Tuesday, July 02, 2013

कुदरत

कहने करने की
हर हद टूट जाती
जो हर आती साँस
जिस्म से रूह जुदा कर जाती !!
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जो न होता कुदरत में
सूरज की ताप
और
बादलों की नमी का नजारा
धरती का आँचल
लगता बदरंग बेसहारा !!

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दिल में जलती
सूरज सी आग
नयनों में
टिप टिप करती
बरसात
कुदरत के रंग सी
यही प्रेम की सौगात !!
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कुछ बात बनी इन तीन क्षणिकाओं में क्या ? जो यूँ ही खिड़की से देखते हुए बादलो की आँख मिचोली देखते हुए लिखी गयी अभी अभी :) रंजू भाटिया
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