Tuesday, July 02, 2013

कुदरत

कहने करने की
हर हद टूट जाती
जो हर आती साँस
जिस्म से रूह जुदा कर जाती !!
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जो न होता कुदरत में
सूरज की ताप
और
बादलों की नमी का नजारा
धरती का आँचल
लगता बदरंग बेसहारा !!

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दिल में जलती
सूरज सी आग
नयनों में
टिप टिप करती
बरसात
कुदरत के रंग सी
यही प्रेम की सौगात !!
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कुछ बात बनी इन तीन क्षणिकाओं में क्या ? जो यूँ ही खिड़की से देखते हुए बादलो की आँख मिचोली देखते हुए लिखी गयी अभी अभी :) रंजू भाटिया

9 comments:

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

bahut hee khubsoorat muktak...

meri nayi post par aapka swaagat hai...

http://raaz-o-niyaaz.blogspot.com/2013/07/blog-post.html

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

सुंदर सृजन,उम्दा प्रस्तुति,,,

RECENT POST: जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें.

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत ही सुंदर और भाव मय, शुभकामनाएं.

रामराम.

Madan Mohan Saxena said...

बेहतरीन .

प्रवीण पाण्डेय said...

बारिश भाव नम कर जाती है।

sushma 'आहुति' said...

दिल को छू हर एक पंक्ति....

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सभी अच्छी हैं .... अंतिम वाली बेहतरीन

arvind mishra said...

कुछ सालता है मन में आसें उफनती मन में
बरसा निगोड़ी लगाए आग तन मन में!

दिगम्बर नासवा said...

प्रेम की सौगात भी कैसी होती है ... आग और बरसात साथ ले आती है ... भावपूर्ण सभी ...