरे कागज कि आबरू आज भी उसी तरह है .रसीदी टिकट में मेरे इश्क कि दसात्न दर्ज़ है साहिर ने पढ़ी थी पर उसके बाद किसी मुलाक़ात में न रसीदी टिकट का जिक्र मेरी जुबान पर आया न साहिर कि जुबान पर

याद है एक  मुशायरे में साहिर से लोग आटोग्राफ ले रहे थे लोग चले गए मैं अकेली उसके पास रह गई तो मैंने हंस कर उसके आगे अपनी हथेली कर दी थी कोरे कागज की तरह और उसने मेरी हथेली पर अपना नाम लिख कर कहा था यह कोरे चेक पर मेरे दस्तखत है जो रकम चाहे भर  लेना   और  जब चाहे काश करवा लेना वह कागज चाहे मांस कि हथेली  थी पर उसने कोरे कागज का नसीब पाया था इस लिए कोई भी हर्फ उस पर नही लिखे जा सकते थे ...

हर्फ आज भी मेरे पास कोई नही हैं रसीदी टिकट में जो भी कुछ भी है और आज यह सतरें  भी कोरे कागज की दास्तान है ...

इस दास्तान की इब्तदा भी खामोश थी और सारो उम्र उसकी इन्तहा भी खमोश रही आज से चालीस बरस पहले लाहौर में जब साहिर मुझसे मिलने आता था बस आ कर चुपचाप सिगरेट पीता मेरा और उसके सिगरेट का धुंआ सिर्फ़ हवा में मिलता था ,साँस भी हवा में मिलते रहे और नज्मों के लफ्ज़ भी हवा में ...

सोच रही हूँ हवा कोई भी फासला तय कर सकती है वह आगे भी शहरों का फासला तय किया करती थी,अब इस दुनिया  और उस दुनिया का फासला भी जरुर तय कर लेगी .....

२ नवम्बर १९८० 
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प्यार के एक पल ने जन्नत को दिखा दिया
प्यार के उसी पल ने मुझे ता -उमर रुला दिया
एक नूर की बूँद की तरह पिया हमने उस पल को
एक उसी पल ने हमे खुदा के क़रीब ला दिया !!
..........रंजू ..........
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