Friday, October 04, 2013

ज़िन्दगी कभी पहले भी मुझे कभी अपनी बन के मिली न थी

रिस रिस कर बीता समय
बहका के ,बहला के ..
ले गया .........
तुम्हे भी और मुझे भी ...
अब सब तरफ है
तो सिर्फ धुंआ ही धुंआ
सच है न ...
छलकती आँखों से
बुझता नहीं कुछ भी ....

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सुलगते हुए पलों की
रेखाएं हैं
यादों की दीवारों पर
जो कभी बुझती ही नहीं
बार बार स्टेम्प लगाती हुई
यह जल कर कुछ और
निशाँ गहरे कर जाती है.............



ज़िन्दगी कभी पहले भी मुझे कभी अपनी बन के मिली न थी ..पर आज कल तो बहुत अजनबी है .हर पल एक नया तमाशा ..रोज़ सुबह उठते ही एक सवाल ज़िन्दगी से कि आज के पन्ने पर क्या अनजाना लिखा है मेरे लिए ...........ईश्वर बस ताक़त दे और सहने की असीम शक्ति यही दुआ करें .... 
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