Thursday, September 12, 2013

कुछ लफ्ज़

कितने बचे हैं
अभी
धर्म ,
धोखे ,
सिर्फ और सिर्फ
धर्म के नाम पर ?
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 लिखे आखर
काली स्याही से
कागज़ पर
उतरे भाव मन के
जैसे सफेद फूल
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जब मन पर
छा जाता है
अकेलापन
और साँसे हो मद्धम
तब कुछ लिख कर
भावों से साँसे उधार ले लेती हूँ !!

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महके हुए बसन्त में
कुछ लफ्ज़ अब इस तरह खिले
नमी हैं इसकी तह में कितनी
यह दुनिया को पता न चले !!.

# रंजू ..........

5 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

सुन्दर और गहरी पंक्तियाँ..

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

छोटी २ रचनाओं का सुंदर सृजन ! बेहतरीन प्रस्तुति,

RECENT POST : बिखरे स्वर.

आशा जोगळेकर said...

धर्म के नाम पर तो सबसे ज्यादा अधर्म चलता है ।

बाकी तीनों बहुत कोमल क्षणिकाएं रंजू जी।

दिगम्बर नासवा said...

काली स्याही से उजले मन के भाव लिख दिए हैं आपने ...

Brajesh Singh said...

Deep Thoughts :)