Wednesday, May 20, 2015

अतिथि "अब की बार वापस कब जाओगे ?

उम्र का एहसास
तब शिद्धत से
होता है
जब
दर्द की चहलकदमी को
देखती हूँ
अपने जिस्म की सीढियां चढ़ते
जो पांव से घुटनों तक
फिर "कमर "पर
आ कर उस
"ढीठ मेहमान" सा
टिक जाता है
और फिर बहुत प्यार से
मैं उसकी "आवभगत"
करते हुए पूछती रहती हूँ
अतिथि "अब की बार
वापस कब जाओगे ?”

यह दर्द मैंने अपने काव्य संग्रह "कुछ मेरी कलम से " में लिखा और सोचा कि इत्ती लम्बाई है कमर दर्द इस में आम सी बात  है और यह तो अतिथि सा आता है जाता है चिंता क्या करनी ,और शुक्र किया कोई और नामुराद बीमारी नहीं यहाँ तक कि कोई उच्च निम्न बी पी आदि भी नहीं ,पर ,हाय ! पिछले  एक साल से दांत पीड़ा सबकी कसर पूरी किये हुए है। … एक दांत ठीक करवाओ वो जाते जाते दूसरे दांत को दर्द देने का न्योता दे जाता है और फिर इस कष्ट से छुटकारे की इतनी महंगी फीस चुकानी और पीड़ा  दे जाती है। …इन दन्त पीड़ा का इंश्योरेंस वाले भी कुछ न देते ,तब दिल करता  है की सब दाँतो को  एक साथ बाहर का रास्ता दिखा दूँ पर पीकू फिल्म के डायलाग मोशन इमोशन इसी दंत संसार से जुड़े दिखने लगते हैं :) और फिर वही प्रश्न दंत पंक्ति से अब कब चैन तुम पाओगे और जेब हलकी होने से बचाओगे !!

 
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