Friday, July 05, 2013

खेल


रेत के महल बना कर
उसको अपने सपनों से सजा कर
बच्चे यूँ ही
कितना प्यारा घर घर का
खेलते हैं खेल

फ़िर जब उनका भर जाता है दिल
तो यूँ ही जाते जाते एक पैर की ठोकर से
उसको गिरा के फ़िर से मिटटी में मिला देते हैं

तुम भी मुझे उन्ही बच्चो से दिखते हो "ईश्वर"
जो रचाते हो संसार को
और फ़िर ख़ुद ही उसका कर देते हो संहार
फ़िर एक बच्चे सा
उसको बिना किसी मोह के
बस बिखरते हुए देखते रहते हो .....उतराखंड की त्रासदी दिल की बेबसी को यूँ ही ब्यान कर गयी .

7 comments:

Akhil said...

waah...sahi baat kahi hai aapne..bhagwaan ki leela samjhna insaan ke bas ki baat nahin...sundar khayal

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत मार्मिक रचना, उतराखंड त्रासदी को शायद ही लोग भुला पायेंगे.

रामराम.

काजल कुमार Kajal Kumar said...

पर इन्‍सान है कि‍ न बच्‍चों से कुछ सीखता है न भगवान से, मोह लगा बैठता है ये ...

arvind mishra said...

सच है ईश्वरीय खेल ही है यह

प्रवीण पाण्डेय said...

रुचिर बनाया, तोड़ दिया फिर,
दुख के बादल फिर आये घिर।

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

prakrati ka khel niraala hee hai!

दिगम्बर नासवा said...

उसकी माया को वो ही जानता है ... क्या करना है किस्से करवाना है ... उसके ही खेल हैं ..