Wednesday, September 18, 2013

इजहार -इनकार

इजहार -इनकार

आज ज़िन्दगी की साँझ में
खुद से ही कर रही हूँ "सवाल जवाब"
कि जब बीते वक़्त में
रुकी हवा से इजहार किया
तो वह बाहों में सिमट आई
जब किया
मुरझाते फूलों से इकरार  तो
वह खिल उठे
जाते बादलों को
प्यार से पुचकारा मैंने
तो वह बरस गए
पर जब तुम्हे चाहा शिद्दत से तो
सब तरफ सन्नाटा क्यों गूंज उठा
ज़िन्दगी से पूछती हूँ आज
कि क्या हुआ ..
क्या यह रुका हुआ वक़्त था
जो आकर गुजर गया??
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