Friday, May 12, 2017

नींद ,सपने और ख्वाब


नींद भी अजब होती है ..ज़िन्दगी और सपनो सी यह भी आँख मिचोली खेलती रहती है ..इसी नींद के कुछ रंग यूँ उतरे हैं इस कलम से ...


नहीं खरीद पाती
बीतती रातों से
अब कोई ख्वाब
यह आँखे
उफ़ !!!
यह
नींद भी
अब कितनी
महंगी है .........

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क्यों आज कल
हर पल रहती है
मेरी आँखे
नींद से बोझिल
क्या कोई ख्वाब
मेरी आँखों में भी
समां गया ?
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कह गये थे
तुम ख्वाबो को
 चुपके से चले आना
आँखो में
पर
  निगोड़ी नींद भी
 तेरे जाते ही यह 
मुझसे बेवफ़ा हो गई   
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आ जाएगी नींद  तो
सो जायेंगे
तेरी बाहों के घेरे में
हम सकून से
पर ..
तुझे भी तो
कभी इस तरह
शिद्दत से
मेरी  याद आये
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कम्पोज़ की गोली
वह बिचोलिया है
जो अक्सर
मेरी नींद
और मेरे सपनो का मेल
करवा ही देती है .... 

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